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महिलाओं की आजादी पर धार्मिक बयान से केरल में सियासी घमासान, नेताओं ने जताई कड़ी आपत्ति

कोझिकोड: केरल में महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी को लेकर एक इस्लामिक धर्मगुरु के बयान ने राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। कांथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के उस कथित बयान पर विवाद बढ़ गया है, जिसमें उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने पर आपत्ति जताते हुए उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित रहने की बात कही थी। बयान सामने आने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और महिला संगठनों ने इसका विरोध किया है।

केरल को लंबे समय से महिला शिक्षा, साक्षरता और सामाजिक भागीदारी के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। राज्य में महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का स्तर काफी ऊंचा है। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण तथा ‘कुडुम्बश्री’ जैसे महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों ने भी राज्य में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भूमिका को मजबूत किया है। ऐसे में धार्मिक मंच से महिलाओं को घर तक सीमित रहने की सलाह दिए जाने को लेकर विवाद और गहरा गया।

कांथापुरम का बयान एर्नाकुलम में एक कार्यक्रम के दौरान दोहराए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं। पूर्व मंत्री पी.के. श्रीमति और के.के. शैलजा ने सार्वजनिक रूप से इस रुख का विरोध किया। पी.के. श्रीमति ने महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर सीमित करने की सोच को अपमानजनक बताया, जबकि के.के. शैलजा ने कहा कि महिलाओं को घर की चारदीवारी में बंद रखना सामंती सोच का हिस्सा है। डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन, डीवाईएफआई और एसएफआई समेत कई संगठनों ने भी बयान की आलोचना की।

पूर्व मंत्री और विधायक के.टी. जलील ने हालांकि कांथापुरम का पूरी तरह विरोध करने के बजाय उनके बयान का बचाव किया। उन्होंने कहा कि कांथापुरम को अपनी धार्मिक राय रखने का अधिकार है और लोकतांत्रिक समाज में किसी धार्मिक विद्वान को अपनी बात रखने से रोका नहीं जा सकता। जलील ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि कांथापुरम का बयान पूरे समाज के लिए नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर धार्मिक नियमों से जुड़े संदर्भ में था।

इस मुद्दे को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस, सत्ताधारी गठबंधन और मुस्लिम लीग को भी निशाने पर लिया। बीजेपी नेताओं ने कहा कि केरल की महिलाओं को धार्मिक या राजनीतिक दबाव के बिना शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। पार्टी ने सवाल उठाया कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर राजनीतिक दलों का रुख स्पष्ट क्यों नहीं है।

बीजेपी महिला मोर्चा ने भी मामले को लेकर कानूनी कार्रवाई की बात कही। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने कांथापुरम के बयान को महिलाओं के खिलाफ और निंदनीय बताते हुए कार्रवाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेताओं की प्रतिक्रिया आने में देरी हुई।

इस बीच इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के प्रदेश अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने कांथापुरम का बचाव किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा को देखते हुए संभव है कि कांथापुरम ने महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में यह बात कही हो। हालांकि, लीग के कुछ नेताओं ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से दूरी बनाए रखी।

बाद में मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन ने कांथापुरम के विचारों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी सोच आधुनिक और प्रगतिशील केरल के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में 19वीं सदी की मानसिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री ने जोर दिया कि महिलाओं को केवल घर तक सीमित रखने की सोच संविधान और महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अधिकार के विपरीत है। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में पैगंबर की पत्नियों की ऐतिहासिक भूमिकाओं का भी उल्लेख किया।

सीपीएम महासचिव एम.ए. बेबी ने भी कांथापुरम के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि संविधान धार्मिक आदेशों से ऊपर है और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने वाला रुख संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कांथापुरम की सोच की तुलना आरएसएस की विचारधारा से भी की।

दूसरी ओर, केरल मुस्लिम जमात और समस्था से जुड़े लोगों ने कांथापुरम के बयान का बचाव किया। उनका कहना है कि बयान को इस्लामी सिद्धांतों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए और मीडिया तथा राजनीतिक दलों ने इसका गलत अर्थ निकाला है। संगठन ने यह भी कहा कि धार्मिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। इसी सिलसिले में संगठन के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।

इस पूरे विवाद के बीच चर्च नेतृत्व की ओर से महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी के समर्थन में भी आवाज उठी। थामारासेरी के बिशप मार रेमिगियोस इंचाननियल ने महिलाओं को नेतृत्व में आगे आने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि चर्च लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

विवाद के बावजूद राज्य में बड़ी संख्या में महिलाएं शिक्षा, रोजगार, कारोबार और सार्वजनिक जीवन में लगातार आगे बढ़ रही हैं। अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि महिलाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े ऐसे बयानों पर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन किस तरह प्रतिक्रिया देता है और क्या इस तरह के मामलों में केवल राजनीतिक बयानबाजी होगी या कोई ठोस कानूनी कदम भी उठाया जाएगा।

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