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‘मुकद्दर का सिकंदर’ के 16 पन्नों के डायलॉग, विनोद खन्ना को लगे थे 6 टांके; जानिए फिल्म के 7 दिलचस्प किस्से

  • 1978 में रिलीज हुई थी प्रकाश मेहरा की ब्लॉकबस्टर फिल्म

  • पहले ‘देवदास’ के नाम से बननी थी फिल्म, बाद में बदल गई पूरी कहानी

  • कादर खान ने लिखे थे अमिताभ बच्चन के लिए 16 पन्नों के संवाद

  • शूटिंग के दौरान कांच लगने से विनोद खन्ना को आई थी चोट

मुंबई। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी हैं, जिनकी लोकप्रियता समय के साथ और बढ़ती जाती है। अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। 27 अक्टूबर 1978 को रिलीज हुई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की थी। प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, रेखा और राखी जैसे दिग्गज कलाकार नजर आए थे।

फिल्म के गाने, दमदार संवाद और अमिताभ बच्चन का दर्द भरा किरदार आज भी दर्शकों को याद है। लेकिन इस फिल्म के निर्माण के पीछे कई ऐसे दिलचस्प किस्से छिपे हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। फिल्म कभी ‘देवदास’ के नाम से बनने वाली थी। शूटिंग के दौरान विनोद खन्ना को छह टांके लगे थे और अमिताभ बच्चन के लिए कादर खान ने 16 पन्नों के संवाद लिखे थे। आइए जानते हैं फिल्म से जुड़े कुछ अनसुने किस्से।

1. पहले ‘देवदास’ नाम से बननी थी फिल्म

‘मुकद्दर का सिकंदर’ की कहानी का सफर काफी दिलचस्प रहा है। साल 1976 में निर्देशक प्रकाश मेहरा ‘देवदास’ नाम से एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे थे। इस प्रोजेक्ट में अमिताभ बच्चन, शर्मिला टैगोर और हेमा मालिनी को शामिल करने की तैयारी थी।

हालांकि, प्रकाश मेहरा पारंपरिक देवदास की कहानी में कुछ नए बदलाव करना चाहते थे। निर्माता कैलाश चोपड़ा को उनका यह विचार पसंद नहीं आया और उन्होंने इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली।

इसके बाद कैलाश चोपड़ा ने गुलजार के निर्देशन में अलग से ‘देवदास’ बनाने की योजना बनाई। इसमें धर्मेंद्र को देवदास और प्रेम चोपड़ा को चुन्नी बाबू की भूमिका के लिए चुना गया। संगीत की जिम्मेदारी आरडी बर्मन को दी गई थी। बताया जाता है कि इस फिल्म के लिए कुछ गाने भी रिकॉर्ड किए गए, लेकिन यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका।

दूसरी ओर, प्रकाश मेहरा ने देवदास की मूल भावना से प्रेरित होकर एक नई कहानी तैयार की। इसी कहानी ने आगे चलकर ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का रूप लिया। फिल्म का मुहूर्त 1 मई 1976 को हुआ था।

2. विनोद खन्ना को लगे थे छह टांके

फिल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बीच एक सीन फिल्माया जा रहा था। इस दृश्य में अमिताभ बच्चन को कांच का एक टुकड़ा विनोद खन्ना की तरफ फेंकना था।

शूटिंग के दौरान कांच का टुकड़ा विनोद खन्ना की ठोड़ी पर जा लगा। इससे उन्हें चोट आई और घाव पर छह टांके लगाने पड़े।

यह हादसा फिल्म की शूटिंग से जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा बन गया। दोनों कलाकारों के बीच फिल्माए गए इस दृश्य की चर्चा आज भी होती है।

3. अमिताभ बच्चन के लिए लिखे गए थे 16 पन्नों के संवाद

फिल्म का गाना ‘ओ साथी रे’ आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार गीतों में गिना जाता है। लेकिन इस गाने से पहले आने वाला अमिताभ बच्चन का भावुक संवाद भी फिल्म की बड़ी खासियत है।

इस दृश्य के लिए दिग्गज लेखक और अभिनेता कादर खान ने कथित तौर पर करीब 16 पन्नों के संवाद लिखे थे। इतने लंबे संवाद देखकर अमिताभ बच्चन को लगा कि इन्हें याद करना काफी मुश्किल होगा।

इसके बाद कादर खान ने उन्हें संवाद बोलकर समझाए। उन्होंने अमिताभ को सलाह दी कि संवादों को सिर्फ याद करने के बजाय उनके पीछे छिपे दर्द और भावनाओं को महसूस करें।

