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सरकार भी मुकदमेबाजी से त्रस्त: अदालतों-ट्रिब्यूनल्स में 7 लाख से ज्यादा सरकारी मामले लंबित

नई दिल्ली: केंद्र सरकार खुद देश की अदालतों और ट्रिब्यूनलों में बड़ी संख्या में मुकदमों में पक्षकार है। कानून मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 18 मार्च 2025 तक केंद्र सरकार से जुड़े 7,26,901 मामले विभिन्न अदालतों और ट्रिब्यूनलों में लंबित थे। इनमें सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, निचली अदालतों के साथ-साथ विभिन्न ट्रिब्यूनल भी शामिल हैं।

सरकारी मुकदमों का यह बड़ा आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है, जब केंद्र सरकार लंबे समय से अपनी litigation policy को कम करने और अनावश्यक मुकदमों से बचने पर जोर दे रही है। सरकार ने अप्रैल 2025 में सरकारी मुकदमों के प्रभावी प्रबंधन को लेकर नई दिशा-निर्देश व्यवस्था भी लागू की है।

कहां कितने सरकारी मामले लंबित?

कानून मंत्रालय के Legal Information Management & Briefing System (LIMBS) के आंकड़ों के अनुसार 18 मार्च 2025 तक केंद्र सरकार से जुड़े कुल 7,26,901 मामले लंबित थे।

इनका ब्योरा इस प्रकार है:

  • सुप्रीम कोर्ट: 19,442 मामले
  • हाईकोर्ट: 2,68,645 मामले
  • ट्रिब्यूनल: 2,80,650 मामले
  • निचली अदालतें: 1,58,164 मामले
  • कुल: 7,26,901 मामले

यानी सरकारी मुकदमों का सबसे बड़ा हिस्सा ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट में लंबित है।

वित्त मंत्रालय सबसे ज्यादा मुकदमों में पक्षकार

सरकारी विभागों में वित्त मंत्रालय सबसे ज्यादा लंबित मामलों वाले मंत्रालयों में शामिल है। जनवरी 2026 में राज्यसभा में दिए गए जवाब के अनुसार 29 जनवरी 2026 तक वित्त मंत्रालय से जुड़े 2,04,765 मामले लंबित थे।

इसी अवधि में:

मंत्रालय/विभाग लंबित मामले
वित्त मंत्रालय 2,04,765
रक्षा मंत्रालय 95,498
भारतीय रेलवे 1,19,142
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय 77,005
कुल 4,96,410

ये आंकड़े केवल इन चार मंत्रालयों से जुड़े मामलों के हैं और इन्हें पूरे केंद्र सरकार के 7.26 लाख मामलों के आंकड़े के साथ सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों आंकड़ों की तारीख और कवरेज अलग है।

सरकारी मुकदमों पर कितना पैसा खर्च हो रहा?

सरकार को इन मुकदमों की वजह से कानूनी खर्च भी उठाना पड़ता है। कानून मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में अप्रैल 2025 में दिए गए आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार का मुकदमेबाजी खर्च लगातार बढ़ा है।

पिछले पांच वित्तीय वर्षों में खर्च इस प्रकार रहा:

  • 2020-21: ₹58.44 करोड़
  • 2021-22: ₹48.57 करोड़
  • 2022-23: ₹57.45 करोड़
  • 2023-24: ₹66.58 करोड़
  • 2024-25: ₹85.89 करोड़

इस आंकड़े से साफ है कि 2024-25 में केंद्र सरकार का मुकदमेबाजी खर्च पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहा।

सरकार ने मुकदमे कम करने के लिए क्या कदम उठाए?

सरकार का कहना है कि वह अनावश्यक मुकदमों को कम करने और अदालतों में लंबित मामलों के बेहतर प्रबंधन के लिए कई कदम उठा रही है।

4 अप्रैल 2025 को Department of Legal Affairs ने केंद्र सरकार के मुकदमों के प्रभावी प्रबंधन को लेकर नई Directive for the Efficient and Effective Management of Litigation by the Government of India जारी की थी।

इसका उद्देश्य सरकारी मुकदमों को रोकना, नियंत्रित करना और अनावश्यक litigation को कम करना है। यह व्यवस्था केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, अधीनस्थ कार्यालयों, स्वायत्त संस्थाओं और कुछ मामलों में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर भी लागू होती है।

LIMBS पोर्टल पर सरकारी मुकदमों की निगरानी

सरकार ने सरकारी मुकदमों को एक जगह ट्रैक करने के लिए Legal Information Management & Briefing System यानी LIMBS विकसित किया है।

सरकार की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक LIMBS में केंद्र सरकार के मुकदमों का एकीकृत डेटाबेस तैयार किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार सिस्टम में 13.05 लाख कोर्ट केस, जिनमें निपटाए जा चुके मामले भी शामिल हैं, दर्ज थे। इसमें हजारों सरकारी अधिकारियों और पैनल व अन्य वकीलों की जानकारी भी शामिल है।

LIMBS को सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, जिला एवं सत्र अदालतों और कई ट्रिब्यूनलों के साथ API के जरिए जोड़ने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई है।

देश में कुल कितने मामले लंबित हैं?

सरकारी मुकदमों के आंकड़े को देश की कुल न्यायिक लंबितता से अलग समझना जरूरी है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में 92,118 मामले लंबित थे। वहीं हाईकोर्ट में 63,70,904 और जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में 4,43,45,599 मामले लंबित थे।

इससे पता चलता है कि देश में कुल न्यायिक लंबित मामलों की संख्या सरकारी मुकदमों की तुलना में कहीं अधिक है।

कानून मंत्रालय ने पहले भी यह स्पष्ट किया है कि सरकार से जुड़े मुकदमे न्यायिक लंबितता का एक हिस्सा हैं और इन्हें पूरे न्यायिक backlog का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।

सरकार क्यों घटाना चाहती है मुकदमों का बोझ?

सरकार का बड़ी संख्या में मुकदमों में पक्षकार होना कई स्तरों पर असर डालता है। एक ओर अदालतों पर अतिरिक्त कानूनी काम बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर सरकारी विभागों को वकीलों, कानूनी सलाह और अदालती प्रक्रिया पर खर्च करना पड़ता है।

किसी सरकारी आदेश, अधिसूचना या प्रशासनिक निर्णय के खिलाफ मुकदमा होने पर संबंधित विभाग को लंबे समय तक मामले की पैरवी करनी पड़ सकती है। कई मामलों में अपील की प्रक्रिया भी मुकदमे को वर्षों तक खींच सकती है।

इसी वजह से सरकार की नई litigation policy में अनावश्यक अपीलों को कम करने और मुकदमों के मूल कारणों की पहचान पर जोर दिया गया है।

7 लाख मामलों का आंकड़ा क्या बताता है?

7,26,901 लंबित सरकारी मामलों का आंकड़ा यह दिखाता है कि केंद्र सरकार की न्यायिक मौजूदगी कितनी व्यापक है। हालांकि, इस आंकड़े को मौजूदा कुल लंबित सरकारी मामलों का बिल्कुल ताजा आंकड़ा मानना सही नहीं होगा, क्योंकि यह 18 मार्च 2025 की स्थिति पर आधारित है।

इसके बाद सरकार ने litigation management को बेहतर बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश और डिजिटल एकीकरण पर काम किया है। इसलिए आगे LIMBS के अपडेटेड आंकड़े यह तस्वीर और स्पष्ट कर सकते हैं कि सरकारी मामलों की संख्या किस दिशा में बढ़ रही है या घट रही है।

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