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हिमालयी राज्यों में धान की 9,172 देसी किस्मों पर बड़ी स्टडी: वैज्ञानिकों को मिला ‘जादुई’ S5ⁿ जीन, उत्तराखंड में जैपोनिका का खजाना

नई दिल्ली/देहरादून: भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने हिमालयी और आसपास के राज्यों से संरक्षित धान की 9,172 पारंपरिक किस्मों का विस्तृत अध्ययन किया है। अध्ययन में 1,906 किस्में जैपोनिका समूह की मिली हैं, जबकि 6,375 किस्में इंडिका और 891 किस्में मिश्रित प्रकार की पाई गईं। शोधकर्ताओं के अनुसार, जैपोनिका समूह की कुछ किस्मों में मौजूद विशेष आनुवंशिक गुण भविष्य में इंडिका और जैपोनिका के बीच संकरण कर नई धान किस्मों के विकास के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

यह अध्ययन ICAR, नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR) और सहयोगी संस्थानों के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध 28 सितंबर 2026 को Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में क्या सामने आया?

वैज्ञानिकों ने भारत के 11 राज्यों से संरक्षित 9,172 धान नमूनों का अध्ययन किया। इसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं—

  • 6,375 नमूने यानी करीब 69.51% इंडिका समूह के पाए गए।

  • 1,906 नमूने यानी करीब 20.78% जैपोनिका समूह के मिले।

  • 891 नमूने यानी करीब 10% इंडिका-जैपोनिका मिश्रित प्रकार के पाए गए।

  • 1,906 जैपोनिका किस्मों में से 613 में S5ⁿ एलील की पहचान हुई।

  • जैपोनिका किस्मों की संख्या के लिहाज से अरुणाचल प्रदेश में 438 किस्में मिलीं।

  • उत्तराखंड में 372, मिजोरम में 359 और मणिपुर में 206 जैपोनिका किस्में दर्ज की गईं।

S5ⁿ एलील क्यों है महत्वपूर्ण?

अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक 613 जैपोनिका किस्मों में S5ⁿ एलील का पाया जाना है। इसे वाइड कम्पैटिबिलिटी से जुड़ा आनुवंशिक गुण माना जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इंडिका और जैपोनिका धान के बीच संकरण में प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याएं आ सकती हैं। ऐसे में S5ⁿ जैसे आनुवंशिक गुण दोनों समूहों के बीच सफल संकरण में उपयोगी हो सकते हैं। इससे भविष्य में अलग-अलग उपयोगी गुणों को एक ही धान किस्म में शामिल करने की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है।

हालांकि, इस खोज का मतलब यह नहीं है कि ऐसी कोई नई व्यावसायिक धान किस्म अभी तैयार हो गई है। इसके लिए आगे प्रयोगशाला परीक्षण, प्रजनन कार्यक्रम और खेतों में परीक्षण की जरूरत होगी।

उत्तराखंड से मिलीं 372 जैपोनिका किस्में

अध्ययन में उत्तराखंड की पारंपरिक धान जैव-विविधता भी सामने आई है। राज्य से संग्रहित 1,698 धान किस्मों में 372 जैपोनिका और 432 मिश्रित प्रकार की किस्में दर्ज की गईं।

S5ⁿ एलील वाली 613 किस्मों में उत्तराखंड की 150 किस्में शामिल हैं। राज्य की पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों, अलग-अलग ऊंचाई, तापमान और वर्षा के बीच लंबे समय से विकसित हुई पारंपरिक धान किस्में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधन मानी जा रही हैं।

अरुणाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा जैपोनिका किस्में

राज्यवार आंकड़ों में अरुणाचल प्रदेश सबसे अधिक जैपोनिका किस्मों वाला राज्य रहा। यहां कुल 438 जैपोनिका किस्में दर्ज की गईं। इसके बाद उत्तराखंड में 372, मिजोरम में 359 और मणिपुर में 206 जैपोनिका किस्में मिलीं।

S5ⁿ एलील वाली किस्मों में भी अरुणाचल प्रदेश की 175, उत्तराखंड की 150, मिजोरम की 90 और मणिपुर की 53 किस्में शामिल हैं।

