नई दिल्ली/काठमांडू: नेपाल में चीन-नेपाल सीमा के पास आई भीषण बाढ़ और जलप्रलय ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। शुक्रवार शाम तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नेपाल और तिब्बत में कुल 584 लोगों की मौत और 2,482 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें नेपाल में 579 मौतें और 1,924 लोग लापता बताए गए हैं, जबकि तिब्बत में 5 लोगों की मौत और 558 लोगों के लापता होने की सूचना है।
नेपाल में करीब 320 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पाने की भी जानकारी सामने आई है। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं।
चीन पर समय रहते चेतावनी नहीं देने के आरोप
भीषण बाढ़ के बाद चीन की भूमिका को लेकर नेपाल में सवाल उठ रहे हैं। कुछ नेपाली मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चीन की ओर से नेपाल को आपदा से पहले पर्याप्त समय रहते चेतावनी नहीं दी गई।
इन रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि संभावित बाढ़ की सूचना पहले मिल जाती तो नेपाल में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता था। हालांकि, यह अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है कि चीन के अधिकारियों के पास ऐसी निश्चित पूर्व सूचना थी जिसे नेपाल को अनिवार्य रूप से साझा किया जाना चाहिए था।
इस पूरे मामले में उठ रहे प्रमुख सवाल
- क्या चीन की तरफ अर्ली वार्निंग सिस्टम ने आपदा से पहले खतरे के संकेत पकड़े थे?
- अगर संकेत मिले थे तो क्या नेपाल को आधिकारिक चेतावनी भेजी गई?
- सीमा पार आपदा की सूचना नेपाल तक पहुंचने में देरी क्यों हुई?
- क्या चीन और नेपाल के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग की व्यवस्था प्रभावी है?
- बाढ़ का वास्तविक स्रोत और आपदा की शुरुआत किस स्थान से हुई?
- क्या इस घटना की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
चीन ने आरोपों को किया खारिज
नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उन दावों का खंडन किया है जिनमें कहा जा रहा था कि चीन ने नेपाल को आपदा से पहले चेतावनी नहीं दी।
दूतावास ने ऐसे दावों को ‘फेक’ बताते हुए कहा कि 26 अगस्त की घटना में भूकंप, भूस्खलन और प्राकृतिक घटनाओं के कारण नेपाल और चीन दोनों तरफ लोग प्रभावित हुए। चीन की ओर से लगाए गए इन खंडनों के बावजूद नेपाल में सीमा पार आपदा सूचना साझा करने की व्यवस्था पर बहस जारी है।
सीमा पर संचार व्यवस्था बनी बड़ी चुनौती
‘काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ल्हासा में नेपाल के कॉन्सल जनरल लक्ष्मी प्रसाद निरौला ने कहा कि नेपाल और चीन दोनों ओर के अधिकारी सीमा पर तैनात सुरक्षा कर्मियों से संपर्क स्थापित नहीं कर पा रहे थे।
संचार व्यवस्था प्रभावित होने के कारण बाढ़ की शुरुआत कहां से हुई और इसका वास्तविक स्रोत क्या था, इसे लेकर तत्काल विश्वसनीय जानकारी जुटाना मुश्किल रहा।
नेपाल को स्थानीय अधिकारियों से मिली बाढ़ की सूचना
नेपाली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तिब्बत के केरुंग काउंटी में अचानक बाढ़ आने के बाद कुछ ही समय में इसका तेज बहाव नेपाल की भोटेकोशी नदी तक पहुंच गया।
रिपोर्टों में नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि नेपाल को चीन की तरफ से सीधे बाढ़ की सूचना नहीं मिली थी। रसुवा के मुख्य जिला अधिकारी ने स्थानीय समय के अनुसार करीब 9 बजे फोन करके संबंधित प्राधिकरण को जानकारी दी थी।
हालांकि, इन दावों और घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल
इस आपदा के बाद चीन-नेपाल सीमा पर मौजूद अर्ली वार्निंग सिस्टम की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, इस सिस्टम ने पहले कई मौकों पर समय रहते चेतावनी जारी की है। लेकिन 26 अगस्त की इस घटना से पहले सिस्टम ने कोई चेतावनी जारी की थी या नहीं, इसकी अब तक स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई है।
