धनबाद: किसी के लिए मैदान सिर्फ खेल और दौड़ की जगह हो सकता है, लेकिन धनबाद की संगीता सोरेन के लिए यही मैदान अब युवाओं के सपनों को आकार देने वाली पाठशाला बन चुका है। यहां न ब्लैकबोर्ड है, न किताबें और न ही महंगी कोचिंग फीस। यहां युवाओं को सरकारी नौकरी की शारीरिक परीक्षा के लिए दौड़, एक्सरसाइज और अनुशासन की ट्रेनिंग दी जाती है, वह भी बिल्कुल निःशुल्क।
संगीता खुद एक खिलाड़ी रही हैं और फुटबॉल में झारखंड से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। जिला स्तर से शुरू हुआ उनका सफर राज्य और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचा। अंडर-18 और अंडर-19 स्तर पर उन्होंने भूटान और थाईलैंड में भारत का प्रतिनिधित्व किया। थाईलैंड में एएफसी क्वालीफायर में खेलने का मौका भी मिला। कभी देश की जर्सी पहनना उनका सबसे बड़ा सपना था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद भी करियर को आगे बढ़ाने के लिए अपेक्षित सरकारी सहयोग और रोजगार नहीं मिल सका।
लगातार 16-17 साल फुटबॉल खेलने के बाद करीब ढाई से तीन साल पहले उन्हें इस खेल से दूरी बनानी पड़ी। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां भी ऐसी नहीं थीं कि वह बिना रोजगार के लंबे समय तक खेल के भरोसे अपना भविष्य आगे बढ़ा सकें। हालांकि, मैदान से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ। उन्होंने एथलेटिक्स में कदम रखा और 400 मीटर दौड़ की तैयारी शुरू कर दी। पिछले साल उन्होंने सिल्वर मेडल भी हासिल किया और अब राष्ट्रीय स्तर पर खेलने की तैयारी में जुटी हैं।
इसी दौरान मैदान में अभ्यास करने वाले कई युवा उनसे फिजिकल ट्रेनिंग के बारे में सलाह लेने लगे। इनमें आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवा भी बड़ी संख्या में थे, जिनके लिए महंगी कोचिंग का खर्च उठाना मुश्किल था। संगीता ने इन युवाओं की परेशानी को अपने संघर्ष से जोड़ा और उन्हें मुफ्त ट्रेनिंग देने का फैसला किया। धीरे-धीरे यह मैदान युवाओं की ऐसी पाठशाला बन गया, जहां फीस की जगह मेहनत और गुरु दक्षिणा की जगह नौकरी में सफलता को महत्व दिया जाने लगा।
संगीता कहती हैं कि उन्होंने जिला स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फुटबॉल खेला, लेकिन खेल के बाद के भविष्य के लिए उन्हें वह सहयोग नहीं मिला जिसकी जरूरत थी। अब वह खुद एथलेटिक्स में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं और साथ ही युवाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं। उनका कहना है कि वह बच्चों से कोई फीस नहीं लेतीं और उनके लिए सबसे बड़ी गुरु दक्षिणा यही है कि उनके बच्चे नौकरी हासिल करें।
इस अनोखे प्रयास में संगीता के साथ उमेश कुमार यादव भी युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं। उनके मुताबिक, करीब तीन वर्षों से मैदान में युवाओं को बिना किसी शुल्क के ट्रेनिंग दी जा रही है। इस प्रशिक्षण से कई युवाओं को सरकारी नौकरी की शारीरिक परीक्षा में सफलता मिली है। वर्ष 2024 में यहां अभ्यास करने वाले करीब आठ युवाओं का SSC GD में चयन हुआ। अग्निवीर भर्ती में लगभग दस और होमगार्ड में करीब 30 युवाओं के चयन की बात भी सामने आई है। बिहार पुलिस में भी यहां तैयारी करने वाली कुछ लड़कियों ने सफलता हासिल की है।
