नई दिल्ली। देश की अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दोबारा न्यायिक जिम्मेदारी सौंपने की सुप्रीम कोर्ट की पहल बार संघों के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने गुरुवार को इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बार संघों के विरोध के चलते यह योजना लागू नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि कोई भी प्रधान न्यायाधीश वकील समुदाय को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
पूर्व सीजेआई बोबडे के कार्यकाल में शुरू हुई थी पहल
सीजेआई सूर्यकांत ने बताया कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और उनकी पीठ ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त करने की व्यवस्था को दोबारा शुरू करने की कोशिश की थी।
उन्होंने कहा कि इस पहल के पीछे उद्देश्य लंबित मामलों की संख्या कम करना और न्यायिक व्यवस्था को राहत देना था। योजना के तहत हाईकोर्ट में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अस्थायी रूप से फिर से नियुक्त किया जाना था।
बार संघों ने पारित किए थे विरोध प्रस्ताव
सीजेआई सूर्यकांत के मुताबिक, बार संघों के विरोध के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने कहा कि बार संघों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने शुरू कर दिए थे। ऐसे हालात में किसी भी प्रधान न्यायाधीश के लिए वकील समुदाय को नाराज करने का जोखिम उठाना मुश्किल होता है।
संविधान का अनुच्छेद 224ए देता है तदर्थ नियुक्ति का अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 224ए में उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अस्थायी रूप से फिर से न्यायाधीश नियुक्त करने का प्रावधान है। इसके तहत संबंधित उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की सहमति से किसी ऐसे व्यक्ति से न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है, जो उस हाईकोर्ट या किसी अन्य हाईकोर्ट में पहले न्यायाधीश रह चुका हो।
राजस्थान के न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता मामले में हुई टिप्पणी
सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ राजस्थान में न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति और लंबित मामलों के बोझ को कम करने की पहल पर सीजेआई ने यह टिप्पणी की।
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तदर्थ नियुक्ति को लंबित मामलों के निपटारे की दिशा में एक संभावित उपाय माना गया था, लेकिन बार संघों के विरोध के कारण इस पर आगे काम नहीं हो सका।

