हैदराबाद: तेलंगाना के सिकंदराबाद स्थित बोल्लारम में मद्रास रेजिमेंट के शस्त्रागार से हथियार चोरी होने का मामला चार दिन बाद भी सुलझ नहीं पाया है। चोरी हुए हथियार अब तक बरामद नहीं किए जा सके हैं और संदिग्धों की पहचान भी नहीं हुई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सेना, स्थानीय पुलिस, खुफिया ब्यूरो और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) समेत विभिन्न एजेंसियां जांच में जुटी हैं। अब तक बड़ी संख्या में लोगों से पूछताछ की जा चुकी है।
जांच के दौरान शस्त्रागार की सुरक्षा व्यवस्था और रिकॉर्ड में कई खामियां सामने आई हैं। जिस कमरे में हथियार रखे गए थे, वहां लगे CCTV कैमरे घटना के समय काम नहीं कर रहे थे। अधिकारियों के अनुसार, कैमरे करीब 10 दिनों से नियमित रूप से बंद थे। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कैमरे किसके निर्देश पर बंद किए गए और क्या इसका चोरी की घटना से कोई संबंध है।
मामले की जांच का केंद्र मद्रास रेजिमेंट का ‘कोटे’ क्षेत्र बना हुआ है, जहां हथियार और गोला-बारूद रखे जाते हैं। शुरुआती जांच में अधिकारियों को आशंका है कि शस्त्रागार तक पहुंचने के लिए एक से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं। इस वजह से अंदरूनी मदद की संभावना को भी गंभीरता से जांचा जा रहा है।
हथियार चोरी में संभावित आतंकी कनेक्शन की आशंका के बाद NIA भी जांच से जुड़ गई है। बोल्लारम पुलिस, सेना, खुफिया ब्यूरो और NIA के अधिकारी मिलकर मामले से जुड़े साक्ष्यों को खंगाल रहे हैं। बताया जा रहा है कि NIA के अधिकारियों ने कोटे क्षेत्र से कुछ महत्वपूर्ण सबूत भी जुटाए हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि कोटे परिसर में लगे CCTV कैमरे रात करीब 10:30 बजे के बाद बंद हो जाते थे और सुबह 7 बजे के बाद दोबारा चालू होते थे। अधिकारियों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कैमरों को इस तरह बंद रखने का कोई आदेश नहीं दिया गया था। ऐसे में जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कैमरों को बंद करने की व्यवस्था किसने की थी और घटना के दौरान निगरानी व्यवस्था क्यों निष्क्रिय थी।
मद्रास रेजिमेंट में करीब 800 लोगों के काम करने की जानकारी सामने आई है। घटना वाली रात कोटे और रेजिमेंट के अन्य हिस्सों में ड्यूटी पर तैनात कर्मियों से अलग-अलग पूछताछ की जा रही है। इसके अलावा पहले रेजिमेंट में काम कर चुके और बाद में दूसरी जगह स्थानांतरित किए गए कर्मचारियों से भी जानकारी ली जा रही है। जांच एजेंसियां संदिग्धों के मोबाइल फोन और संपर्कों की भी जांच कर रही हैं।
हथियारों और गोला-बारूद के रिकॉर्ड की जांच में भी महत्वपूर्ण सवाल उठे हैं। अधिकारियों के मुताबिक, चोरी से करीब 10 दिन पहले तक रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से दर्ज किए जा रहे थे, लेकिन उसके बाद हथियारों और गोला-बारूद की एंट्री से संबंधित विवरण में लापरवाही दिखाई देती है। इसी वजह से यह आशंका भी जताई जा रही है कि हथियार एक ही बार में नहीं, बल्कि कई दिनों के दौरान धीरे-धीरे बाहर निकाले गए हों।
सैन्य शस्त्रागार से अत्याधुनिक हथियारों के बाहर जाने की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। फिलहाल जांच अधिकारियों का मुख्य फोकस इस बात पर है कि चोरी हुए हथियार आखिर कहां हैं। एजेंसियां CCTV फुटेज, हथियारों के रिकॉर्ड, कर्मचारियों की गतिविधियों और संभावित अंदरूनी भूमिका समेत सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं।
अधिकारियों को आशंका है कि यदि हथियार और गोला-बारूद जल्द बरामद नहीं किए गए तो इसका गंभीर सुरक्षा प्रभाव हो सकता है। इसी कारण जांच को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है और संभावित आतंकी कनेक्शन समेत किसी भी संभावना को फिलहाल खारिज नहीं किया जा रहा है।

