रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने आदिवासी रैयती जमीन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी जमीन पर वर्षों से कब्जा होने, पुराने मुकदमे में समझौता हो जाने या राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने मात्र से कानूनी मालिकाना हक साबित नहीं होता। अदालत ने कहा कि यदि जमीन छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के संरक्षण में आती है और उसका हस्तांतरण कानून के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए हुआ है, तो बाद की प्रक्रियाएं भी उसे वैध नहीं बना सकतीं।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम जिले के एमजीएम थाना क्षेत्र के गौर डांगा मौजा से जुड़े मामले में अनंता गौर उर्फ अनंत कुमार प्रधान की रिट याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने राजस्व अधिकारियों के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विवादित जमीन को आदिवासी रैयत के पक्ष में बहाल करने का निर्देश दिया गया था। झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता धीरज कुमार ने इस फैसले की जानकारी दी।
विवादित जमीन को लेकर भूमि सुधार उप समाहर्ता, दालभूम, जमशेदपुर के समक्ष CNT एक्ट की धारा 71-A के तहत भूमि बहाली का मामला दर्ज किया गया था। 29 जून 2006 को पारित आदेश में जमीन को प्रतिवादी ममता सिंह मुंडा के पक्ष में बहाल करने का निर्देश दिया गया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने SAR अपील दायर की, लेकिन उन्हें वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद दायर SAR रिवीजन भी खारिज हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने संबंधित आदेशों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि उनका जमीन पर लंबे समय से शांतिपूर्ण और वास्तविक कब्जा है। उन्होंने बताया कि वे वर्ष 1967 से जमीन पर काबिज हैं। अपने पक्ष में उन्होंने 1967 में दायर टाइटल सूट संख्या 791/1967 में हुए समझौते का भी हवाला दिया। उनका तर्क था कि समझौते के बाद राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम म्यूटेट किया गया और जमीन का लगान भी लगातार स्वीकार किया जाता रहा।
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि आदिवासी रैयती जमीन का कोई लेनदेन यदि CNT Act के अनिवार्य प्रावधानों के खिलाफ हुआ है, तो केवल अदालत में हुआ समझौता उसे वैध नहीं बना सकता। पुराने मुकदमे में समझौता हो जाने से ऐसा नया कानूनी अधिकार पैदा नहीं होता, जो कानून के विरुद्ध किए गए जमीन हस्तांतरण को वैध ठहरा सके।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना या लगान का भुगतान स्वीकार किया जाना अपने आप में जमीन के वैध मालिकाना हक का प्रमाण नहीं है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए आदिवासी रैयत के पक्ष में जमीन बहाली से जुड़े राजस्व अधिकारियों के आदेश को बरकरार रखा।

