कुरुक्षेत्र। आमतौर पर करोड़ों की संपत्ति होने के बाद लोग आलीशान घरों और सुख-सुविधाओं से भरी जिंदगी की कल्पना करते हैं। लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद में रहने वाले 71 वर्षीय रमेश की जिंदगी की कहानी कुछ अलग है। करोड़ों की संपत्ति, विदेश में बसे बेटे और आर्थिक रूप से संपन्न परिवार होने के बावजूद रमेश आज भी बरगद के पेड़ के नीचे अपनी छोटी-सी चाय की दुकान चलाते हैं। साधारण बनियान और पैंट पहनकर मिट्टी की भट्टी पर चाय बनाते रमेश को देखकर शायद ही कोई उनकी आर्थिक संपन्नता का अंदाजा लगा सके।
रमेश के लिए यह दुकान केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि उनके पिता की यादों, परिवार के संघर्ष और एक वचन से जुड़ी भावनाओं का हिस्सा है। यही वजह है कि परिवार के बार-बार आग्रह करने के बावजूद उन्होंने चाय की दुकान छोड़ने से इनकार कर दिया है।
बंटवारे का दर्द, फिर शून्य से शुरू हुआ सफर
रमेश के परिवार ने भारत-पाकिस्तान विभाजन का दर्द झेला था। विभाजन के बाद परिवार भारत आया, तो उसके सामने जीवन को दोबारा खड़ा करने की चुनौती थी। उनके पिता ने मेहनत और हौसले के दम पर नई शुरुआत की।
वर्ष 1971 में रमेश के पिता ने दिल्ली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर शाहबाद के पास बीडीपीओ कार्यालय के सामने बरगद के पेड़ के नीचे चाय की दुकान शुरू की। उस समय रमेश की उम्र महज 15-16 साल थी। उन्होंने पिता के साथ दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। उस दौर में चाय का एक कप महज 15 पैसे में बिकता था।
धीरे-धीरे यही दुकान परिवार की पहचान बन गई। संघर्ष के दिनों में शुरू हुआ यह काम आज भी रमेश की दिनचर्या का अहम हिस्सा है।
पिता के अंतिम वचन ने दुकान से बांधे रखा
रमेश के जीवन में उनके पिता की सीख का खास महत्व है। उनके पिता ने करीब 97 वर्ष की उम्र तक दुकान पर चाय बनाई। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने रमेश से कहा था कि इस काम को कभी मत छोड़ना, क्योंकि इसी दुकान और भट्टी ने परिवार को पहचान दी है।
पिता से किया गया यही वादा रमेश आज भी निभा रहे हैं। वह रोज सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक दुकान पर रहते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी चाय बनाना और ग्राहकों से मिलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
रमेश के लिए दुकान छोड़ना सिर्फ रोजगार छोड़ना नहीं, बल्कि पिता की यादों और उनके संघर्ष से दूर होना है।
15 पैसे से 15 रुपये तक पहुंचा चाय का सफर
समय के साथ महंगाई बढ़ी और चाय की कीमत भी बदल गई। कभी 15 पैसे में मिलने वाला चाय का कप अब 15 रुपये में बिकता है। लेकिन रमेश की दुकान पर चाय बनाने का पारंपरिक तरीका आज भी कायम है।
आधुनिक गैस चूल्हों और कॉफी मशीनों के दौर में भी रमेश मिट्टी की भट्टी पर कोयले या लकड़ी की आंच से चाय तैयार करते हैं। उनकी चाय का स्वाद लेने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ दिल्ली-चंडीगढ़ हाईवे से गुजरने वाले राहगीर और ट्रक चालक भी रुकते हैं।
लंबे समय से दुकान पर आने वाले ग्राहकों का कहना है कि चाय का पुराना स्वाद और रमेश का आत्मीय व्यवहार उन्हें बार-बार यहां खींच लाता है।
करोड़ों की संपत्ति, फिर भी विदेश जाने को तैयार नहीं
रमेश का परिवार आज आर्थिक रूप से संपन्न है। उनके दो बेटे विदेश में रहते हैं, जबकि एक बेटा भारत में नौकरी करता है। उनकी बहू भी सरकारी सेवा में हैं। परिवार की कुल मासिक आमदनी और बचत लाखों रुपये में होने की बात कही जाती है।
रमेश की पत्नी विदेश में रहकर आ चुकी हैं। परिवार के सदस्य चाहते हैं कि अब उम्र के इस पड़ाव पर रमेश भी आराम करें और दुकान पर काम करना छोड़ दें। लेकिन रमेश को अपनी दुकान और मिट्टी की भट्टी से गहरा लगाव है।
उनका मानना है कि पिता की यादें इसी जगह से जुड़ी हैं। इसलिए वह अपनी मर्जी से इस काम को छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते। उनके लिए आर्थिक संपन्नता से ज्यादा महत्व उस काम का है, जिसे उन्होंने बचपन से अपने पिता के साथ सीखा और अपनाया।
चार दशक से पुराने ग्राहक, व्यवहार आज भी वैसा ही
रमेश की सादगी के चर्चे उनके नियमित ग्राहकों के बीच भी हैं। हरियाणा सरकार से सेवानिवृत्त कर्मचारी सतपाल जागलान बताते हैं कि वह वर्ष 1982 से रमेश को जानते हैं और लंबे समय से उनकी दुकान पर चाय पीने आते रहे हैं।
उनके मुताबिक, रमेश के जीवन में आर्थिक रूप से बड़ा बदलाव आया, लेकिन उनके व्यवहार में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। वह आज भी खुद दुकान संभालते हैं और किसी कर्मचारी को नहीं रखते।
बहादुर सिंह जैसे नियमित ग्राहक भी रमेश की चाय के मुरीद हैं। वहीं, प्रवीण और ईश्वर चंद जैसे स्थानीय लोगों का कहना है कि वे बचपन से रमेश की दुकान पर चाय पीते आ रहे हैं। उम्र बढ़ने के साथ उनकी जिंदगी बदली, लेकिन दुकान की चाय का पुराना स्वाद उनके लिए आज भी खास है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, रमेश के पास संपत्ति होने के बावजूद उनमें घमंड नहीं है। उनका सहज व्यवहार और मेहनत के प्रति लगाव लोगों को प्रभावित करता है।
रमेश की कहानी देती है खास सीख
रमेश की जिंदगी यह संदेश देती है कि सफलता को केवल संपत्ति, बैंक बैलेंस या सुख-सुविधाओं से नहीं मापा जा सकता। अपनी मेहनत, परिवार के संघर्ष और पुरखों की विरासत से जुड़े रहना भी जीवन की बड़ी उपलब्धि है।
शाहबाद में बरगद के पेड़ के नीचे बनी उनकी छोटी-सी दुकान आज भी उसी लगन की गवाही देती है, जिसके साथ उनके पिता ने इसकी शुरुआत की थी। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद चाय बनाते रमेश इस बात की मिसाल हैं कि इंसान की पहचान सिर्फ उसकी दौलत से नहीं, बल्कि उसके काम, व्यवहार और मूल्यों से भी बनती है।