यहां प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं के अनुभव भी इस पहल की तस्वीर साफ करते हैं। दिल्ली पुलिस में क्वालीफाई कर चुके सोनू शर्मा बताते हैं कि उन्होंने करीब छह महीने तक यहां अभ्यास किया। इस दौरान उनकी 1600 मीटर दौड़ में काफी सुधार हुआ। उनके मुताबिक, संगीता और उमेश जैसे लोग बहुत कम हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के युवाओं की मदद कर रहे हैं। उनका मानना है कि संगीता अपने अधूरे सपनों को युवाओं की सफलता के जरिए पूरा कर रही हैं।
अग्निवीर की तैयारी कर रहे मुकेश कुमार भी करीब छह महीने से यहां अभ्यास कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले उन्हें रनिंग की सही तकनीक की जानकारी नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद दौड़ने का तरीका समझ आया और प्रदर्शन में सुधार हुआ। वहीं, सूरज करीब एक साल से यहां तैयारी कर रहे हैं। वह आईआरबी ग्रुप डी की रनिंग क्वालीफाई कर चुके हैं और अब आगे की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यहां रनिंग और एक्सरसाइज की अच्छी ट्रेनिंग दी जाती है और इसके लिए किसी तरह की फीस नहीं ली जाती।
होमगार्ड भर्ती की प्रक्रिया में फिजिकल, मेडिकल और डॉक्यूमेंटेशन पूरा कर चुकीं कल्पना कुमारी भी करीब एक साल तक इसी मैदान में तैयारी करती रहीं। वह संगीता को सिर्फ ट्रेनर नहीं, बल्कि संघर्ष से आगे बढ़ने वाली खिलाड़ी के रूप में देखती हैं। कल्पना का कहना है कि अगर युवा पूरी लगन और अनुशासन के साथ यहां अभ्यास करें तो सफलता हासिल कर सकते हैं। उनके मुताबिक, सरकार को ऐसे खिलाड़ियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया है।
कारा विभाग में कक्षपाल पद की तैयारी कर रहे मुमताज अंसारी भी संगीता के संघर्ष को करीब से जानते हैं। उनका कहना है कि संगीता को वह करीब दस वर्षों से जानते हैं। पहले उन्हें फुटबॉल खेलते देखा और अब युवाओं को प्रशिक्षण देते हुए देख रहे हैं। उनके मुताबिक, सरकार की ओर से जितना सहयोग ऐसे खिलाड़ियों को मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल पाया। यदि उन्हें उचित मदद मिले तो वह खुद भी आगे बढ़ सकती हैं और झारखंड के युवाओं को भी आगे ले जा सकती हैं।
संगीता का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों के भविष्य को लेकर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए। उनका कहना है कि झारखंड से बहुत कम खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच पाते हैं। ऐसे खिलाड़ियों को खेल करियर खत्म होने के बाद रोजगार और आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, ताकि उन्हें अपने भविष्य के लिए संघर्ष न करना पड़े।
संगीता के परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं है। उनके माता-पिता उम्रदराज हैं और परिवार की जिम्मेदारियों में उनके भाई मजदूरी कर सहयोग करते हैं। संगीता ने 12वीं तक पढ़ाई की है और आगे की पढ़ाई भी जारी रख रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की जर्सी पहन चुकीं संगीता का यह संघर्ष बताता है कि खेल प्रतिभा और आर्थिक सुरक्षा के बीच आज भी बड़ी दूरी मौजूद है।
फिलहाल संगीता की अपनी नजर 400 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने पर है। वह खुद भी रोज मैदान में पसीना बहा रही हैं और साथ ही दूसरे युवाओं को उनके लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं। उनका सपना है कि मैदान की सुविधाएं बेहतर हों, युवाओं को अच्छी ट्रेनिंग और संसाधन मिलें और आर्थिक कमजोरी किसी प्रतिभाशाली युवा के सपने के रास्ते में बाधा न बने। जिस मैदान में कभी उन्होंने अपने सपनों के लिए दौड़ लगाई थी, आज वहीं से वह दूसरे युवाओं के भविष्य की दौड़ को नई दिशा दे रही हैं।


