HomeNationalरिश्तों की राखी कौन बाँधे?

रिश्तों की राखी कौन बाँधे?

कभी-कभी घर के भीतर कही गई एक मामूली-सी बात अचानक स्मृतियों की किसी गहरी तह को खोल देती है।“माँ, राखी तो ले आयी हो… रिश्ते कौन लाएगा?”—सवाल छोटा है, लेकिन इसके पीछे बदलते परिवार और बिखरती आत्मीयता की एक पूरी कहानी छिपी है। यह केवल राखी के आने की प्रतीक्षा नहीं, उसघर के लौटने की प्रतीक्षाहै जहाँ त्योहार तारीख देखकर नहीं आते थे, अपनों की आहट के साथ आते थे; जहाँ रिश्ते निभाए नहीं जाते थे, जीए जाते थे।

माँ बाजार से राखी ले आई है। थाली में रोली है, अक्षत हैं, मिठाई है, नए कपड़े हैं, उपहार हैं—त्योहार की हर रस्म पूरी होने को है। फिर भी घर के किसी कोने में एक अनकहा खालीपन पसरा है। क्योंकि उत्सव वस्तुओं से नहीं, उपस्थिति से बनता है।राखी का रंग कितना भी चटख हो, यदि उसे बाँधने वाला हाथ दूर है, तो उसकी चमक में एक कमी रह जाती है।रस्म पूरी हो सकती है, लेकिन रिश्ते की गर्माहट केवल साथ होने से लौटती है।

कभी घर के दरवाजे पर किसी अपने की आहट ही त्योहार के आने की पहली सूचना हुआ करती थी। बहन आती थी तो उसके साथ केवल राखी नहीं आती थी, घर में जैसे पूरा बचपन लौट आता था।आँगन में भूली हुई हँसी फिर गूँजती थी, माँ की रसोई में पुराने स्वाद जाग उठते थे, भाई-बहन की नोंकझोंक में बीते वर्षों की शरारतें फिर जीवित हो जाती थीं। वे छोटी-छोटी बातें, जिनकी न कोई कीमत थी, न कोई बाजार—फिर भी जिनके बिना घर केवल मकान लगता था। तब राखी किसी दुकान से खरीदा गया धागा नहीं, अपने लोगों के पास लौट आने का एक आत्मीय बहाना थी।
आज राखी का धागा और सुंदर है, बाजार और समृद्ध हैं, सुविधाएँ और तेज। राखी एक क्लिक में दूसरे शहर पहुँच जाती है, मिठाई दरवाजे पर आ जाती है, उपहार बिना मिले भेजे जा सकते हैं और वीडियो कॉल पर दूर बैठा चेहरा भी सामने दिखाई दे जाता है। तकनीक ने दूरी को सचमुच छोटा कर दिया है।

लेकिन इसी सुविधा के बीच हमारे समय का सबसे गहरा खालीपन दिखाई देता है—हमने संपर्क के रास्ते तो बढ़ा लिए, पर संबंधों तक पहुँचने का समय खो दिया।संदेश बढ़े, संवाद घटा; तस्वीरें बढ़ीं, साथ के क्षण घटे; उपहार महँगे हुए, लेकिन उपस्थिति दुर्लभ। अब त्योहार कैलेंडर पर लौटते हैं, लोग हमेशा नहीं।और इसी बदलती दुनिया के बीच एक मासूम-सा सवाल जैसे हमारी पूरी सामाजिक यात्रा से जवाब माँगता है—“माँ, राखी तो ले आयी हो… रिश्ते कौन लाएगा?”
यह सवाल किसी एक घर की चुप्पी नहीं, हमारे समय के असंख्य घरों की साझा उदासी है। उन घरों की, जहाँ कभी आँगन में कई पीढ़ियों की आवाजें एक साथ गूँजती थीं और आज कमरों में अलग-अलग जीवन साँस लेते हैं। भाई रोज़गार की तलाश में महानगर में है, बहन विवाह के बाद किसी दूसरे शहर में अपना संसार सँभाल रही है और बूढ़े माता-पिता उसी पुराने घर में त्योहार की आहट सुनते हुए मोबाइल की स्क्रीन पर बच्चों के लौटने की प्रतीक्षा करते हैं। दूरी अब केवल शहरों के बीच नहीं है; वह धीरे-धीरे मनुष्यों के बीच भी बसती जा रही है—व्यस्तताओं, बदलती प्राथमिकताओं, अधूरे संवाद और उस भावनात्मक उपेक्षा से, जिसे हम अक्सर समय की कमी का नाम देकर टाल देते हैं।

