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संवैधानिक मामलों में देरी पर SC चिंतित, CJI से स्थायी 5 जजों की पीठ पर विचार को कहा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मामलों की सुनवाई और बड़ी पीठों को भेजे गए मामलों के निपटारे में होने वाली देरी को लेकर चिंता जताई है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से शुद्ध संवैधानिक सवालों की सुनवाई के लिए स्थायी पांच जजों की संविधान पीठ गठित करने की आवश्यकता पर विचार करने का अनुरोध किया है।

पीठ ने कहा कि बड़ी पीठों को भेजे गए मामलों के निपटारे में कई बार वर्षों लग जाते हैं। अदालत ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि संस्थागत स्तर पर इस पर आत्ममंथन की आवश्यकता है।

CEC-EC नियुक्ति कानून से जुड़ा मामला

यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। इस मामले में दो जजों की पीठ की राय अलग-अलग रही कि क्या याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को मौजूदा दो सदस्यीय पीठ द्वारा तय किए जाने की राय रखी, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने माना कि इसमें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल शामिल हैं, जिन पर बड़ी पीठ द्वारा विचार किया जाना चाहिए।

दोनों जजों ने इस बात पर सहमति जताई कि मतभेद के बाद मामले को सामान्य प्रक्रिया के तहत तीन जजों की पीठ के पास भेजने से सुनवाई में और देरी हो सकती है। इसलिए मामले को CJI के समक्ष रखा जाएगा, ताकि उचित संख्या वाली संविधान पीठ के गठन पर निर्णय हो सके।

वर्षों तक लंबित रहते हैं संवैधानिक मामले

पीठ ने संविधान पीठों के पास भेजे गए मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने का भी उल्लेख किया। अदालत ने Anoop Baranwal मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि यह मामला 2015 में शुरू हुआ, 2018 में संविधान पीठ को भेजा गया और 2023 में फैसला आया।

इसी तरह State of Uttar Pradesh बनाम Jai Bir Singh मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें बड़ी पीठ के पास भेजे गए संदर्भ को आगे की संविधान पीठ तक पहुंचने में कई वर्ष लगे।

पीठ ने कहा कि पांच से लेकर 20 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक संवैधानिक संदर्भों का लंबित रहना न्यायिक संस्था के लिए उचित स्थिति नहीं है। इसी संदर्भ में CJI से स्थायी पांच जजों की पीठ गठित करने की संभावना तलाशने का अनुरोध किया गया।

2023 के कानून को लेकर क्या है विवाद?

मामला Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 से जुड़ा है। इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल हैं।

याचिकाओं में कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। अब मामले को CJI के समक्ष रखा जाएगा, जहां आगे की सुनवाई के लिए उचित पीठ के गठन पर निर्णय होगा।

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