नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की संपत्ति के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति देवता के नाम पर निहित होती है और सरकार उसकी मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक होती है। सरकार मंदिर की जमीन को अपनी संपत्ति मानकर उसका हस्तांतरण नहीं कर सकती। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में की गई मंदिर की जमीन की गिफ्ट डीड को अवैध घोषित कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव स्थित नागपलायम मरियम्मन-पोनियम्मन मंदिर की जमीन से जुड़ा है। मंदिर की लगभग एक एकड़ 10 सेंट जमीन को 30 अगस्त 2017 को मंदिर के अस्थायी ट्रस्टी एस. भूपति ने तमिलनाडु सरकार को दान कर दिया था। इस जमीन पर तालुक कार्यालय बनाने की योजना थी।
दान की गई जमीन को लेकर विवाद हुआ और इस हस्तांतरण को अदालत में चुनौती दी गई। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने जमीन के हस्तांतरण को कानून के खिलाफ माना।
सरकार मंदिर की संपत्ति की मालिक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्ति की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। संरक्षक होने का मतलब यह नहीं है कि सरकार उस संपत्ति की मालिक बन सकती है या उसे अपनी सुविधा के अनुसार हस्तांतरित कर सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति का उपयोग मंदिर और उसके श्रद्धालुओं के हित में होना चाहिए। किसी ट्रस्टी को भी मंदिर की संपत्ति को बिना उचित कानूनी आधार के दान करने का अधिकार नहीं है।
गिफ्ट डीड को किया अवैध घोषित
शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 41(1) के तहत जमीन की गिफ्ट डीड को शून्य घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि मंदिर की संपत्ति को इस तरह दान करने की अनुमति कानून नहीं देता। दस्तावेज का पंजीकरण भी इस अवैध हस्तांतरण को वैध नहीं बना सकता।
अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के पहले के फैसले को भी रद्द कर दिया।
तालुक कार्यालय रहेगा, देना होगा बढ़ा हुआ किराया
सुप्रीम कोर्ट ने जमीन पर बने तालुक कार्यालय को हटाने का आदेश नहीं दिया। अदालत ने सरकार को जमीन का उपयोग पट्टे के आधार पर जारी रखने की अनुमति दी। इसके लिए मासिक किराया बढ़ाकर 31,000 रुपये करने का निर्देश दिया गया है। किराये की दोबारा समीक्षा प्रत्येक तीन वर्ष में की जाएगी और मंदिर ट्रस्ट को जमीन के हित में पट्टे की शर्तें तय करने का अधिकार होगा।
इसके अलावा, अदालत ने तमिलनाडु सरकार को मंदिर को एक लाख रुपये की लागत आठ सप्ताह के भीतर चुकाने का निर्देश दिया।
मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा पर जोर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्ति के प्रबंधन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार और ट्रस्ट के पदाधिकारियों को मंदिर की संपत्ति के संबंध में कानून का पालन करना होगा। संपत्ति से जुड़ा हर निर्णय मंदिर और उसके श्रद्धालुओं के हित को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।