कभी रिश्ते जीवन के साथ चलते थे; अब उन्हें जीवन से समय निकालकर निभाना पड़ता है। यही आधुनिकता की शायद सबसे विडंबनापूर्ण कीमत है। हमारे हाथों में संवाद के असंख्य साधन हैं, लेकिन संवाद का अवकाश नहीं। एक क्लिक में संदेश पहुँच जाता है, चेहरा स्क्रीन पर दिखाई दे जाता है, शुभकामनाएँ परिवार के समूह में गूँज उठती हैं; फिर भी मन की दूरी जस की तस रहती है।संपर्क की सुविधा ने निकटता की आवश्यकता समाप्त नहीं की, केवल उसका भ्रम पैदा किया है।
हम एक-दूसरे की डिजिटल दुनिया में उपस्थित हैं, लेकिन भावनात्मक जीवन में अनुपस्थित होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवारों का टूटना इसलिए केवल घरों का बँटवारा नहीं था; वह साझा समय, साझा स्मृतियों और सहज आत्मीयता का भी विखंडन था। आधुनिक जीवन ने स्वतंत्रता, अवसर और निजी पहचान तो दी, लेकिन उसके साथ रिश्तों के लिए बचा हुआ समय भी धीरे-धीरे कम कर दिया।हमने घर छोटे किए, दूरियाँ बड़ी नहीं होनी थीं—लेकिन कहीं न कहीं दिलों के बीच भी जगह कम पड़ गई।

यह बदलाव पूरी तरह विघटन की कहानी नहीं है। आधुनिकता ने व्यक्ति को वह स्वतंत्रता भी दी, जिसकी गुंजाइश पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था में अक्सर सीमित थी। बेटियों ने शिक्षा, रोजगार और अपने सपनों के लिए घर की चौखट लाँघी; युवाओं ने अपने जीवन और निर्णयों पर अधिकार पाया; छोटे परिवारों ने निजता, स्वायत्तता और व्यक्तिगत गरिमा को महत्व दिया। लेकिन हर मुक्ति अपने साथ कुछ नए प्रश्न भी जन्म देती है।क्या अपने लिए जीवन चुनते-चुनते हम अपने लोगों से दूर होते गए? क्या आत्मनिर्भरता की यात्रा में हमने उन रिश्तों के लिए समय बचाया, जिनसे हमारे व्यक्तित्व की पहली पहचान बनी थी?

यहीं रक्षा बंधन का धागा एक निजी रस्म से निकलकर हमारे समय का सामाजिक प्रश्न बन जाता है। राखी केवल भाई की कलाई पर नहीं बँधती; वह उस साझा संसार की स्मृति को भी छूती है, जहाँ एक ही छत के नीचे समय भी साझा था और संवेदनाएँ भी। आज जब घर अलग हैं, शहर अलग हैं और जीवन की गति अलग है, तो सवाल उठता है—यदि समय ही साझा नहीं रहा, तो धागा आखिर किस रिश्ते को बाँध रहा है?
रक्त रिश्ते जन्म देते हैं, लेकिन उन्हें जीवितसमय, संवाद और उपस्थितिरखते हैं। उनके लिए कभी बिना कारण फोन करना पड़ता है, किसी की चुप्पी सुननी पड़ती है, शिकायतों को अहंकार से छोटा करना पड़ता है और अपनी व्यस्त दुनिया में किसी अपने के लिए थोड़ी जगह बचानी पड़ती है। क्योंकिरिश्ते खरीदे नहीं जाते, न ही विरासत में सुरक्षित मिलते हैं; उन्हें हर पीढ़ी को अपने समय, संवेदना और प्रेम से फिर अर्जित करना पड़ता है।

