उज्जैन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद-2026 को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने धर्म की अवधारणा, दैनिक जीवन में आचरण, पर्यावरण संरक्षण और युवाओं की जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर बात की। कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। आयोजक संस्था के अनुसार, कार्यक्रम में करीब 1,600 से 1,700 युवा प्रतिभागी शामिल हुए।
धर्म को केवल ‘रिलिजन’ मानना उचित नहीं: भागवत
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को समझने के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर विचार करना जरूरी है। उनके अनुसार, भारत में धर्म की अवधारणा पश्चिमी देशों में प्रचलित ‘रिलिजन’ की अवधारणा से अलग है।
उन्होंने धर्म को जीवन, कर्तव्य और आचरण से जोड़ते हुए कहा कि इसे केवल किसी पूजा-पद्धति या मत तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। भागवत के मुताबिक, धर्म का संबंध व्यक्ति के व्यवहार और जिम्मेदारियों से भी है।
कचरा नहीं करना और ट्रैफिक नियम मानना भी आचरण का हिस्सा
भागवत ने धर्म को रोजमर्रा के व्यवहार से जोड़ते हुए उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर कचरा नहीं फैलाना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना और दूसरे लोगों की उपासना पद्धति का सम्मान करना भी जिम्मेदार आचरण का हिस्सा है।
उन्होंने युवाओं से धर्म को केवल चर्चा या सैद्धांतिक विषय के रूप में न देखकर उसे अपने व्यवहार में उतारने की बात कही।
युवाओं को लेकर क्या संदेश दिया?
भागवत ने कहा कि धर्म को केवल बुजुर्गों से जुड़ा विषय मानना सही नहीं है। उन्होंने युवाओं के बीच धर्म को लेकर हो रही चर्चा पर खुशी जताई। उनके अनुसार, धर्म को समझने और व्यवहार में लाने के लिए नियमित अभ्यास जरूरी है।
युवाओं के लिए संबोधन में प्रमुख बिंदु:
- धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखें।
- अपने दैनिक व्यवहार में जिम्मेदारी निभाएं।
- दूसरे मत और उपासना पद्धतियों का सम्मान करें।
- प्रकृति और जीव-जगत के प्रति संवेदनशील रहें।
- सफलता के साथ जीवन की सार्थकता पर भी विचार करें।
- किसी विषय पर राय बनाने से पहले उसे समझने का प्रयास करें।
प्रकृति और जीव-जगत की रक्षा पर जोर
मोहन भागवत ने पर्यावरण संरक्षण को भी धर्म और कर्तव्य से जोड़ा। उन्होंने कहा कि मनुष्य की जिम्मेदारी केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, वनस्पति और जीव-जगत के प्रति संवेदनशील रहना भी जरूरी है।
उन्होंने पर्यावरण के नुकसान और वन्य जीवों के सामने मौजूद चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ असंतुलन भविष्य के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने युवाओं से जीवन को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय व्यापक उद्देश्य और जिम्मेदारी से जोड़ने की बात कही।
बिना नाम लिए पाकिस्तान का भी जिक्र
अपने संबोधन में भागवत ने एक पड़ोसी देश का नाम लिए बिना उसके साथ भारत के संबंधों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह देश भारत से द्वेष रखता है और कई बार परेशानी पैदा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने संकट के समय सहायता करने की अपनी परंपरा को बनाए रखा है।
यह हिस्सा उनके संबोधन में भारत की धार्मिक और नैतिक अवधारणा के संदर्भ में आया।
‘भारत’ और भारतीय जीवन मूल्यों पर भी चर्चा
कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भी युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जुड़े विषयों पर बात की।
कार्यक्रम के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने युवाओं से किसी भी विषय पर राय बनाने से पहले स्वयं विचार करने और अपने प्रश्नों को समझने की बात कही। उन्होंने आत्मबोध और भारतीय जीवन मूल्यों के संदर्भ में युवाओं की भूमिका पर विचार रखा।
युवा धर्म संसद में देशभर से पहुंचे प्रतिभागी
‘युवा धर्म संसद-2026’ तीन दिवसीय आयोजन है। आयोजकों के मुताबिक इसमें धर्म, संस्कृति, शिक्षा, तकनीक, सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय मूल्य और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। देश के कई राज्यों से युवा, शिक्षाविद, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य इसमें शामिल हुए।
धर्म को व्यवहार से जोड़ने पर रहा जोर
मोहन भागवत के संबोधन में धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठान या पूजा तक सीमित न रखकर दैनिक आचरण, कर्तव्य, सामाजिक जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ने पर जोर रहा। ‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ के अंतर पर उनके विचार कार्यक्रम के प्रमुख विषयों में रहे।