जैपोनिका किस्मों के भीतर S5ⁿ एलील की हिस्सेदारी के अनुपात में त्रिपुरा 47.56 प्रतिशत के साथ आगे रहा। उत्तराखंड में यह अनुपात 40.23 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 39.95 प्रतिशत दर्ज किया गया।

फिनॉल रिएक्शन तकनीक से हुई प्राथमिक पहचान

धान की किस्मों की प्राथमिक पहचान के लिए वैज्ञानिकों ने कम लागत वाली फिनॉल रिएक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में धान के दानों को दो प्रतिशत फिनॉल घोल में 48 घंटे तक रखा गया।

जिन दानों का रंग काला हुआ, उन्हें इंडिका प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया गया, जबकि जिनका मूल पीला रंग बरकरार रहा, उन्हें जैपोनिका समूह में रखा गया। दोनों तरह की विशेषताएं दिखाने वाले नमूनों को मिश्रित प्रकार में शामिल किया गया।

जैपोनिका धान में कई उपयोगी कृषि गुण

अध्ययन में जैपोनिका धान की कृषि-आकृतिक विशेषताओं को भी देखा गया। इनमें पौधे की ऊंचाई, पत्ती की लंबाई, बाली की लंबाई, दाने की लंबाई-चौड़ाई और 100 दानों के वजन जैसे गुण शामिल हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जैपोनिका समूह की कुछ किस्मों में पौधों के गिरने के प्रति बेहतर प्रतिरोध, ठंडे वातावरण में अनुकूलन और उर्वरकों के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया जैसे गुण पाए जा सकते हैं। इन विशेषताओं की पहचान भविष्य में धान की नई किस्मों के प्रजनन कार्यक्रमों में उपयोगी हो सकती है।

1,696 जैपोनिका किस्मों को आठ समूहों में बांटा

शोधकर्ताओं ने 1,696 जैपोनिका किस्मों को उनके कृषि-आकृतिक गुणों के आधार पर आठ समूहों में वर्गीकृत किया। इसके लिए पौधे की ऊंचाई, पत्ती और बाली की लंबाई तथा दाने के आकार और वजन जैसे मानकों को आधार बनाया गया।

इस तरह का वर्गीकरण प्लांट ब्रीडर्स को उपयोगी आनुवंशिक संसाधनों की पहचान करने में मदद कर सकता है। इसके जरिए भविष्य में कम पानी, प्रतिकूल मौसम, रोग या अन्य कृषि चुनौतियों के प्रति बेहतर अनुकूलन वाली किस्मों के विकास के लिए उपयुक्त जर्मप्लाज्म चुना जा सकता है।

राष्ट्रीय जीन बैंक में लाखों आनुवंशिक संसाधन

शोधकर्ता आरके गौतम के अनुसार, भारत के राष्ट्रीय जीन बैंक में कृषि फसलों और उनके जंगली संबंधियों के 4.71 लाख से अधिक आनुवंशिक संग्रह मौजूद हैं। इनमें धान की 1.2 लाख से अधिक किस्में शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि केवल आनुवंशिक संसाधनों को संरक्षित करना पर्याप्त नहीं है। इन संसाधनों के भौगोलिक स्रोत, रोग एवं मौसम सहनशीलता, दाने की गुणवत्ता, उपज क्षमता और संकरण क्षमता जैसी विशेषताओं का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करना भी जरूरी है, ताकि उनका इस्तेमाल फसल सुधार कार्यक्रमों में प्रभावी ढंग से किया जा सके।

नई धान किस्मों के विकास की दिशा में आधार

शोधकर्ताओं के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र से मिले 9,172 पारंपरिक धान नमूनों में 1,906 जैपोनिका और 613 S5ⁿ एलील वाली किस्मों की पहचान भविष्य के धान प्रजनन कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधन उपलब्ध कराती है।

हालांकि, इन किस्मों से सीधे किसानों के लिए नई व्यावसायिक फसल तैयार होने में अभी समय लगेगा। इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों में फील्ड ट्रायल, उपज का मूल्यांकन, रोग प्रतिरोध और मौसम के प्रभाव की जांच सहित कई चरणों से गुजरना होगा। वैज्ञानिक अध्ययन फिलहाल इन पारंपरिक किस्मों में मौजूद उपयोगी आनुवंशिक विविधता की पहचान के लिए एक आधार उपलब्ध कराता है।

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