चीनी वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में बर्फ और चट्टानों के खिसकने का समय रहते पता चल जाए तो सीमित समय पहले चेतावनी दी जा सकती है। वहीं, निगरानी उपकरणों की सीमित उपलब्धता और बाढ़ के वास्तविक स्रोत को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
2,482 लोग अभी भी लापता
नेपाल पुलिस के अनुसार, लापता लोगों की संख्या और बढ़ सकती है। कई इलाकों में सर्च ऑपरेशन जारी है और संचार संपर्क टूटने के कारण कुछ लोगों के बारे में जानकारी जुटाना मुश्किल हो रहा है।
शुक्रवार को नेपाल और चीन सीमा के पास अस्थिर बैरियर लेक के ओवरफ्लो होने और भोटेकोशी नदी में पानी की नई लहर आने के बाद बचाव टीमों को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद एक और एवलांच में करीब 50 हजार क्यूबिक मीटर बर्फ का मलबा गिरने की जानकारी सामने आई।
सैटेलाइट तस्वीरों में ऊपरी क्षेत्र में एक और बड़ी झील बनने के संकेत मिलने की बात कही गई है। बताया गया है कि फिलहाल इस झील का कोई स्पष्ट आउटलेट दिखाई नहीं दे रहा है, जिससे खतरा और बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
7,451 सुरक्षाकर्मी राहत अभियान में तैनात
नेपाल पुलिस के अनुसार, आपदा के तीसरे दिन भी खोज और बचाव अभियान जारी रहा। अभियान में कुल 7,451 सुरक्षाकर्मी लगाए गए हैं, जिनमें नेपाल सेना के 2,391 जवान भी शामिल हैं।
टीमें प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों की तलाश, शवों की बरामदगी और सुरक्षित स्थानों पर लोगों को पहुंचाने का काम कर रही हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए 77 तीर्थयात्रियों से संपर्क टूटा
चीन-नेपाल सीमा के पास बाढ़ के बाद ईशा फाउंडेशन के 77 तीर्थयात्रियों के बारे में भी चिंता बढ़ गई है। बताया गया है कि यह समूह कैलाश मानसरोवर यात्रा पर था और बाढ़ के बाद से इनसे संपर्क नहीं हो पाया है।
समूह के सदस्यों की स्थिति को लेकर फिलहाल किसी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
भारतीय नागरिकों को लेकर भी चिंता
नेपाल में मौजूद करीब 320 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और उनके परिजनों तक सूचना पहुंचाना भी राहत अभियान की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है।
चीन-नेपाल के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग की मांग
इस आपदा के बाद नेपाल में चीन के साथ सीमा पार प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी सूचनाओं को रियल-टाइम में साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने की मांग तेज हुई है।
पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने भी सर्वदलीय बैठक में चीन के साथ आपदा संबंधी सूचना साझा करने की व्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की सीमा किसी एक देश तक सीमित नहीं रहती। इसलिए ग्लेशियर, झील, भूस्खलन और बाढ़ से जुड़े डेटा को समय पर साझा करना जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अभी सबसे बड़ा सवाल क्या है?
नेपाल में तबाही का पैमाना लगातार सामने आ रहा है, लेकिन चीन की ओर से कथित चेतावनी को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
एक तरफ नेपाली मीडिया में समय पर सूचना नहीं मिलने के सवाल उठ रहे हैं, दूसरी तरफ चीनी दूतावास इन आरोपों को खारिज कर रहा है। ऐसे में यह पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच जरूरी होगी कि आपदा से पहले वास्तव में कौन-सी जानकारी उपलब्ध थी, अर्ली वार्निंग सिस्टम ने क्या दर्ज किया और नेपाल तक कोई चेतावनी कब और किस माध्यम से पहुंची।
फिलहाल राहत एवं बचाव अभियान जारी है और प्रभावित क्षेत्रों में आगे किसी संभावित बाढ़ या भूस्खलन के खतरे को देखते हुए निगरानी बढ़ा दी गई है।

