नई दिल्ली: इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी की शादी उस दौर में देशभर में चर्चा और विवाद का विषय बन गई थी। शादी की खबर सामने आने के बाद इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। महात्मा गांधी ने इस विवाह को राष्ट्रीय समारोह के रूप में मनाए जाने की वकालत की थी, लेकिन परिस्थितियां ऐसी रहीं कि शादी उत्सव से ज्यादा विवाद का मुद्दा बन गई।
21 फरवरी को इलाहाबाद के ‘लीडर’ अखबार में इंदिरा और फिरोज की शादी से जुड़ी खबर प्रकाशित हुई। खबर सामने आने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने सफाई देते हुए कहा था कि यह विवाह परिवार की सहमति से हो रहा है। इसके बाद महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ पत्रिका में लेख लिखकर इस विवाह का समर्थन किया। गांधी के लेख को उस समय कई अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया।
विवाह को लेकर देशभर में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। आनंद भवन में अलग-अलग हिस्सों से चिट्ठियों और तारों का सिलसिला शुरू हो गया। इनमें कुछ लोगों ने शादी का विरोध किया, जबकि कई लोगों ने इंदिरा और फिरोज को विवाह की बधाई भी दी।
इस विवाह को लेकर ब्रिटिश दौर के कानून की व्याख्या का मुद्दा भी सामने आया। उस समय अलग-अलग धर्मों के लोगों के विवाह को लेकर कानूनी शर्तें थीं। ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों को अपने धर्म का त्याग करने और किसी धर्म को न मानने की घोषणा करनी पड़ती थी। बताया जाता है कि इंदिरा और फिरोज ने इस तरह की घोषणा करने से इनकार कर दिया था।
लेखिका कैथरीन फ्रैंक ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि इंदिरा गांधी पारंपरिक अर्थों में धार्मिक हिंदू नहीं थीं और फिरोज गांधी भी पारसी धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करते थे। हालांकि, हिंदू वैदिक विवाह परंपरा में विवाह संस्कार के दौरान वर-वधू से उनके धर्म के बारे में औपचारिक घोषणा कराने की परंपरा नहीं रही है। इसी आधार पर इस विवाह की वैधता को लेकर अलग-अलग मत सामने आए।
इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी का विवाह वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार कराया गया था। विवाह समारोह दिल्ली के एक प्रोफेसर द्वारा संपन्न कराए जाने का भी उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि इस ऐतिहासिक विवाह को लेकर उस समय कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा हुई थी।

