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जीविका से खुली किस्मत: घूंघट की बंदिशें तोड़ अर्चना बनीं ‘बैंक वाली दीदी’, अब हर महीने कमा रहीं 25 हजार रुपये

आरा (भोजपुर): घर की चारदीवारी, चौका-चूल्हा और घूंघट तक सिमटी जिंदगी वाली अर्चना कुमारी आज पूरे इलाके में ‘बैंक वाली दीदी’ के नाम से पहचानी जाती हैं। बिहार के भोजपुर जिले के पीरो प्रखंड के एयार गांव की 32 वर्षीय अर्चना दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक का ग्राहक सेवा केंद्र (CSP) चलाती हैं और हर महीने करीब 25 हजार रुपये कमा रही हैं।

पहले सिर्फ घर तक सीमित थी दुनिया

अर्चना की जिंदगी पहले सिर्फ घर-गृहस्थी और दो बच्चों की परवरिश तक सीमित थी। पति की आमदनी सीमित थी और परिवार का बैंक खाता तक नहीं था। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी।

वर्ष 2017 में अर्चना पार्वती जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह की बैठकों और गतिविधियों ने उन्हें घर की दहलीज से बाहर निकलने का मौका दिया। आत्मनिर्भर बनने की इच्छा मजबूत हुई और उन्होंने बैंक में अपना जनधन खाता खुलवाया।

कैसे शुरू हुआ बैंक वाली दीदी का सफर?

2018 में उन्हें ग्राहक सेवा केंद्र चलाने की जानकारी मिली। शिवा जीविका महिला ग्राम संगठन ने उनका चयन किया। बैंक में साक्षात्कार और तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण के बाद उन्हें खाता खोलने, आधार से जुड़ी जमा-निकासी और बीमा सेवाओं की ट्रेनिंग दी गई।

संगठन ने केंद्र शुरू करने के लिए 70 हजार रुपये दिए (50 हजार ऋण + 20 हजार अनुदान)। इसी पैसे से अर्चना ने लैपटॉप, प्रिंटर और फिंगरप्रिंट मशीन खरीदी। 23 मई 2018 को पीरो में उनका ग्राहक सेवा केंद्र शुरू हो गया।

आज कितना हो रहा है बिजनेस?

आज उनके केंद्र से हर महीने डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का बैंकिंग लेन-देन हो रहा है। इससे उन्हें करीब 25 हजार रुपये प्रतिमाह की कमाई हो रही है। गांव और आसपास के लोगों को अब बैंकिंग सेवाओं के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। जीविका समूह की महिलाएं भी उनके केंद्र पर आती हैं।

अर्चना अब अन्य महिलाओं को बैंकिंग और बीमा सेवाओं की जानकारी भी देती हैं। वह कहती हैं, “जीविका और सरकारी योजनाओं ने हम जैसी महिलाओं को जीवन बेहतर बनाने का मौका दिया है। कभी घर की जिम्मेदारियों में उलझी थी, अब दूसरों के आर्थिक कामों में मदद करती हूं।”

प्रेरणा की मिसाल

अर्चना कुमारी की कहानी बिहार की उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो जीविका समूहों और सरकारी योजनाओं के जरिए आत्मनिर्भर बन रही हैं। घूंघट से निकलकर बैंक वाली दीदी बनना सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण है।

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