पटना। बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भाजपा की राजनीतिक चुनौतियां बढ़ती नजर आ रही हैं। सत्ता में होने के बावजूद पार्टी को लगातार चुनावी झटकों का सामना करना पड़ रहा है। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव में हार से लेकर विधान परिषद (MLC) चुनावों में अपने पारंपरिक गढ़ गंवाने तक, भाजपा के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं।
4 नवंबर 2026 को प्रकाशित आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद एनडीए को भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय MLC उपचुनाव, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव और विधान परिषद चुनावों में झटके लगे हैं। इन नतीजों ने भाजपा के संगठन, चुनावी रणनीति और एनडीए के भीतर तालमेल को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
सम्राट सरकार में तीन चुनावों में NDA को झटका
रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय MLC उपचुनाव में राजद के सोनू कुमार राय ने एनडीए समर्थित जदयू प्रत्याशी कन्हैया प्रसाद को 340 वोटों से हराया था।
इसके बाद अगस्त 2026 में पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। भाजपा के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की। इसके बाद पटना शिक्षक MLC सीट पर भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
लगातार इन नतीजों ने बिहार भाजपा के सामने राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ा दी हैं।
बांकीपुर में 30 साल पुराना भाजपा का किला ढहा
पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट 1995 से भाजपा के कब्जे में रही थी। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से लेकर नितिन नवीन तक इस सीट पर पार्टी का दबदबा कायम रहा। लेकिन अगस्त 2026 में हुए उपचुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
इस सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज कर भाजपा के करीब तीन दशक पुराने वर्चस्व को समाप्त कर दिया। इस नतीजे को भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।
पटना शिक्षक MLC सीट भी भाजपा के हाथ से निकली
बांकीपुर के बाद भाजपा को पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी झटका लगा। यहां भाजपा के मौजूदा विधान पार्षद नवल किशोर यादव को राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने 1,057 वोटों से हरा दिया।
नवल किशोर यादव लगातार पांच बार इस सीट से विधान पार्षद चुने गए थे। करीब तीन दशक से भाजपा का इस सीट पर प्रभाव था। इसके अलावा दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी राजद के अनिल झा ने जीत दर्ज की।
सम्राट चौधरी के नेतृत्व और भाजपा की रणनीति पर सवाल
आजतक की रिपोर्ट में भाजपा के सामने कई चुनौतियों का जिक्र किया गया है। इनमें शहरी मतदाताओं की नाराजगी, बेरोजगारी, महंगाई, स्थानीय मुद्दों की अनदेखी और संगठन के भीतर असंतोष प्रमुख हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा को अपने पारंपरिक शहरी और सवर्ण मतदाता वर्ग के बीच समर्थन बनाए रखने में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, जन सुराज और स्थानीय राजनीतिक चेहरों के उभार से भी पारंपरिक चुनावी समीकरण प्रभावित हुए हैं।
इसके साथ ही भाजपा और जदयू के बीच गठबंधन का तालमेल बनाए रखना भी एक अहम चुनौती है। बिहार में नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक आधार रहा है। ऐसे में भाजपा के लिए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है।
रोजगार और विकास के मुद्दे बन रहे चुनौती
बिहार की राजनीति में रोजगार, शिक्षा, उद्योग और निजी निवेश जैसे मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाना भी राज्य की एक प्रमुख समस्या है।
आजतक की रिपोर्ट में राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर कहा गया है कि मतदाता अब स्थानीय विकास, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनावी वादों को जमीन पर उतारने और संगठन को मजबूत करने की चुनौती है।

