नई दिल्ली: दुनिया को जिस नक्शे के जरिए लंबे समय से देखा और समझा जाता रहा है, उसे लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में बड़ा फैसला हुआ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के मानचित्र को अधिक वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने वाले एक नए कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन को समर्थन दिया है। टोगो की ओर से पेश किए गए ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव को फ्रांस और ब्रिटेन समेत 164 देशों ने समर्थन दिया। अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जबकि छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में नए नक्शे को ‘इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन’ नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और महाद्वीपों के वास्तविक सापेक्ष आकार को अधिक सही तरीके से दिखाना है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इससे सरकारों और संस्थानों को पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन के विकल्पों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
नए नक्शे की चर्चा की सबसे बड़ी वजह अफ्रीका का आकार है। लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे मर्केटर प्रोजेक्शन में अफ्रीका वास्तविक आकार से काफी छोटा दिखाई देता है। इस नक्शे में अफ्रीका और ग्रीनलैंड लगभग समान आकार के नजर आते हैं, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना अधिक है।
मर्केटर प्रोजेक्शन को 1569 में फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्राओं और नेविगेशन को आसान बनाना था। इस प्रोजेक्शन में दिशा और कोण को अपेक्षाकृत सही रखने पर जोर दिया गया, लेकिन इसके कारण ध्रुवों के करीब स्थित इलाकों का आकार वास्तविकता से काफी बड़ा दिखाई देता है।
दरअसल, पृथ्वी का आकार तीन आयामी है, जबकि उसे कागज या स्क्रीन जैसे दो आयामी माध्यम पर दिखाना पड़ता है। इसी वजह से किसी भी विश्व मानचित्र में कुछ न कुछ विकृति आना स्वाभाविक है। मर्केटर प्रोजेक्शन में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के करीब के क्षेत्र ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं। इसका असर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे महाद्वीपों के दृश्य आकार पर भी पड़ता है।
इसी समस्या को दूर करने की दिशा में 2018 में कार्टोग्राफरों की एक टीम ने ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ तैयार किया था। इसमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के क्षेत्रफल को अधिक वास्तविक अनुपात में दिखाने की कोशिश की गई। फरवरी में अफ्रीकी संघ के 54 सदस्य देशों ने भी इस प्रोजेक्शन को अपनाने का समर्थन किया था।
टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डसी ने संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश करते हुए नक्शे को लेकर एक व्यापक तर्क दिया। उनका कहना था कि दुनिया को देखने का नजरिया केवल राजनीतिक या आर्थिक नीतियों से तय नहीं होता, बल्कि नक्शे भी लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं। उनके अनुसार, एक अधिक निष्पक्ष दुनिया की शुरुआत अधिक निष्पक्ष नक्शे से हो सकती है।
कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले का स्वागत किया है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि नक्शा बदलने से दुनिया नहीं बदलती, लेकिन दुनिया को गलत तरीके से दिखाने वाले नक्शे को सुधारना वास्तविकता की ओर एक कदम है। उन्होंने मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल बंद करने की योजना का भी संकेत दिया।
वहीं, अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस कदम पर असहमति जताई। अमेरिका का कहना है कि महासभा को अधिक गंभीर वैश्विक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हालांकि, समर्थकों का तर्क है कि नक्शे केवल यात्रियों या भौगोलिक जानकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले साधन नहीं हैं, बल्कि वे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के प्रति लोगों की धारणा को भी प्रभावित करते हैं।
इस बदलाव का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। नए प्रोजेक्शन में भारत की भौगोलिक स्थिति पहले की तरह ही रहेगी। भारत का आकार, सीमाएं और नक्शे पर उसका स्थान बदला नहीं गया है। यानी भारत पहले जहां दिखाई देता था, नए नक्शे में भी वहीं दिखाई देगा।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मर्केटर नक्शा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। समुद्री और हवाई नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल जारी रहेगा। इसकी खासियत यह है कि इसमें दिशाओं और कोणों को इस तरह प्रदर्शित किया जाता है, जिससे यात्राओं और दिशा-निर्धारण में काफी मदद मिलती है।
इस तरह संयुक्त राष्ट्र का नया फैसला दुनिया के नक्शे को पूरी तरह बदलने के बजाय पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों के आकार को अधिक वास्तविक तरीके से दिखाने की दिशा में एक कदम है। खास तौर पर अफ्रीका जैसे महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के करीब दिखाने से दुनिया के भौगोलिक संतुलन को समझने का नजरिया बदल सकता है।