अमिताभ बच्चन ने इस सलाह को अपनाया और अपनी अदाकारी से उस दृश्य को यादगार बना दिया।

4. रंजीत और अमिताभ एक ही फिल्म में, लेकिन साथ में कोई सीन नहीं

‘मुकद्दर का सिकंदर’ में अभिनेता रंजीत ने भी अहम भूमिका निभाई थी। दिलचस्प बात यह है कि रंजीत और अमिताभ बच्चन इससे पहले भी फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ में साथ काम कर चुके थे।

बताया जाता है कि दोनों फिल्मों में कलाकार होने के बावजूद उनके बीच कोई साझा दृश्य नहीं था। यानी दर्शकों को दोनों दिग्गज कलाकारों को एक साथ पर्दे पर देखने का मौका नहीं मिला।

5. असरानी की जगह राम सेठी को मिला प्यारे लाल का किरदार

फिल्म में राम सेठी ने प्यारे लाल की भूमिका निभाई थी। यह किरदार सिकंदर का दोस्त था और अपने मजाकिया अंदाज से दर्शकों का मनोरंजन करता था।

किस्सों के मुताबिक, इस भूमिका के लिए पहले असरानी के नाम पर विचार किया गया था। लेकिन शूटिंग के दिन उनके सेट पर पहुंचने में परेशानी हुई। निर्देशक प्रकाश मेहरा को उस दिन दृश्य फिल्माना जरूरी था।

ऐसे में उन्होंने अपने सहायक राम सेठी को ही प्यारे लाल की भूमिका दे दी। आगे चलकर यह किरदार राम सेठी के करियर की यादगार भूमिकाओं में शामिल हो गया।

6. विनोद खन्ना से पहले शत्रुघ्न सिन्हा के नाम पर हुआ था विचार

फिल्म में विनोद खन्ना ने अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, बताया जाता है कि इस किरदार के लिए शुरुआत में शत्रुघ्न सिन्हा के नाम पर भी विचार किया गया था।

बाद में प्रकाश मेहरा ने विनोद खन्ना को इस भूमिका के लिए चुना। अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की जोड़ी ने फिल्म की कहानी को खास बनाया। दोनों कलाकारों की शानदार अदाकारी ने प्रेम त्रिकोण को प्रभावशाली बना दिया।

7. फिल्म के गानों ने भी मचाई थी धूम

‘मुकद्दर का सिकंदर’ की सफलता में इसके संगीत का भी बड़ा योगदान रहा। फिल्म का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था। गीतकार अंजान ने अधिकांश गाने लिखे, जबकि ‘सलाम-ए-इश्क मेरी जां’ के बोल प्रकाश मेहरा ने लिखे थे।

फिल्म के लोकप्रिय गीतों में शामिल हैं:

  • ओ साथी रे

  • दिल तो है दिल

  • प्यार जिंदगी है

  • सलाम-ए-इश्क मेरी जां

इन गानों को आज भी संगीत प्रेमी पसंद करते हैं। फिल्म का संगीत इसकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक माना जाता है।

1978 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल थी ‘मुकद्दर का सिकंदर’

करीब 1.20 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने उस दौर के उपलब्ध बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के अनुसार लगभग 8.50 करोड़ रुपये की कमाई की थी। यह 1978 की सबसे सफल फिल्मों में शामिल रही।

उसी साल अमिताभ बच्चन की ‘डॉन’, ‘त्रिशूल’, ‘कसमें वादे’ और ‘गंगा की सौगंध’ जैसी फिल्में भी रिलीज हुई थीं। उस दौर में अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता चरम पर थी।

‘मुकद्दर का सिकंदर’ को प्रकाश मेहरा की उन फिल्मों में भी गिना जाता है, जिन्होंने सिनेमास्कोप तकनीक के इस्तेमाल से बड़े पर्दे पर भव्य सिनेमाई अनुभव दिया।

आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है फिल्म

‘मुकद्दर का सिकंदर’ सिर्फ एक सफल फिल्म नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की यादगार विरासत का हिस्सा है। अमिताभ बच्चन का सिकंदर के रूप में दर्द, रेखा की अदाकारी, विनोद खन्ना की प्रभावशाली मौजूदगी और कादर खान के दमदार संवादों ने इसे खास बनाया।

फिल्म के रिलीज होने के कई दशक बाद भी इसके गाने और संवाद दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं। यही वजह है कि ‘मुकद्दर का सिकंदर’ आज भी हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शुमार है।

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