राखी बाजार से खरीदी जा सकती है, लेकिनरिश्तों की गर्माहट किसी बाजार में नहीं मिलती।इसलिए इस बार राखी की थाली के सामने बैठें तो केवल यह न सोचें कि किसकी कलाई के लिए कौन-सी राखी लेनी है, किसे क्या उपहार भेजना है और किसे शुभकामना का संदेश देना है। एक पल ठहरकर यह भी पूछें—हमारी फोनबुक में दर्ज कितने लोग वास्तव में हमारे जीवन में दर्ज हैं? कितने रिश्तों से हम केवल संपर्क में हैं और कितनों से सचमुच जुड़े हुए हैं? कितनी आवाजों के पीछे छिपी थकान हम पहचान पाते हैं? कितनी चुप्पियों को बिना पूछे पढ़ सकते हैं? और कितने अपनों के पास हम बिना किसी काम, बिना किसी स्वार्थ, केवल उनके होने के लिए बैठ सकते हैं?

संभव है आने वाले वर्षों में राखियाँ और सुंदर हों, उपहार और महँगे हों, तकनीक और तेज हो, वीडियो कॉल और जीवंत हो जाएँ—लेकिन यदि हमारे पास अपने लोगों के लिए समय नहीं बचा, तो त्योहारों की रोशनी के बीच कोई बच्चा फिर पूछेगा—“माँ, राखी तो ले आयी हो… रिश्ते कौन लाएगा?”

तब हमारे पास सब कुछ होगा—राखी, मिठाई, उपहार, मोबाइल, तस्वीरें—बस शायद वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसके लिए ये सब था। इसलिए रक्षा बंधन का सबसे बड़ा अनुष्ठान कलाई पर धागा बाँधना नहीं, रिश्तों को फिर से छूना है।दूर गई बहन को केवल राखी भेजना नहीं, कभी उसके पास जाना; व्यस्त भाई को केवल संदेश नहीं, कभी उसके साथ बैठना; माँ को केवल उपहार नहीं, कभी उसके पास चुपचाप कुछ पल बिताना। क्योंकि अंततः जीवन हमें यह नहीं गिनेगा कि हमने कितनी राखियाँ खरीदीं, बल्कि यह याद दिलाएगा किकिसी राखी के दिन कौन हमारे पास था—और हम किसके पास थे।

रक्षा बंधन शायद हमें यह याद दिलाने का अवसर है किरिश्ते केवल रक्त से नहीं, उन्हें निभाने से जीवित रहते हैं।जैसे हम किसी प्रिय व्यक्ति की रक्षा का वचन देते हैं, वैसे ही रिश्तों को भी उपेक्षा, दूरी, व्यस्तता और अहंकार से बचाना पड़ता है। भाई का बहन की रक्षा करना सुंदर है, लेकिन उससे पहले भाई-बहन के बीच बचे हुए उस भरोसे की रक्षा जरूरी है, जिसमें बचपन की शरारतें, अनगिनत झगड़े और बिना कहे समझ लेने वाली आत्मीयता बसती है। माँ-बेटी के संवाद, मायके की स्मृतियों और उस अदृश्य डोर को भी बचाना होगा, जिसे विवाह, महानगरों की दूरी और समय धीरे-धीरे कमजोर कर देते हैं। क्योंकि रिश्तों की सुरक्षा किसी दीवार, पहरे या कवच से नहीं होती; वे समय, संवाद, स्पर्श और प्रेम की निरंतर उपस्थिति से सुरक्षित रहते हैं।

शायद इसीलिए इस त्योहार का सबसे गहरा सवाल है—राखी तो हर बाजार में मिल जाएगी, लेकिन रिश्ते कहाँ मिलेंगे?उन्हें कोई दुकान नहीं बेचती। वे खरीदे नहीं जाते; उन्हें वर्षों की साझी स्मृतियाँ, छोटे-छोटे त्याग, क्षमा और एक-दूसरे के लिए निकाला गया समय रचता है। कभी एक फोन रिश्ते में साँस भर देता है, कभी अचानक की गई मुलाकात वर्षों की दूरी पिघला देती है, कभी बिना किसी कारण भेजा गया संदेश कह देता है—“तुम अब भी मेरे लिए उतने ही जरूरी हो।”और कभी केवल इतना कहना पर्याप्त होता है—“बहुत दूर हो गए हैं हम, चलो फिर थोड़ा पास आते हैं।”

