नई दिल्ली। भारत ने रक्षा निर्यात के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, भारत यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों में गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों की बढ़ती मांग से भारतीय रक्षा उद्योग को बड़ा फायदा मिला है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद यूरोप में गोला-बारूद की मांग तेजी से बढ़ी है। इसका लाभ भारतीय रक्षा कंपनियों को मिला है। खासकर तोप के गोले, मोर्टार गोला-बारूद, विस्फोटक और अन्य सैन्य सामग्रियों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने बताया कि भारत का कुल रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह लगभग 3.6 अरब यूरो के बराबर है। भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरणों और सैन्य सामग्रियों का निर्यात कर रहा है।
सरकार की मेक इन इंडिया पहल और घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले जहां भारत रक्षा उपकरणों के आयात पर काफी निर्भर था, वहीं अब देश की सरकारी और निजी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह मजबूत कर रही हैं।
गोला-बारूद के निर्यात में 1600 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप के 13 देशों को भारत से गोला-बारूद और संबंधित रक्षा सामग्री की आपूर्ति में भारी वृद्धि हुई है।
रिपोर्ट में दिए गए व्यापार आंकड़ों के अनुसार, युद्ध से पहले के चार वर्षों में इन देशों को भारत से करीब 4.92 करोड़ डॉलर की ऐसी सामग्री का निर्यात हुआ था। युद्ध के बाद के चार वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर कम से कम 87.2 करोड़ डॉलर हो गया। इस तरह निर्यात मूल्य में 1600 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।
इन आंकड़ों में तोप के गोले, मोर्टार गोला-बारूद, विस्फोटक और उनसे संबंधित सामग्री शामिल हैं। इस श्रेणी में भारत इन 13 यूरोपीय देशों का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है। इस मामले में दक्षिण कोरिया पहले स्थान पर है।
क्यों बढ़ी भारतीय हथियारों की मांग?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने और हथियारों के भंडार को दोबारा भरने पर जोर दिया है। यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के साथ-साथ कई देशों को अपने हथियारों और गोला-बारूद के भंडार की भरपाई भी करनी पड़ रही है।
यूरोप में गोला-बारूद की बढ़ती जरूरत और उत्पादन क्षमता से जुड़ी चुनौतियों ने भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता में विस्तार और अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता ने भी निर्यात बढ़ाने में मदद की है।
सरकारी और निजी कंपनियों की अहम भूमिका
भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र में सरकारी कंपनियों के साथ निजी कंपनियों और छोटे एवं मध्यम उद्यमों की भागीदारी भी बढ़ी है। रक्षा सचिव के मुताबिक, देश में करीब 840 बड़े और मध्यम औद्योगिक उद्यम तथा लगभग 17 हजार छोटे एवं मध्यम उद्यम इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
भारतीय रक्षा उद्योग अब गोला-बारूद और तोपखाने के उपकरणों के अलावा छोटे हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट और अन्य सैन्य उपकरण भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध करा रहा है।
यूरोप के साथ संयुक्त उद्यम बनाने की तैयारी
भारत अब यूरोपीय रक्षा बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाने के लिए संयुक्त उद्यमों पर भी जोर दे रहा है। इसके तहत भारतीय कंपनियां यूरोप में साझेदारी के जरिए वहां की रक्षा खरीद परियोजनाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करेंगी। वहीं, यूरोपीय कंपनियों को भी मेक इन इंडिया के तहत भारत में उत्पादन और निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
भारत सरकार का जोर रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, घरेलू तकनीक विकसित करने और भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता मजबूत करने पर है।
भारत के लिए अवसर के साथ चुनौतियां भी
यूरोप में बढ़ता रक्षा निर्यात भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों का पालन, समय पर आपूर्ति और निर्यात किए गए सैन्य सामान के अंतिम गंतव्य की निगरानी जैसी चुनौतियां भी बनी हुई हैं।
भारत के रक्षा निर्यात में आई तेजी यह संकेत देती है कि देश वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। आने वाले समय में उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी यह तय करेंगे कि भारत इस उपलब्धि को कितनी मजबूती से आगे बढ़ा पाता है।

