रांची: कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। इस कहावत को कोल इंडिया के पूर्व महाप्रबंधक डॉ. अशोक कुमार ने सच कर दिखाया है। 68 वर्ष की उम्र में उन्होंने रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग में दाखिला लेकर एक नई शैक्षणिक यात्रा शुरू की है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में लंबा करियर बनाने और दो बार सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी सीखने की ललक कम नहीं हुई है।
इंजीनियरिंग में बीटेक, एमटेक और पीएचडी की डिग्री
डॉ. अशोक कुमार ने एनआईटी जयपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने आईएसएम धनबाद से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट में एमटेक किया और इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल की। अपनी योग्यता और अनुभव के दम पर उन्होंने कोल इंडिया लिमिटेड में महाप्रबंधक (ईएंडएम) के पद तक का सफर तय किया।
30 सितंबर 2018 को 60 वर्ष की उम्र में वह कोल इंडिया से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने जेपी समूह में उपाध्यक्ष के रूप में काम किया और सलाहकार की जिम्मेदारी भी निभाई। 23 अक्टूबर 2025 को वह दूसरी बार सेवानिवृत्त हुए।
अब मानव मन और व्यवहार को समझने की चाह
तकनीकी क्षेत्र में वर्षों तक काम करने के बाद डॉ. अशोक कुमार अब मनोविज्ञान के माध्यम से इंसानी व्यवहार को समझना चाहते हैं। उनका मानना है कि इंजीनियरिंग ने उन्हें मशीनों को समझना सिखाया, जबकि मनोविज्ञान के अध्ययन से वह मानव मन की कार्यप्रणाली को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।
उनका यह निर्णय बताता है कि शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने या करियर बनाने तक सीमित नहीं है। नई चीजें सीखने की इच्छा व्यक्ति को जीवन के हर पड़ाव पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती है।
नियमित कक्षाओं में शामिल होते हैं डॉ. अशोक
डॉ. अशोक कुमार विश्वविद्यालय में एक सामान्य छात्र की तरह नियमित रूप से कक्षाओं में शामिल होते हैं। विषय को गहराई से समझने के लिए वह शिक्षकों से सवाल भी पूछते हैं।
रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. परवेज हसन ने उनके सीखने के उत्साह को असाधारण बताया। उनके अनुसार, जीवन में काफी कुछ हासिल कर लेने के बाद भी ज्ञान प्राप्त करने की ऐसी जिज्ञासा बहुत कम देखने को मिलती है।
युवाओं के लिए प्रेरणा हैं डॉ. अशोक कुमार
डॉ. अशोक कुमार की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो उम्र या जिम्मेदारियों के कारण अपनी नई शुरुआत के सपने छोड़ देते हैं। उनका उदाहरण बताता है कि सीखने की कोई अंतिम उम्र नहीं होती और ज्ञान हासिल करने की इच्छा हो, तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर नई राह चुनी जा सकती है।
उनकी नई शैक्षणिक यात्रा यह संदेश देती है कि सफलता का अर्थ केवल उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि जीवनभर सीखते रहना भी है।

