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कानपुर से प्रयागराज के बीच मिली 200 KM लंबी प्राचीन नदी, अब भूजल रिचार्ज में होगा इस्तेमाल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भूजल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू होने जा रही है। कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबे पुराने नदी मार्ग यानी पैलियो चैनल की पहचान की गई है। यह प्राचीन नदी मार्ग जमीन की सतह से लगभग 25 मीटर नीचे स्थित बताया जा रहा है। अब इस प्राकृतिक संरचना का इस्तेमाल वर्षा जल को भूजल भंडार तक पहुंचाने और भूजल पुनर्भरण के लिए किए जाने की योजना है।

इस परियोजना को भूगर्भ जल विभाग राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (नमामि गंगे) के सहयोग से आगे बढ़ाएगा। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (NGRI) परियोजना को तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। अधिकारियों के अनुसार, इस पूरी परियोजना को करीब तीन वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

2022 में हुआ था शुरुआती सर्वे

भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के अनुसार, इस परियोजना को लेकर पहला सर्वे वर्ष 2022 में कराया गया था। इसके आधार पर अब विस्तृत अध्ययन और आगे की कार्रवाई शुरू की गई है।

NGRI के वैज्ञानिकों ने भूभौतिकीय सर्वे और बोरहोल जांच जैसी वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से पुराने नदी मार्ग की पहचान की। प्रारंभिक अध्ययन में सामने आया है कि कुछ स्थानों पर इस पैलियो चैनल की चौड़ाई चार से पांच किलोमीटर तक हो सकती है।

रेत और कंकड़ की परतें बनाएंगी भूजल रिचार्ज आसान

वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, पुराने नदी मार्ग वाले क्षेत्र में रेत और कंकड़ की परतें काफी मात्रा में मौजूद हैं। इन परतों की वजह से वर्षा का पानी जमीन के भीतर अपेक्षाकृत आसानी से पहुंच सकता है। इससे पानी के प्राकृतिक संचयन और भूजल स्तर को मजबूत करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।

अधिकारियों का कहना है कि इस अध्ययन से गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जलभंडार और पुराने नदी मार्गों की संरचना को समझने में मदद मिल रही है। इसी जानकारी के आधार पर ऐसे स्थानों की पहचान की जा रही है, जहां भूजल पुनर्भरण की परियोजनाएं प्रभावी तरीके से लागू की जा सकें।

कानपुर, फतेहपुर और कौशांबी में पायलट प्रोजेक्ट

परियोजना के पहले चरण में कानपुर, फतेहपुर और कौशांबी के छह स्थानों पर काम शुरू किया गया है। अध्ययन के दौरान 150 से अधिक संभावित स्थानों की पहचान की गई है। इन स्थानों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने के बाद भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त क्षेत्रों का चयन किया जाएगा।

पायलट प्रोजेक्ट से मिलने वाले परिणामों के आधार पर परियोजना को दूसरे क्षेत्रों तक विस्तार देने का फैसला लिया जाएगा। इससे यह भी आकलन किया जा सकेगा कि पुराने नदी मार्ग में वर्षा जल के पुनर्भरण की क्षमता कितनी है और इसका भूजल भंडार पर क्या प्रभाव पड़ता है।

बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने पर जोर

भूगर्भ जल विभाग के अनुसार, परियोजना का मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर नष्ट होने से रोकना और उसे भूजल भंडार में पहुंचाना है। वैज्ञानिक निगरानी के साथ जल संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने के कार्यक्रम भी परियोजना का हिस्सा होंगे।

इसके अलावा वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कानपुर से प्रयागराज के बीच पहचाना गया यह पैलियो चैनल कितना पुराना है और इसका भूगर्भीय इतिहास क्या रहा है। इस अध्ययन से क्षेत्र के भूजल संसाधनों और प्राचीन नदी तंत्र को समझने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

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