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भारत अब जनसंख्या विस्फोट का नहीं, बल्कि घटती प्रजनन दर का सामना कर रहा है: ईएसी-पीएम की चेतावनी

नई दिल्ली: भारत अब उस जनसंख्या समस्या का सामना नहीं कर रहा है, जिसने दशकों तक देश की परिवार नियोजन नीति को आकार दिया। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के नए वर्किंग पेपर ‘द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल परसिस्ट्स इन इंडिया’ में यह साफ कहा गया है।

पेपर के लेखक संजीव सान्याल (ईएसी-पीएम सदस्य), आकांक्षा अरोड़ा और विराट सिंह हैं। इसमें तर्क दिया गया है कि प्रजनन दर इतनी गिर चुकी है कि जनसंख्या नियंत्रण अब सरकारी नीति का उद्देश्य नहीं होना चाहिए

राष्ट्रीय प्रजनन दर 1.9, यूपी-बिहार छोड़कर सिर्फ 1.6

रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 1.9 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे है। अगर उत्तर प्रदेश और बिहार को हटा दिया जाए तो यह दर और गिरकर 1.6 हो जाती है। यह अमेरिका (1.6) और उत्तरी यूरोप (1.5) के बराबर है।

राज्यवार प्रजनन दर (टीएफआर):

राज्य प्रजनन दर
दिल्ली 1.2
सिक्किम 1.0
केरल 1.3
तमिलनाडु 1.3
पश्चिम बंगाल 1.3
पंजाब 1.4
आंध्र प्रदेश 1.4
महाराष्ट्र 1.4
तेलंगाना 1.5
कर्नाटक 1.5

दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्य पहले ही उम्रदराज समाज बनने की राह पर हैं। इन राज्यों की औसत आयु (मीडियन एज) लगभग 35 साल है, जबकि पूरे भारत की औसत आयु करीब 30 साल है। ये राज्य जनसांख्यिकीय रूप से अमेरिका (औसत आयु 39) जैसी एजिंग अर्थव्यवस्थाओं के करीब पहुंच चुके हैं।

2001 से 2023 तक जन्मों में 20% गिरावट

भारत में जन्म लेने वाले बच्चों की वार्षिक संख्या 2001 में लगभग 2.93 करोड़ के शिखर पर थी। 2023 में यह घटकर लगभग 2.32 करोड़ रह गई—लगभग 20-21 प्रतिशत की कमी। वर्तमान में जन्मों की संख्या लगभग उतनी ही है, जितनी 50 साल पहले 1974 में थी। यह उस देश के लिए बड़ा बदलाव है, जिसकी आबादी तब से दोगुनी से अधिक हो गई है।

चीन की गलती भारत के लिए चेतावनी

पेपर में चीन के अनुभव को सबसे उपयोगी बताया गया है। चीन ने दशकों तक जन्म दर को सख्ती से सीमित किया। अब वह उस जनसांख्यिकीय बदलाव को उलटने की कोशिश कर रहा है, जो गहराई से जड़ जमा चुका है। एक बार जब कम प्रजनन दर सामाजिक मानदंड बन जाती है, तो दिशा बदलना बेहद मुश्किल हो जाता है। भारत को भी इसी “लो-फर्टिलिटी ट्रैप” में फंसने का खतरा है।

पुरानी नीतियां अब नुकसानदेह

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि परिवार नियोजन नीतियों में नई जनसांख्यिकीय वास्तविकता झलकनी चाहिए। इसके बावजूद सिस्टम अभी भी नसबंदी और जनसंख्या नियंत्रण को वित्तीय इनाम देकर बढ़ावा दे रहा है।

ईएसी-पीएम के प्रमुख सुझाव:

  • नसबंदी से जुड़े नकद प्रोत्साहन (एक्सेप्टर पेमेंट, वेज लॉस कंपंसेशन) बंद किए जाएं।
  • दो-बच्चे के नॉर्म से जुड़ी अयोग्यताएं हटाई जाएं।
  • वर्ल्ड पॉपुलेशन डे और वैसेक्टॉमी फोर्टनाइट जैसे कार्यक्रमों से जनसंख्या नियंत्रण का संदेश हटाया जाए।
  • नीति दस्तावेजों से “जनसंख्या नियंत्रण”, “प्रजनन दर घटाना” और “स्थिरीकरण” जैसी भाषा पूरी तरह हटाई जाए।
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