रांची: कभी जंगलों में हथियार लेकर घूमने वाले हाथ अब किताब, सिलाई के औजार और खेती-किसानी के काम में जुटे हैं। हजारीबाग स्थित नक्सली ओपन जेल में आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों को सजा पूरी करने के साथ-साथ सामान्य जिंदगी के लिए तैयार किया जा रहा है। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें रोजगारपरक कौशल का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि जेल से बाहर निकलने के बाद वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें और समाज की मुख्यधारा में दोबारा स्थापित हो सकें।
ओपन जेल में बदल रही जिंदगी की तस्वीर
हजारीबाग के ओपन जेल में रह रहे आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए अब सिर्फ जेल की अवधि पूरी करना ही उद्देश्य नहीं है। उन्हें शिक्षा के साथ-साथ ऐसे काम सिखाए जा रहे हैं, जिनसे भविष्य में रोजगार और आय का रास्ता तैयार हो सके।
कभी हथियार उठाने वाले कई बंदी अब सिलाई-कटाई, बुनाई, मुर्गी पालन और खेती-किसानी जैसे काम सीख रहे हैं। अचार बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए आवश्यक कौशल उपलब्ध कराना है।
ओपन जेल में 124 बंदी, 28 महिलाएं शामिल
हजारीबाग के नक्सली ओपन जेल में फिलहाल 124 बंदी रह रहे हैं। इनमें 96 पुरुष और 28 महिलाएं शामिल हैं। इनमें 11 पति-पत्नी के जोड़े भी हैं।
इन परिवारों के साथ नौ बच्चे भी ओपन जेल परिसर में रह रहे हैं। इनमें चार लड़के और पांच लड़कियां शामिल हैं। ऐसे में पुनर्वास की यह प्रक्रिया केवल पूर्व नक्सलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार और बच्चों के भविष्य से भी जुड़ी हुई है।
पुनर्वास नीति के तहत दिया जा रहा कौशल प्रशिक्षण
जेल आईजी सुदर्शन मंडल के मुताबिक, सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। फिलहाल उन्हें मुख्य रूप से मुर्गी पालन, कपड़ों की सिलाई-कटाई और बुनाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इससे पहले उन्हें अचार बनाने और खेती-किसानी से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया गया है। प्रशासन की कोशिश है कि प्रशिक्षण ऐसा हो, जिसका इस्तेमाल वे जेल से बाहर निकलने के बाद भी कर सकें।
प्रमुख प्रशिक्षण:
- मुर्गी पालन
- सिलाई-कटाई
- बुनाई
- खेती-किसानी
- अचार बनाने का प्रशिक्षण
- पढ़ाई और शिक्षा से जुड़ी गतिविधियां
जेल में रहते हुए हुनर को काम से जोड़ने की तैयारी
प्रशासन की योजना केवल प्रशिक्षण देने तक सीमित नहीं है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद पूर्व नक्सलियों को जेल में रहते हुए भी अपने हुनर का इस्तेमाल करने का अवसर देने की तैयारी है।
जेल परिसर में उपलब्ध जमीन पर खेती और मुर्गी पालन जैसी गतिविधियां कराई जा सकती हैं। वहीं सिलाई-कटाई के लिए प्रशिक्षण केंद्र शुरू किए जाने की योजना है। इससे प्रशिक्षण लेने वालों को अपने सीखे हुए कौशल का व्यावहारिक इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा।
तैयार उत्पादों को बाजार से जोड़ने की योजना
पूर्व नक्सलियों द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की भी योजना बनाई जा रही है। जेलों में निर्मित सामान की बिक्री के लिए गोडवाना आउटलेट, झुमका मॉल और जमशेदपुर के आउटलेट जैसे माध्यम उपलब्ध हैं।
इसके अलावा सरकारी विभागों, विधानसभा और अदालतों की ओर से भी जेल की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को विभिन्न सामान तैयार करने के ऑर्डर मिलते हैं। जेलों में कुर्सी, अलमारी और दूसरे फर्नीचर सहित कई तरह की सामग्री तैयार की जाती है।
इसी व्यवस्था को आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, ताकि प्रशिक्षण के बाद उनके लिए रोजगार और आय का रास्ता भी तैयार हो सके।
सबसे बड़ी चुनौती है सामान्य जिंदगी में वापसी
नक्सलवाद का रास्ता छोड़ने के बाद आत्मसमर्पित लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जिंदगी में लौटना है। रोजगार हासिल करना, परिवार की जिम्मेदारी संभालना, समाज में दोबारा अपनी जगह बनाना और बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाना उनके पुनर्वास का अहम हिस्सा है।
हजारीबाग का ओपन जेल इसी दिशा में कौशल विकास और शिक्षा के माध्यम से एक व्यवस्था तैयार करने की कोशिश कर रहा है। मकसद यह है कि जेल से बाहर निकलने के बाद इन लोगों के पास केवल अतीत की पहचान न हो, बल्कि भविष्य के लिए कोई रोजगारपरक हुनर भी हो।
बंदूक से किताब और हुनर तक का सफर
हजारीबाग ओपन जेल में आत्मसमर्पित नक्सलियों की जिंदगी में बदलाव की यह प्रक्रिया बताती है कि पुनर्वास केवल हथियार छोड़ने तक सीमित नहीं है। इसके साथ शिक्षा, कौशल, रोजगार और परिवार के भविष्य को भी जोड़ना जरूरी है।
जहां कभी उनके हाथों में हथियार हुआ करते थे, वहीं अब वही हाथ किताब, सिलाई के औजार और खेती-किसानी के काम में जुटे हैं। ओपन जेल प्रशासन की कोशिश है कि यह बदलाव जेल की चारदीवारी तक सीमित न रहे, बल्कि बाहर निकलने के बाद भी उनके लिए आत्मनिर्भर और सामान्य जीवन का आधार बने।


