गोड्डा। विजयादशमी के दिन जहां चारों ओर उत्साह, उमंग और खुशियों का माहौल रहता है, वहीं झारखंड के गोड्डा में संताल आदिवासी समुदाय ने अपनी अलग परंपरा के तहत सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। संताल समाज के लोग राजा महिषासुर को अपना पूर्वज और इष्ट मानते हैं। उनकी मान्यता है कि महिषासुर की हत्या छल से की गई थी। इसी विश्वास के साथ समुदाय के लोग हर साल दशमी के दिन पारंपरिक सैन्य वेशभूषा में दुर्गा पूजा पंडालों में पहुंचते हैं और अपने पूर्वज को खोजते हुए विरोध जताते हैं।
दशमी के दिन सैन्य वेशभूषा में पहुंचती है आदिवासियों की टोली
संताल आदिवासी समुदाय में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। दशमी के दिन समुदाय की चुनिंदा मंडलियां उन दुर्गा पूजा पंडालों में पहुंचती हैं, जहां पूजा का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। इन मंडलियों के सदस्य सैनिकों जैसी वेशभूषा धारण करते हैं और अपने इष्ट राजा महिषासुर को खोजते हुए प्रतिमा के सामने पहुंचते हैं।
इस दौरान वे ‘बोलो-बोलो मेरा महिषा कहां है’ का उद्घोष करते हैं। समुदाय के लोगों का मानना है कि उनके पूर्वज महिषासुर को छल से मार दिया गया था। इसलिए विजयादशमी उनके लिए केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि अपने पूर्वज को याद करने और उनकी मान्यताओं को सामने रखने का दिन भी है।
पुजारी देते हैं शीतल जल और तुलसी का प्रसाद
पूजा पंडालों में सांकेतिक विरोध दर्ज कराने के बाद पुजारी आदिवासियों की टोली को समझाते हैं कि महिषासुर का वध नहीं, बल्कि उन्हें मुक्ति मिली है। इसके बाद पुजारी उन्हें शीतल जल और तुलसी का प्रसाद देते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद आदिवासियों की टोली संतुष्ट होकर लौट जाती है।
यह पूरी प्रक्रिया समुदाय की मान्यताओं और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद का एक अनूठा उदाहरण है।
बल्बड्डा के 150 साल पुराने पंडाल में भी दिखी परंपरा
गोड्डा के बल्बड्डा स्थित करीब 150 साल पुराने दुर्गा पूजा पंडाल में भी यह परंपरा देखने को मिली। प्रधान पुजारी मनकी बाबा ने बताया कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। सांकेतिक विरोध के बाद आदिवासियों की टोली खुशी-खुशी मेले में शामिल हो जाती है।
मेला प्रबंधन करता है आदिवासियों की टोली का स्वागत
स्थानीय निवासी शैलेन्द्र सिंह के मुताबिक, यह एक पुरानी और सांकेतिक परंपरा है। मेला प्रबंधन की ओर से आदिवासियों की टोली को आमंत्रित किया जाता है। उनका सम्मान करने के साथ उन्हें पुरस्कृत भी किया जाता है। इस तरह विरोध की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के बाद आदिवासी समुदाय के लोग मेले के उत्सव में शामिल होते हैं।
महिषासुर को अपना पूर्वज मानता है संताल समाज
आदिवासी मामलों के जानकार हवलदार किस्कू बताते हैं कि संताल समाज की मान्यता के अनुसार महिषासुर उनके पूर्वज हैं। उनका वास्तविक नाम महिषा सोरेन बताया जाता है। समुदाय का विश्वास है कि उन्हें छलपूर्वक मारा गया था। दशमी के दिन किया जाने वाला यह प्रदर्शन इसी मान्यता से जुड़ा सांकेतिक विरोध है।
संताल आदिवासियों की यह परंपरा विजयादशमी के प्रचलित धार्मिक आख्यान से अलग दृष्टिकोण सामने रखती है। यह आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पूर्वजों के प्रति सम्मान और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम है।

