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पलामू प्रमंडल SC राजनीति का बड़ा केंद्र! ब्रज मोहन राम के राज्यपाल और बैद्यनाथ राम के राज्यसभा सांसद बनने से चर्चा तेज

रांची: झारखंड की अनुसूचित जाति (SC) की राजनीति में पलामू प्रमंडल की भूमिका एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व सांसद ब्रज मोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाए जाने और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजे जाने के बाद क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत को लेकर बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत विभिन्न राजनीतिक दलों की नजर पलामू प्रमंडल के अनुसूचित जाति समुदाय और उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर है।

पलामू प्रमंडल में लंबे समय से अनुसूचित जाति की राजनीति का प्रभाव रहा है। राजनीतिक दल यहां के सामाजिक समीकरणों, जनाधार और नेतृत्व को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाते रहे हैं। ब्रज मोहन राम और बैद्यनाथ राम को मिले महत्वपूर्ण पदों के बाद इस क्षेत्र में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

ब्रज मोहन राम और बैद्यनाथ राम के पदों से बढ़ी चर्चा

पलामू के पूर्व सांसद ब्रज मोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाए जाने के बाद क्षेत्र की राजनीति में उनकी नियुक्ति को महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, जून 2026 में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजा था। इन दोनों घटनाओं ने अलग-अलग राजनीतिक दलों के भीतर अनुसूचित जाति नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा को बढ़ाया है।

राजनीतिक दृष्टि से इन नियुक्तियों को पलामू प्रमंडल में अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिशों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, इन फैसलों का स्थानीय राजनीति और चुनावी समीकरणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

पलामू प्रमंडल में अनुसूचित जाति की आबादी महत्वपूर्ण

पलामू प्रमंडल में पलामू, गढ़वा और लातेहार जिले शामिल हैं। इन जिलों में अनुसूचित जाति समुदाय की उल्लेखनीय आबादी है। उपलब्ध जनगणना-आधारित आंकड़ों के अनुसार, पलामू जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 27.65 प्रतिशत, गढ़वा में करीब 12 प्रतिशत और लातेहार में 21.31 प्रतिशत बताई गई है।

लातेहार जिले में अनुसूचित जनजाति की आबादी भी बड़ी है। इससे क्षेत्र की राजनीति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित विभिन्न सामाजिक समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

राजनीतिक दलों के लिए इस क्षेत्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व, विकास, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय समस्याओं जैसे मुद्दे अहम बने रहते हैं।

पलामू लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित

झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में पलामू सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इस आरक्षण ने क्षेत्र में अनुसूचित जाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को एक विशिष्ट पहचान दी है।

पलामू प्रमंडल में कुल नौ विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें लातेहार और छतरपुर विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक समर्थन हासिल करना दलों के लिए महत्वपूर्ण रहता है।

आगामी परिसीमन को लेकर भी क्षेत्र में चर्चा होती रही है। परिसीमन के बाद संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या या आरक्षण की स्थिति में क्या बदलाव होगा, यह संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और आधिकारिक निर्णयों पर निर्भर करेगा।

1967 में आरक्षित हुई थी पलामू लोकसभा सीट

पलामू क्षेत्र में अनुसूचित जाति के राजनीतिक नेतृत्व का इतिहास कई दशकों पुराना है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, अंग्रेजों के शासनकाल में जीतू राम ने अनुसूचित जाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में भूमिका निभाई थी। वर्ष 1937 और 1946 के चुनावों में उनकी जीत का भी उल्लेख मिलता है।

आजादी के बाद भी इस क्षेत्र में अनुसूचित जाति के कई नेताओं ने विधानसभा और लोकसभा तक पहुंचकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आगे बढ़ाया। वर्ष 1952 और 1957 के चुनावों में विभिन्न क्षेत्रों से अनुसूचित जाति के नेताओं की जीत ने इस राजनीतिक परंपरा को मजबूत किया।

वर्ष 1967 में पलामू लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई। इसके बाद क्षेत्र में आरक्षित सीट के माध्यम से संसदीय प्रतिनिधित्व का नया दौर शुरू हुआ। कमला कुमारी पलामू से लगातार चार बार सांसद रहीं। वर्तमान में इस सीट का प्रतिनिधित्व विष्णु दयाल राम कर रहे हैं।

विधानसभा की राजनीति में भी रामदेव राम, जागेश्वर राम और राधाकृष्ण किशोर जैसे नेताओं की भूमिका का उल्लेख किया जाता है। कांग्रेस की जिला अध्यक्ष विमला कुमारी भी क्षेत्र में अनुसूचित जाति नेतृत्व से जुड़े प्रमुख चेहरों में गिनी जाती हैं।

अनुसूचित जाति के वोट बैंक पर BJP, कांग्रेस और JMM की नजर

पलामू प्रमंडल में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा की राजनीतिक गतिविधियां अनुसूचित जाति समुदाय के प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जुड़ी रही हैं।

भारतीय जनता पार्टी के विष्णु दयाल राम ने 2014 के बाद हुए लगातार तीन लोकसभा चुनावों में पलामू सीट से जीत दर्ज की। वहीं, कांग्रेस के राधाकृष्ण किशोर झारखंड सरकार में वित्त मंत्री हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजे जाने को भी क्षेत्र में पार्टी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में देखा जा रहा है।

इन घटनाक्रमों के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है कि अलग-अलग राजनीतिक दल अनुसूचित जाति समुदाय के सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को अपनी नीतियों में किस तरह जगह देते हैं।

BJP जिलाध्यक्ष बोले- ब्रज मोहन राम के राज्यपाल बनने से समाज में गया संदेश

भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष अमित तिवारी ने कहा कि उनकी पार्टी जाति की राजनीति नहीं करती, लेकिन ब्रज मोहन राम के राज्यपाल बनने से अनुसूचित जाति समुदाय के बीच सकारात्मक संदेश गया है।

उन्होंने कहा, “दलित समाज के बीच व्यापक संदेश गया है कि पहली बार कोई राज्यपाल बना है। राज्यपाल बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी के एक-एक कार्यकर्ता बेहद खुश हैं।”

यह बयान भाजपा की ओर से ब्रज मोहन राम की नियुक्ति को लेकर व्यक्त की गई प्रतिक्रिया को दर्शाता है।

दलित नेता ने उठाया सामाजिक उत्थान का सवाल

दूसरी ओर, दलित नेता संदीप पासवान ने कहा कि पलामू प्रमंडल दलित राजनीति का बड़ा केंद्र रहा है और यहां से कई लोग महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे हैं। हालांकि, उनके अनुसार, क्षेत्र में अनुसूचित जाति समुदाय का जितना सामाजिक और आर्थिक उत्थान होना चाहिए था, उतना अब तक नहीं हो पाया है।

उनकी टिप्पणी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार, आर्थिक अवसर और सामाजिक विकास जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करती है।

प्रतिनिधित्व के साथ विकास भी अहम मुद्दा

ब्रज मोहन राम को राज्यपाल और बैद्यनाथ राम को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बाद पलामू प्रमंडल की अनुसूचित जाति राजनीति पर चर्चा तेज हुई है। क्षेत्र का ऐतिहासिक राजनीतिक आधार, आरक्षित लोकसभा सीट और विभिन्न दलों के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी इसे झारखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती है।

हालांकि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में विभिन्न राजनीतिक दल इस क्षेत्र में अपनी रणनीति किस तरह आगे बढ़ाते हैं और स्थानीय मुद्दों को कितनी प्राथमिकता देते हैं, इस पर राजनीतिक नजरें बनी रहेंगी।

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