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गांव की महिलाएं रोजगार में आगे, शहरों में अब भी पीछे; देश की वर्कफोर्स में 40% तक पहुंची महिलाओं की हिस्सेदारी

हैदराबाद: भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। घर और परिवार तक सीमित मानी जाने वाली महिलाएं अब खेती, कारोबार, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर और दूसरे रोजगारों में अपनी भूमिका बढ़ा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 तक देश में महिला श्रम बल भागीदारी दर करीब 40 प्रतिशत पहुंच गई है। यानी लगभग 20 करोड़ महिलाएं देश की सक्रिय श्रम शक्ति का हिस्सा हैं। हालांकि, इस बढ़ोतरी में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका शहरी महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक रही है।

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के आंकड़ों के मुताबिक, 2017-18 में भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर 23.3 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में बढ़कर करीब 40 प्रतिशत हो गई। सात वर्षों के दौरान महिला वर्कफोर्स में यह बढ़ोतरी करीब दोगुनी है। इस बदलाव में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण रही है। ग्रामीण इलाकों में महिला वर्कफोर्स की हिस्सेदारी करीब 38 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह लगभग 25 प्रतिशत है।

ग्रामीण महिलाओं की अधिक भागीदारी की एक बड़ी वजह खेती, डेयरी, पशुपालन और घरेलू व्यवसायों से उनका जुड़ाव है। कृषि क्षेत्र की कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत बताई जाती है। इसके विपरीत, शहरों में महिलाओं के लिए नियमित और उपयुक्त रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत कम हैं। नौकरी की प्रकृति, काम के घंटे, सुरक्षा, सामाजिक मान्यताएं और परिवार की जिम्मेदारियां भी शहरी महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी को प्रभावित करती हैं।

देश की कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। 2018 में जहां करीब 10 करोड़ महिलाएं वर्कफोर्स का हिस्सा थीं, वहीं अब यह संख्या 20 करोड़ से अधिक हो चुकी है। हालांकि, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण और कृषि आधारित रोजगार से आया है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है और इस सेक्टर की कुल वर्कफोर्स में उनका हिस्सा एक-तिहाई से अधिक हो चुका है। करीब 2.3 करोड़ महिलाएं मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र से जुड़ी हैं।

कुछ राज्यों में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से भी अधिक बताई जा रही है। तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों में इस क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के अनुमानों के अनुसार, भारत का लक्ष्य 2050 तक महिला श्रम बल भागीदारी दर को 55 प्रतिशत तक पहुंचाना है।

इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर भारत अभी भी पीछे है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और विश्व बैंक के 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में काम करने योग्य उम्र की करीब 48.9 प्रतिशत महिलाएं श्रम बल का हिस्सा हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा करीब 40 प्रतिशत है। यानी भारत वैश्विक औसत से लगभग नौ प्रतिशत पीछे है। जी-20 देशों के बीच भी भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर सबसे कम बताई जाती है। इसकी एक वजह यह है कि देश की बड़ी संख्या में महिलाएं कृषि, अवैतनिक पारिवारिक काम या कम उत्पादकता वाले रोजगारों से जुड़ी हैं।

खेती और पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी लगातार मजबूत बनी हुई है। डेयरी और पशुपालन से जुड़े कामों में भी महिलाओं की बड़ी भूमिका है। दूध उत्पादन, भेड़-बकरी पालन और मुर्गी पालन जैसे कामों में ग्रामीण महिलाएं बड़ी संख्या में सक्रिय हैं। पिछले दो दशकों में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी ऊंची बनी रही है और हाल के वर्षों में यह और बढ़ी है। इसका एक कारण पुरुषों का खेती से निकलकर निर्माण, परिवहन, व्यापार और दूसरे गैर-कृषि रोजगारों की ओर बढ़ना भी है।

बीड़ी निर्माण ऐसा क्षेत्र है जहां महिला श्रमिकों की हिस्सेदारी बेहद ज्यादा है। करीब 91 प्रतिशत बीड़ी श्रमिक महिलाएं हैं। यह परिधान उद्योग के बाद विनिर्माण क्षेत्र में महिलाओं को रोजगार देने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। ज्यादातर महिलाएं बीड़ी निर्माण का काम घर से करती हैं और बड़ी संख्या स्वरोजगार से जुड़ी है। हालांकि, पिछले वर्षों में बीड़ी उद्योग में रोजगार घटा है। धूम्रपान की दर में कमी, तंबाकू नियमों में सख्ती और उत्पादन में बढ़ते मशीनीकरण को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

शहरी और ग्रामीण महिलाओं के रोजगार में अंतर सिर्फ भागीदारी दर तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार की प्रकृति में भी बड़ा फर्क है। गांवों में महिलाएं खेती, पशुपालन, डेयरी और छोटे घरेलू व्यवसायों के जरिए आर्थिक गतिविधियों में शामिल होती हैं। वहीं शहरों में महिलाओं की अधिक जरूरत नियमित वेतन, नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा वाले रोजगारों में है। ऐसे क्षेत्रों में अवसरों की कमी और कामकाजी महिलाओं के सामने आने वाली सामाजिक व सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उनकी भागीदारी को प्रभावित करती हैं।

उच्च वेतन वाली नौकरियों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी अभी सीमित है। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, वित्तीय सेवाओं और प्रशासनिक जैसे अपेक्षाकृत अधिक वेतन वाले क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों की संख्या एक-तिहाई से कम है। इसके मुकाबले घरेलू काम, सामाजिक कार्य और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा है। इससे साफ है कि महिला वर्कफोर्स की संख्या बढ़ने के साथ-साथ बेहतर वेतन और औपचारिक रोजगार तक उनकी पहुंच बढ़ाना भी बड़ी चुनौती है।

ब्रिक्स देशों के संदर्भ में देखें तो पिछले एक दशक में भारत ने महिला श्रम बल भागीदारी बढ़ाने के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है। 2015 से 2024 के बीच भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर में 23 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इसके विपरीत ब्राजील, चीन और रूस में स्थिति लगभग स्थिर रही या मामूली गिरावट आई, जबकि दक्षिण अफ्रीका में सीमित वृद्धि हुई। यह बदलाव बताता है कि भारत में महिलाओं की आर्थिक भूमिका तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अगले चरण की चुनौती उन्हें बेहतर कौशल, ऋण, औपचारिक रोजगार और अधिक वेतन वाले क्षेत्रों तक पहुंच दिलाना होगी।

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