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ट्रेन की एक मुलाकात ने बदली धनबाद के अंकित की सोच: परिवार के संकल्प से 12 लोगों की जिंदगी में लौटी रौशनी

धनबाद। कभी-कभी जिंदगी में हुई छोटी-सी मुलाकात बड़ा बदलाव लेकर आती है। धनबाद के अंकित राजगढ़िया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। साल 2010 में जब अंकित 10वीं कक्षा के छात्र थे, तब वह कतरास से धनबाद तक प्रतिदिन ट्रेन से सफर करते थे।

एक दिन ट्रेन में उनकी मुलाकात एक नेत्रहीन बच्ची से हुई। बातचीत के दौरान अंकित ने उसकी जिंदगी की परेशानियों और चुनौतियों को करीब से समझा। बच्ची की बातें उन्हें भावुक कर गईं और पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि आंखों की रोशनी के बिना सामान्य जीवन कितना कठिन हो सकता है।

यही घटना आगे चलकर अंकित के लिए नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने वाले संकल्प की शुरुआत बनी।

ट्रेन से उतरकर सीधे आई-बैंक पहुंचे अंकित

अंकित बताते हैं कि नेत्रहीन बच्ची की परेशानी जानने के बाद वह ट्रेन से उतरकर सीधे शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आई-बैंक पहुंचे। वहां उन्होंने डॉक्टरों से जीते-जी नेत्रदान करने की इच्छा जताई।

आई-बैंक के डॉक्टरों ने उन्हें समझाया कि नेत्रदान मरणोपरांत ही संभव है। डॉक्टरों की बात सुनकर अंकित निराश नहीं हुए। उन्होंने इसके बजाय संकल्प लिया कि वह खुद नेत्रदान करेंगे और अपने परिवार के साथ समाज के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे।

मां और भाई ने दिया सबसे पहले साथ

अंकित ने जब अपने परिवार के सदस्यों को अपने इस संकल्प के बारे में बताया तो उनकी मां सरोज राजगढ़िया सबसे पहले तैयार हुईं। भाई सनोज ने भी उनका साथ देने की बात कही।

इसके बाद परिवार के अन्य सदस्य, रिश्तेदार, दोस्त और समाज के लोग भी इस मुहिम से जुड़ते गए। अंकित ने खुद देहदान का शपथ-पत्र भरा और अपनी मां से अंगदान का संकल्प-पत्र भी भरवाया।

परिवार के छह नेत्रदान से 12 लोगों को मिली रोशनी

अंकित की मुहिम के तहत परिवार में पहला नेत्रदान वर्ष 2012 में हुआ। उनके बड़े पापा 80 वर्षीय देवीप्रसाद राजगढ़िया ने रांची में अंतिम सांस ली थी। इसके बाद कश्यप मेमोरियल अस्पताल में उनका नेत्रदान कराया गया।

वर्ष 2014 में किडनी रोग से पीड़ित अंकित के पिता प्रकाशचंद्र राजगढ़िया के निधन के बाद उनका भी नेत्रदान कराया गया।

इसके बाद साल 2019 में बड़ी मां बिमला राजगढ़िया, 2021 में मामा सुरेश अग्रवाल, 2022 में कमला अग्रवाल और 2025 में चचेरे भाई आलोक राजगढ़िया के निधन के बाद नेत्रदान कराया गया।

अंकित का दावा है कि एक ही परिवार के छह लोगों का नेत्रदान कराना एक रिकॉर्ड उदाहरण है। इस पहल के लिए उन्हें दिल्ली समेत देश के कई शहरों में सम्मानित भी किया जा चुका है।

डॉक्टरों के मुताबिक, एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटाई जा सकती है। इस लिहाज से परिवार के छह नेत्रदान से 12 लोगों को दुनिया देखने का अवसर मिला है।

धनबाद में 42 लोगों का हुआ कॉर्निया ट्रांसप्लांट

एसएनएमएमसीएच के आई-बैंक में इन नेत्रदान से जुड़े प्रत्यारोपण संपन्न हुए। मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2018 से नेत्रदान कराया जा रहा है।

अस्पताल के अनुसार, अब तक यहां 90 लोगों ने नेत्रदान किया है, जबकि 42 लोगों का कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जा चुका है। इनमें कुछ लोगों ने जन्मजात कारणों से आंखों की रोशनी खोई थी, जबकि कुछ की आंखें बीमारी के कारण प्रभावित हुई थीं।

हालांकि, अस्पताल के अनुसार पिछले दो वर्षों से चिकित्सकों की कमी के कारण आई-बैंक बंद है।

एक ट्रेन यात्रा से शुरू हुई मुहिम आज भी जारी

2010 में ट्रेन में हुई एक मुलाकात ने अंकित राजगढ़िया की सोच बदल दी। एक नेत्रहीन बच्ची की जिंदगी की मुश्किलों को समझने के बाद शुरू हुई उनकी मुहिम ने परिवार के कई सदस्यों को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया।

आज अंकित का प्रयास सिर्फ अपने परिवार तक सीमित नहीं है। वह समाज के अन्य लोगों को भी नेत्रदान और अंगदान के लिए जागरूक करने में जुटे हैं, ताकि किसी की मृत्यु के बाद उसकी आंखें किसी दूसरे के जीवन में रोशनी बन सकें।

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