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सुप्रीम कोर्ट की AI पर सख्त टिप्पणी, अदालतों में अब जरूरी होगी इंसानी निगरानी और तथ्यों की पुष्टि

हैदराबाद: भारतीय न्याय व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने इसके जिम्मेदार उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। 2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हीरा व्यापारी विजय घनश्याम गाडिया पर लगाए गए 425.27 करोड़ रुपये के कस्टम जुर्माने को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित प्राधिकरण ने अपने फैसले में ऐसे कानूनी उदाहरणों का सहारा लिया था, जो या तो अस्तित्व में नहीं थे या गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए थे। ये उदाहरण AI की मदद से तैयार किए गए प्रतीत हुए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने विजय घनश्याम गाडिया की सिविल अपील को स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के साथ-साथ मूल कस्टम्स एडज्यूडिकेशन आदेश को भी रद्द कर दिया। यह जुर्माना सूरत के अपर सीमा शुल्क आयुक्त ने 8 अक्टूबर 2025 को सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 114 के तहत लगाया था।

मामले में व्यापारी पर आरोप था कि उसने कम टैरिफ का लाभ लेने के लिए हीरों की एक खेप को गलत तरीके से लैब में तैयार किए गए हीरों के रूप में घोषित किया। इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को जुर्माने के खिलाफ दायर उसकी अपील खारिज कर दी थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने पाया कि मूल आदेश में ऐसे केस लॉ का इस्तेमाल किया गया था, जिनकी वास्तविकता की पुष्टि नहीं की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक और अर्ध-न्यायिक कार्यवाही में AI पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि AI इंसानी निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहायता कर सकता है, लेकिन उसे निर्णयकर्ता की भूमिका नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने AI की भूमिका को लेकर कहा कि यह ‘ट्रेनिंग व्हील्स’ की तरह मददगार हो सकता है, लेकिन उसे ‘पायलट की सीट’ सौंपना नासमझी और खतरनाक होगा।

इस फैसले का सीधा असर कानूनी पेशेवरों और न्यायिक अधिकारियों के कामकाज पर पड़ सकता है। AI की मदद से तैयार की गई कानूनी रिसर्च, केस लॉ या अन्य सामग्री को अदालत में पेश करने से पहले उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी होगा। किसी भी AI टूल से प्राप्त जानकारी को आधिकारिक और विश्वसनीय कानूनी डेटाबेस से क्रॉस-चेक किए बिना अदालत के समक्ष रखना जोखिम भरा हो सकता है।

AI से तैयार सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के साथ मनगढ़ंत या गलत कानूनी उदाहरणों का खतरा भी सामने आया है। यदि अदालतों में ऐसे दस्तावेज या संदर्भ प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनकी वास्तविकता संदिग्ध है, तो इससे गलत न्यायिक निष्कर्ष निकलने की आशंका बढ़ सकती है। ऐसे मामलों में अदालतों को सबूतों और कानूनी संदर्भों की विश्वसनीयता जांचने में अतिरिक्त समय देना पड़ सकता है।

भविष्य में AI से तैयार सामग्री के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट कानूनी मानक विकसित किए जाने की आवश्यकता महसूस हो सकती है। संभावित व्यवस्था के तहत AI की मदद से तैयार कानूनी शोध या साक्ष्य के लिए अनिवार्य मानव सत्यापन, AI टूल के इस्तेमाल का खुलासा और सामग्री के स्रोत की जानकारी जैसी शर्तें लागू की जा सकती हैं। अदालतें जरूरत पड़ने पर AI सिस्टम की कार्यप्रणाली और उसके परिणामों की विश्वसनीयता से जुड़ी जानकारी भी मांग सकती हैं।

कानूनी क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले AI टूल्स के प्रमाणन और मान्यता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो सकता है। भविष्य में ऐसे नियामकीय मानक बनाए जा सकते हैं, जिनके तहत कानूनी शोध या न्यायिक कार्यवाही में इस्तेमाल होने वाले AI सिस्टम को सटीकता, पारदर्शिता और डेटा की विश्वसनीयता जैसे मानकों पर परखा जाए।

AI के इस्तेमाल में पारदर्शिता भी अहम होगी। यदि किसी कानूनी दलील, दस्तावेज या साक्ष्य को तैयार करने में AI की सहायता ली गई है, तो संबंधित पक्ष को इसकी जानकारी अदालत और दूसरे पक्ष को देने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे न्यायालय को यह समझने में मदद मिलेगी कि सामग्री किस स्रोत से तैयार हुई है और उसमें AI की भूमिका कितनी रही है।

AI के दुरुपयोग या लापरवाही को रोकने के लिए जवाबदेही तय करना भी जरूरी हो सकता है। बिना सत्यापन के AI से तैयार गलत सामग्री अदालत में पेश करने या जानबूझकर मनगढ़ंत सामग्री का इस्तेमाल करने पर जुर्माना, अवमानना की कार्रवाई या पेशेवर अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।

इसके साथ ही जजों और कोर्ट स्टाफ को AI की क्षमताओं और उसकी सीमाओं को लेकर प्रशिक्षण देने की जरूरत बढ़ेगी। न्यायिक अधिकारियों को यह समझना होगा कि AI किस तरह उपयोगी हो सकता है और किन परिस्थितियों में उसके आउटपुट पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि AI का जिम्मेदारी से इस्तेमाल कानूनी व्यवस्था को अधिक प्रभावी भी बना सकता है। बड़ी मात्रा में दस्तावेजों का विश्लेषण, संबंधित कानूनी प्रावधानों की पहचान और शोध प्रक्रिया को तेज करने में AI उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन इसके परिणामों की अंतिम जांच इंसानी विशेषज्ञों द्वारा किए जाने की आवश्यकता बनी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में AI इंसान का विकल्प नहीं हो सकता। आने वाले समय में भारतीय अदालतों में AI के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम, सत्यापन की व्यवस्था और जवाबदेही के मानक विकसित किए जा सकते हैं, ताकि तकनीक का लाभ उठाते हुए न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता भी कायम रहे।

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