नई दिल्ली: भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन पिछले दो वर्षों में इस बढ़ती जरूरत का बोझ कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर नहीं पड़ा। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के विश्लेषण के मुताबिक, 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच देश की बिजली मांग करीब 7 फीसदी बढ़ी, लेकिन कोयला आधारित बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं हुई। विश्लेषण के अनुसार, 50 से अधिक वर्षों में यह पहली बार है जब लगातार दो वर्षों की अवधि में बिजली की मांग बढ़ने के बावजूद कोयला बिजली उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई।
इस बदलाव में सौर ऊर्जा की भूमिका सबसे अहम रही। इस दो साल की अवधि में देश की बिजली मांग करीब 63 टेरावाट-घंटे बढ़ी, जबकि स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से करीब 70 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली पैदा हुई। अकेले सौर ऊर्जा ने लगभग 44 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली का योगदान दिया। इसके अलावा पवन ऊर्जा से 13, जलविद्युत से 8 और परमाणु ऊर्जा से करीब 7 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली मिली।
दो साल में 77 गीगावाट नई सौर क्षमता
विश्लेषण के मुताबिक, 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच भारत ने करीब 77 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी। इसी अवधि में लगभग 11 गीगावाट पवन, 5 गीगावाट जलविद्युत और 0.6 गीगावाट परमाणु क्षमता भी जोड़ी गई।
इसका असर बिजली उत्पादन के आंकड़ों में दिखाई दिया। बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त कोयला बिजली की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि नई स्वच्छ ऊर्जा क्षमता ने मांग में हुई वृद्धि को काफी हद तक समायोजित कर लिया।
कोयला बिजली क्षमता बढ़ी, लेकिन उत्पादन में नहीं हुआ इजाफा
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि भारत में कोयले पर निवेश रुक गया है। CREA के अनुसार, इस अवधि में करीब 8.5 गीगावाट नई कोयला आधारित बिजली क्षमता जोड़ी गई। जून 2026 के अंत तक लगभग 43 गीगावाट कोयला बिजली क्षमता निर्माणाधीन थी।
यानी एक तरफ नई कोयला क्षमता तैयार हो रही है, वहीं दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में उसकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही। इसका एक कारण दिन के समय सौर ऊर्जा से मिलने वाली बड़ी मात्रा में बिजली है। हालांकि शाम और रात के समय मांग बढ़ने पर कोयला आधारित संयंत्रों की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन पर भी असर
स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार का असर बिजली क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर भी पड़ा है। CREA के विश्लेषण के अनुसार, 2024 की पहली छमाही और 2026 की पहली छमाही के बीच भारत के बिजली क्षेत्र का CO₂ उत्सर्जन लगभग स्थिर रहा।
हालांकि, इसे भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन में गिरावट के रूप में नहीं देखा जा सकता। 2026 की पहली छमाही में देश का कुल CO₂ उत्सर्जन सालाना आधार पर करीब 3.7 फीसदी बढ़ा। इसकी प्रमुख वजहों में स्टील और सीमेंट जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से बढ़ता उत्सर्जन शामिल है।
उद्योगों में कोयले की चुनौती बरकरार
बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ने के बावजूद भारत की पूरी ऊर्जा व्यवस्था अभी जीवाश्म ईंधनों से मुक्त नहीं हुई है। खासकर स्टील और सीमेंट जैसे ऊर्जा-गहन उद्योगों में कोयले और दूसरे जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में जारी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में स्टील और सीमेंट उत्पादन में वृद्धि हुई और इनके उत्सर्जन में भी इजाफा दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा से हुई प्रगति को उद्योगों में जीवाश्म ईंधन की बढ़ती खपत चुनौती दे रही है।
बैटरी स्टोरेज और ग्रिड विस्तार अगली बड़ी चुनौती
सौर और पवन ऊर्जा के तेजी से विस्तार के साथ ऊर्जा भंडारण की जरूरत भी बढ़ रही है। सौर बिजली मुख्य रूप से दिन में उपलब्ध होती है, जबकि बिजली की मांग शाम और रात में भी बनी रहती है। ऐसे में अतिरिक्त सौर बिजली को स्टोर कर जरूरत के समय इस्तेमाल करना जरूरी होगा।
इसके लिए भारत को बैटरी स्टोरेज, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड की क्षमता बढ़ाने पर जोर देना होगा। CREA के विश्लेषण में भी स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए ग्रिड विस्तार और ऊर्जा भंडारण को महत्वपूर्ण बताया गया है।
हालिया आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि कोयले की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सितंबर 2026 में Reuters ने रिपोर्ट किया कि अगस्त में भारत के बिजली क्षेत्र का कोयला आयात 15 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। गर्मी के कारण बिजली मांग बढ़ने और जलविद्युत उत्पादन घटने से कोयला आधारित संयंत्रों पर दबाव बढ़ा था।
इस तरह भारत के ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर दो समानांतर रुझान दिखाती है। एक तरफ सौर, पवन और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है और बिजली की अतिरिक्त मांग को पूरा करने में उनकी भूमिका बढ़ रही है। दूसरी तरफ कोयला आधारित क्षमता, औद्योगिक कोयला खपत और पीक डिमांड के समय थर्मल पावर की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
आने वाले वर्षों में भारत के लिए चुनौती सिर्फ सौर और पवन क्षमता बढ़ाने की नहीं होगी, बल्कि उस बिजली को स्टोर करने, ग्रिड तक पहुंचाने और उद्योगों की बढ़ती ऊर्जा जरूरत को स्वच्छ बिजली से पूरा करने की भी होगी।