हमने जीवन में लगभग हर सुविधा खरीदने का हुनर सीख लिया है, लेकिन समय आज भी बाजार से बाहर है। इसलिए इस रक्षा बंधन का सबसे मूल्यवान उपहार शायद कोई वस्तु नहीं, अपनों के लिए बचाया हुआ समयहो। सिर्फ त्योहार की औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि रिश्ते भी जीवन की प्राथमिकता हैं। क्योंकि एक दिन राखी की दुकानें फिर सजी होंगी, मिठाइयाँ फिर बिकेंगी, मोबाइल में नंबर भी सुरक्षित रहेंगे—लेकिन हो सकता है वह व्यक्ति न रहे जिसके लिए यह सब था। तब समझ आएगा कि जिन रिश्तों को हमने “फिर कभी” के भरोसे टाल दिया था, उनके पास कोई अनंत कल था ही नहीं।

इसलिए इस बार सवाल यह नहीं किबहन राखी बाँधने आई या नहीं; सवाल यह है कि क्या वह आज भी अपने मायके में उतनी ही सहजता से लौट सकती है, जितनी बचपन में लौटती थी?क्या भाई उसकी कलाई पर बंधी राखी का इंतजार करता है, या उसके जीवन की थकान, संघर्ष और खुशियों में भी सहभागी है? क्या विवाह ने केवल उसका पता बदला है, या हमारे व्यवहार में उसके लिए जगह भी? क्या महानगरों ने केवल घरों के बीच दूरी बढ़ाई है, या धीरे-धीरे हमारे मनों के बीच भी? शायद रक्षा बंधन का असली अर्थ इसी प्रश्न में छिपा है—रिश्तों की रक्षा कौन करेगा, यदि हम स्वयं उनके पास लौटना छोड़ दें?

राखी खरीद लेना सहज है, लेकिन रिश्तों को बचाए रखना जीवनभर की साधना है। इसके लिए न किसी बड़े संकल्प की आवश्यकता है, न भाषण की, न महँगे उपहारों की—बस अपने लोगों के लिए थोड़ा समय, उनकी चुप्पियों को सुनने का धैर्य, शिकायतों को समझने की उदारता और अपने अहंकार को कुछ देर किनारे रखने का विवेक चाहिए। क्योंकि रिश्ते किसी एक क्षण में नहीं टूटते; वे हमारी लगातार बढ़ती व्यस्तताओं, अनदेखी होती भावनाओं और भीतर जमा होती छोटी-छोटी शिकायतों के बीच धीरे-धीरे अपनी गर्माहट खोते जाते हैं। इसलिए रिश्तों की रक्षा भी किसी एक त्योहार की रस्म नहीं, बल्कि हर दिन निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।

आज, रक्षा बंधन की इस पावन बेला में यदि घर का कोई बच्चा अचानक पूछ बैठे—“माँ, राखी तो ले आयी हो… दीदी तो लाती।”तो शायद भीतर कोई पुराना आँगन चुपचाप बोल उठे—“हाँ, राखी तो हर साल ले आते हैं… इस बार रिश्तों को भी घर ले आएँ।”क्योंकि त्योहार लौटते रहेंगे, लोग नहीं।बाजार में राखियाँ और उपहार हमेशा मिल जाएंगे, लेकिन वह अपनापन, वह साथ, वह अनकही आत्मीयता—जो कभी घर की सबसे बड़ी दौलत हुआ करती थी—किसी दुकान की शेल्फ पर नहीं मिलेगी।रिश्ते खरीदे नहीं जाते; उन्हें समय देकर, सुनकर, समझकर और हर दूरी के बावजूद एक-दूसरे तक लौटकर बचाया जाता है।

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments