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14वीं शताब्दी तक का इतिहास संजोए हैं विंध्याचल के पुरोहित, राजघरानों से भी पुराना नाता

मीरजापुर: उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में स्थित विंध्याचल धाम केवल आस्था का प्रमुख केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं का भी साक्षी रहा है। मां विंध्यवासिनी के दरबार में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते रहे हैं। यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास मौजूद बहीखातों में पाकिस्तान के लाहौर के कश्मीरी पंडितों, नेहरू-गांधी परिवार और विभिन्न राजघरानों के विंध्याचल आगमन से जुड़े विवरण दर्ज होने की बात कही जाती है।

इन अभिलेखों के माध्यम से कई पीढ़ियों से चले आ रहे धार्मिक संबंधों और तीर्थयात्रा की परंपरा की जानकारी मिलती है। समय के साथ सीमाएं बदलीं, राजशाही का दौर समाप्त हुआ और पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन विंध्याचल से जुड़े इन पारंपरिक रिश्तों का सिलसिला जारी रहा।

लाहौर के कश्मीरी पंडितों का भी दर्ज है नाम

विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के बहीखातों में लाहौर के चौक बाजार के निवासी पंडित कृष्ण लाल शास्त्री, पंडित दिल्ली दरवा और पंडित लक्ष्मी राम, पुत्र गणेश कौल के नाम दर्ज बताए जाते हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, ये श्रद्धालु संवत 1968 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचे थे। उस समय उनके तीर्थ पुरोहित रामजी पांडेय थे।

बताया जाता है कि रामजी पांडेय के वंशज आज भी इस पारंपरिक तीर्थ पुरोहित व्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं। इन बहीखातों में दर्ज नाम और विवरण विंध्याचल की पुरानी तीर्थ परंपरा को सामने लाते हैं।

मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी ने भी किए थे दर्शन

विंध्याचल धाम का संबंध नेहरू-गांधी परिवार से भी पुराना बताया जाता है। पुरोहितों के बहीखातों के अनुसार, मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी संवत 1979 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचे थे।

इसके बाद परिवार की अगली पीढ़ियों के सदस्यों के विंध्याचल आने का भी उल्लेख मिलता है। उपलब्ध विवरणों में राजन नेहरू के वर्ष 1962 में, इंदिरा गांधी के 4 अप्रैल 1980, 17 मई 1981 और 10 जून 1981 को, सोनिया गांधी के 20 फरवरी 2002 तथा राहुल गांधी के 2 नवंबर 2011 को विंध्याचल पहुंचने की जानकारी दी गई है।

इन यात्राओं से जुड़े तीर्थ पुरोहित के रूप में रामजी पांडेय का नाम बताया जाता है। उनके परिवार की ओर से इस परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।

राजघरानों के सदस्यों का भी रहा है जुड़ाव

विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों और राजपरिवारों के बीच संबंधों के कई उदाहरण सामने आते हैं। वर्ष 1987 में राजा क्षत्रशाल सिंह मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचे थे। उस दौरान शेरपुर कोठी के पुरोहित मिट्ठू मिश्रा के परिवार के सदस्यों ने उन्हें पूजा-अर्चना कराई थी।

इसके अलावा नेपाल के राजपरिवार सहित अन्य राजघरानों के सदस्यों के भी विंध्याचल आने की जानकारी पुरोहित परिवारों की ओर से दी जाती है। नेपाल के राजपरिवार से जुड़े पुरोहितों में तरुण पांडेय, छेरहा घराना और मृत्युंजय पांडेय के नाम का उल्लेख मिलता है।

बहीखातों में दर्ज है पीढ़ियों का इतिहास

विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के बहीखाते धार्मिक यात्राओं का विवरण दर्ज करने तक ही सीमित नहीं हैं। इनमें यजमानों के नाम, उनके मूल निवास और तीर्थयात्रा से जुड़े कई विवरण सुरक्षित रखे जाते हैं।

इन अभिलेखों के आधार पर अलग-अलग समय में विंध्याचल आने वाले परिवारों और उनके पुरोहितों के बीच संबंधों को समझा जा सकता है। लाहौर से लेकर नेपाल के राजपरिवारों और नेहरू-गांधी परिवार तक से जुड़े उल्लेख विंध्याचल की धार्मिक परंपरा की ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करते हैं।

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