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तलाक मामले में मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी, लंबे अलगाव को माना वैवाहिक रिश्ते के टूटने का आधार

मदुरै: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने तलाक से जुड़े एक मामले में पत्नी को लेकर की गई एक टिप्पणी के जरिए यह स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी से हर परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पत्नी से यह उम्मीद करना उचित नहीं है कि वह हर जगह पति के पीछे उसी तरह चले, जैसे पुराने सिम कार्ड के विज्ञापन में कुत्ता अपने मालिक के पीछे जाता था। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने लंबे समय से अलग रह रहे दंपती को तलाक की मंजूरी दे दी।

मामला शिवगंगा के एक दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 10 सितंबर 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। दोनों के चार बच्चे हैं। शादी के बाद पति काम के सिलसिले में मुंबई चला गया, जबकि पत्नी शिवगंगा में ही रही। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई और वे लंबे समय तक अलग-अलग रहने लगे।

पति ने वर्ष 2014 में शिवगंगा फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। उसने पत्नी पर विवाहेतर संबंध होने का आरोप लगाया था। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। अदालत का मानना था कि पति पत्नी को अपने साथ मुंबई नहीं ले गया और इस वजह से उसने वैवाहिक जिम्मेदारी का पालन नहीं किया। फैमिली कोर्ट ने यह भी माना था कि यदि पति पत्नी को साथ लेकर जाता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती और इसलिए वह अपनी ही गलती का लाभ उठाकर तलाक की मांग नहीं कर सकता।

फैमिली कोर्ट के फैसले को पति ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं होता कि वह नौकरी या अन्य परिस्थितियों के कारण जहां भी जाए, अपनी पत्नी को साथ लेकर जाए। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि सैन्य सेवा जैसी नौकरियों में कई बार परिवार को साथ रखना व्यावहारिक नहीं होता। इसी तरह पत्नी की अपनी नौकरी या अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियां भी हो सकती हैं।

हाईकोर्ट ने पत्नी से हर परिस्थिति में पति के साथ जाने की अपेक्षा को अनुचित बताते हुए पुराने सिम कार्ड के विज्ञापन में मालिक के पीछे चलने वाले कुत्ते का उदाहरण दिया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस सोच को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें पति के पत्नी को साथ नहीं ले जाने को वैवाहिक विवाद की स्थिति के लिए जिम्मेदार माना गया था।

वहीं, हाईकोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए विवाहेतर संबंध के आरोप को भी पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने गौर किया कि जिस व्यक्ति के साथ पत्नी के कथित संबंध का आरोप लगाया गया था, उसे मामले में प्रतिवादी के तौर पर शामिल ही नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विवाहेतर संबंध के गंभीर आरोप की स्थिति में कथित रूप से शामिल व्यक्ति को भी मामले में पक्षकार बनाया जाना जरूरी है।

हालांकि, मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि पति-पत्नी करीब 16 वर्षों से अलग रह रहे थे। कोर्ट ने पाया कि पत्नी की ओर से पति के साथ दोबारा रहने के लिए कोई ठोस प्रयास किए जाने का रिकॉर्ड नहीं है। यहां तक कि पति को औपचारिक पत्र या कानूनी नोटिस भेजे जाने का भी कोई प्रमाण सामने नहीं आया। फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश की थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका है और उसके दोबारा बहाल होने की संभावना नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके तहत लंबे समय तक अलग रहना, वैवाहिक संबंध का पूरी तरह खत्म हो जाना और दोबारा साथ रहने की संभावना न होना कुछ परिस्थितियों में मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है।

इसके आधार पर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए दंपती को तलाक की मंजूरी दे दी। साथ ही, कोर्ट ने पति को पत्नी को गुजारा-भत्ता के रूप में सात लाख रुपये देने का आदेश भी दिया।

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