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सादगी ऐसी कि साइकिल गिरवी रखकर लड़ा चुनाव, निजी जिंदगी भी रही चर्चा में; जानें बागुन सुम्ब्रुई का सफर

जमशेदपुर: झारखंड की राजनीति में बागुन सुम्ब्रुई का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिनकी पहचान सिर्फ चुनावी जीत और राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं रही। उनका सादगी भरा जीवन, बेबाक अंदाज और आम लोगों के बीच सहज रहना उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाता था। धोती पहनने और कई बार नंगे पैर रहने वाले बागुन सुम्ब्रुई चाईबासा विधानसभा सीट से चार बार विधायक और सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद रहे।

उनकी राजनीतिक उपलब्धियों के साथ निजी जिंदगी भी लंबे समय तक चर्चा में रही। खासकर उनकी शादियों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे। वहीं, 1967 के पहले चुनाव से जुड़ा साइकिल गिरवी रखने का किस्सा उनकी सादगी और सीमित संसाधनों में चुनाव लड़ने की कहानी को सामने लाता है।

खबर की बड़ी बातें

  • बागुन सुम्ब्रुई चार बार चाईबासा विधायक और पांच बार सिंहभूम सांसद रहे।

  • उनकी शादियों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए।

  • कुछ रिपोर्टों में 23, 28 और 50 से अधिक शादियों का जिक्र मिलता है।

  • खुद बागुन सुम्ब्रुई ने अलग-अलग मौकों पर पांच पत्नियों के नाम स्वीकार किए थे।

  • 1967 में उन्होंने कथित तौर पर सिर्फ 910 रुपये में पहला चुनाव लड़ा।

  • प्रचार के दौरान साइकिल से घूमते थे और जरूरत पड़ने पर उसे 125 रुपये में बंधक रखने की बात सामने आई।

  • 22 जून 2018 को बागुन सुम्ब्रुई का निधन हुआ।

चाईबासा से शुरू हुई सियासी पारी

बागुन सुम्ब्रुई ने वर्ष 1967 में चाईबासा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। इसके बाद 1969 और 1972 में भी वे विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2000 में भी उन्होंने विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की।

सिंहभूम लोकसभा सीट पर भी उनका प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा। वे 1977, 1980, 1984, 1989 और 2004 में सांसद चुने गए। अपने राजनीतिक जीवन में वे बिहार सरकार में मंत्री रहे और झारखंड अलग राज्य बनने के बाद विधानसभा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।

सादगी बनी उनकी सबसे बड़ी पहचान

राजनीति में ऊंचे पदों तक पहुंचने के बावजूद बागुन सुम्ब्रुई ने अपनी जीवनशैली में बड़ा बदलाव नहीं किया। धोती पहनना, कई बार नंगे पैर रहना और आम लोगों के बीच बिना किसी तामझाम के मौजूद रहना उनकी पहचान थी।

उनकी सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरान भी वे साइकिल से क्षेत्र में घूमते थे। उनके राजनीतिक सफर से जुड़ा यह किस्सा आज भी कोल्हान की राजनीति में याद किया जाता है।

28 पत्नियों की चर्चा कैसे हुई?

बागुन सुम्ब्रुई की निजी जिंदगी का सबसे ज्यादा चर्चित पहलू उनकी शादियां रहीं। उनकी पत्नियों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे। कहीं यह संख्या 23 बताई गई तो कहीं 28 का जिक्र हुआ। कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 50 से अधिक और 58 तक बताई गई।

हालांकि, इन दावों में एकरूपता नहीं रही। खुद बागुन सुम्ब्रुई ने अलग-अलग मौकों पर पांच पत्नियों के नाम स्वीकार किए थे। ऐसे में उनकी शादियों को लेकर सामने आया आंकड़ा आज भी अलग-अलग दावों और किस्सों से जुड़ा हुआ है।

28 महिलाओं के दस्तावेजों का दावा

एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि करीब 28 महिलाओं के दस्तावेजों में बागुन सुम्ब्रुई का नाम पति के रूप में दर्ज था। इसी के बाद उनके साथ 28 शादियों का आंकड़ा जोड़े जाने की चर्चा तेज हुई।

बताया गया कि इस मामले की चर्चा बिहार विधानसभा तक भी पहुंची थी। बाद में एक साक्षात्कार में बागुन सुम्ब्रुई ने खुद इस पूरे मामले को लेकर अपना पक्ष रखा था।

शादियों को लेकर बागुन ने क्या कहा था?

अपनी निजी जिंदगी को लेकर उठने वाले सवालों पर बागुन सुम्ब्रुई ने अलग ही तर्क दिया था। उनका कहना था कि कई महिलाएं अपनी परेशानियां लेकर उनके पास आती थीं। इनमें विधवा और परित्यक्ता महिलाएं भी शामिल थीं।

उनका दावा था कि कुछ महिलाएं सरकारी नौकरी या अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने के लिए भी अपना नाम उनके साथ जोड़ती थीं। बागुन के अनुसार, उन्होंने जरूरतमंद महिलाओं को संरक्षण देने की कोशिश की थी।

910 रुपये में लड़ा था पहला चुनाव

बागुन सुम्ब्रुई की राजनीतिक सादगी का सबसे चर्चित किस्सा उनके पहले चुनाव से जुड़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1967 में उन्होंने महज 910 रुपये में अपना पहला चुनाव लड़ा था।

चुनाव प्रचार के दौरान वे साइकिल से इलाके में घूमते थे। आर्थिक जरूरत पड़ने पर उन्होंने अपनी साइकिल तक 125 रुपये में बंधक रख दी थी। सीमित संसाधनों के बावजूद चुनाव लड़ना और जीत हासिल करना उनकी राजनीतिक यात्रा की खास कहानी बन गया।

22 जून 2018 को हुआ निधन

लंबे राजनीतिक सफर के बाद 22 जून 2018 को बागुन सुम्ब्रुई का निधन हो गया। वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सियासी यात्रा, सादगी और निजी जिंदगी से जुड़े किस्से अब भी कोल्हान की राजनीतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं।

बागुन सुम्ब्रुई का जीवन झारखंड की उस दौर की राजनीति की एक अलग तस्वीर पेश करता है, जब सीमित संसाधनों के बावजूद जमीनी जुड़ाव और जनसमर्थन के दम पर राजनीति में लंबी पारी खेली जा सकती थी।

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