उज्जवल दुनिया संवाददाता
हजारीबाग। कद लगभग 6 फीट, लिबास खादी की धोती और कुर्ता, माथे पर खादी की गांधी टोपी और पांव में साधारण चप्पल। इस वेशभूषा में साधारण दिखने वाला व्यक्ति एक असाधारण महापुरुष था जिसे इलाके में वैद्य जी के नाम से जाना जाता था। आजीवन गांधीवादी विचारधारा पर चलने वाला यह व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी, प्रांतीय धारा सभा के चुनाव में विजयी होकर विधायक तथा आजादी के बाद चतरा विधानसभा से प्रथम विधायक बनकर जनता की सेवा की।आज की पीढ़ी को इस अनाम स्वतंत्रता सेनानी के बारे में शायद ही जानकारी होगी। इसका अंदाज किसी से लग जाता है जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आगमन 11 फरवरी 1940 को हजारीबाग में हुआ था उसे समय सुखलाल सिंह जिला परिषद के अध्यक्ष थे। नेता जी के स्वागत के लिए बनी कमेटी के स्वागत समिति के अध्यक्ष हीरालाल महाजन ने एक आवेदन देकर सुखलाल बाबू से शहर के लेपो रोड में कुछ तोरण द्वार बनाने की अनुमति मांगी थी। वर्तमान में जो मेन रोड है वह पहले लेपो रोड के नाम से जाना जाता था। क्योंकि सुखलाल बाबू जिला परिषद के अध्यक्ष थे इसलिए उनसे अनुमति लेना जरूरी था। 9 फरवरी 1940 के इस आवेदन पर सुखलाल सिंह ने स्वीकृति देकर नेताजी के कार्यक्रम को सफल बनाने का संदेश भी दिया था। आज से 86 वर्ष पहले का यह आवेदन इस घटना का तस्दीक करता है कि किसी भी बड़े छोटे कार्यक्रम के लिए उस समय प्रशासनिक औपचारिकताएं विधिवत् पूरी की जाती थी। सुखलाल सिंह का जन्म 3 जनवरी 1897 को एकीकृत हजारीबाग जिले के चतरा सब डिवीजन के तेतरिया गांव में हुआ था। वर्तमान में चतरा सबडिवीजन अब जिले के रूप में स्थापित है। सुखलाल बाबू स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण सिंह के अनुज थे.। उनकी शिक्षा दीक्षा लोअर प्रायमरी स्कूल तेतरिया, प्राइमरी स्कूल हंटरगंज और जोरी, जिला स्कूल रांची तथा बी एन कॉलेज पटना से पूरी हुई।
1920 में वे असहयोग आंदोलन में शामिल होकर पूरा जीवन देश सेवा को समर्पित कर दिया। उनका कार्य क्षेत्र चतरा और हजारीबाग बना। इन्हें राजनीतिज्ञ से अधिक ख्याति वैद्य के रूप में मिली। पूरे इलाके में भी वैद्य जी के नाम से प्रसिद्ध थे। बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके के बी सहाय उन्हें हमेशा वैद्य जी के नाम से ही पुकारते थे।
26 जनवरी 1929 को तिरंगा फहराने के जुर्म में सुखलाल बाबू को जेल की सजा हुई तथा 1932 में उनकी रिहाई हुई। 1934 में हजारीबाग जिला बोर्ड के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष बने तथा 10 दिसंबर 1940 को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। 1936 में चतरा-गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब 1952 में आम चुनाव हुए उस समय चतरा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक के रूप में निर्वाचित हुए। उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया जिस पद का दायित्व उन्होंने काफी ईमानदारी से निभाया। वर्तमान में जो सड़क डोभी से चंदवा तक बनाई गई है वह इन्हीं की देन है। इसके अलावा कई बड़े-बड़े डैम के निर्माण करवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 9 जून 1969 को इलाज के क्रम में पटना में उनका देहांत हुआ।
सुखलाल बाबू राजनीति से पूरी तरह संन्यास लेकर अपने पैतृक गांव कुसुंभा में खेती करने लगे। यहां पर उनके राजनीतिक मित्रों का हमेशा आना-जाना लगा रहता था। स्वर्गीय के वीसहाय,स्वर्गीय बसावन सिंह,स्वर्गीय वीरचंद पटेल,अब्दुल कयूम अंसारी जैसे उनके मित्रमंडली में शामिल थे। इस पंक्ति के लेखक को इसकी जानकारी पटना में बसावन बाबू से एक विशेष मुलाकात के दरमियान हुई थी। बसावन् बाबू से श्री कृष्णा पुरी मोहल्ले स्थित उनके आवास पर घंटो बातचीत हुई थी। उन्होंने सुखलाल बाबू की सादगी संघर्ष और सेवा भाव की गाथा विस्तार से सुनाई थी। आजादी के पहले और आजादी के बाद विधायक रह चुके सुखलाल बाबू की शानदार सवारी साइकिल थी। आजीवन आडंबर से दूर रहने वाले ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन और श्रद्धांजलि।
लेखक: प्रोफेसर प्रमोद कुमार

