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ब्रिक्स के मंच से भारत ने बनाई नई वैश्विक पहचान

-किसी खेमे से बंधे बिना बहुध्रुवीय व्यवस्था में संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरा भारत

नई दिल्ली। दुनिया की राजनीति इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पुरानी शक्ति-संरचनाएं धीरे-धीरे ढीली पड़ रही हैं और नए केंद्र उभर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप का प्रभाव आज भी बड़ा है, लेकिन एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब केवल परिधि पर खड़े दर्शक नहीं रह गए हैं। वे अपनी आर्थिक ताकत, जनसंख्या, संसाधनों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के आधार पर वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में हिस्सेदारी चाहते हैं। इसी बदलाव का प्रतीक ब्रिक्स जैसा मंच बन गया है। भारत के लिए ब्रिक्स केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है। यह उसकी स्वतंत्र विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को आकार देने का प्रभावी जरिया है।

नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन ने यह साफ कर दिया कि भारत अब किसी एक शक्ति-गठबंधन का अनुसरण करने वाला देश नहीं है। वह अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के बीच संवाद बनाए रखने, टकराव कम करने और संतुलन साधने वाली स्वतंत्र शक्ति के रूप में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स मंच पर आर्थिक सहयोग, विकासशील देशों की चिंताओं, शांति, स्थिरता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को जिस तरह प्राथमिकता दी, उससे भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और वैश्विक महत्वाकांक्षा दोनों झलकती हैं।

नई दिल्ली की कूटनीति: दबाव नहीं, संवाद

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई मुद्दों पर दुनिया दो ध्रुवों में बंटती दिख रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, नाटो का विस्तार, पश्चिमी प्रतिबंध, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा-सुरक्षा से जुड़े विवादों ने कई देशों के लिए विदेश नीति को कठिन बना दिया है। ऐसे में भारत ने जो रास्ता चुना है, वह दबाव में आने का नहीं, बल्कि संवाद और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने का है।

भारत का रुख स्पष्ट है—किसी भी वैश्विक विवाद का स्थायी समाधान सैन्य टकराव से नहीं, बातचीत से निकलेगा। यही कारण है कि भारत ने न तो पश्चिमी प्रतिबंधों की नकल की और न ही रूस के साथ खड़े होकर पश्चिम के खिलाफ मोर्चा बनाया। भारत ने अपने ऊर्जा हित, रक्षा साझेदारी, व्यापारिक जरूरतें और क्षेत्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक स्वतंत्र रास्ता चुना। ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत की मौजूदगी इस नीति को वैश्विक वैधता देती है।

ब्रिक्स का विस्तार और भारत का बढ़ता कद

ब्रिक्स की यात्रा शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित थी। लेकिन अब इसका दायरा तेजी से बढ़ा है। नए सदस्य देशों के जुड़ने से इस मंच का भौगोलिक विस्तार, आर्थिक भार और राजनीतिक प्रभाव तीनों बढ़े हैं। दुनिया की एक बड़ी आबादी, ऊर्जा संसाधन, खनिज संपदा और उभरते बाजार अब ब्रिक्स से जुड़ चुके हैं। ऐसे में ब्रिक्स की मेज पर भारत की भूमिका केवल औपचारिक नहीं रह गई है। भारत वहां अपनी अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, युवा श्रमबल और विकासशील देशों के साथ संबंधों के आधार पर एक स्वतंत्र एजेंडा रखता है।

ब्रिक्स का महत्व केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसका आर्थिक आधार भी मजबूत हो रहा है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन पर चर्चा आगे बढ़ रही है। अगर इन पहलों को ठोस रूप दिया जाता है, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्प बनेंगे और विकासशील देशों की निर्भरता कुछ हद तक कम होगी। भारत के लिए यह मौका इसलिए भी अहम है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और भारतीय बाजार पर दुनिया की बड़ी कंपनियों की नजर है।

राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: स्वायत्त विदेश नीति की परीक्षा

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत ने कभी यह नहीं माना कि अमेरिका या यूरोप के साथ संबंध मजबूत करने का मतलब रूस, चीन या अन्य उभरते देशों से दूरी बनाना है। इसी तरह, ब्रिक्स या शंघाई सहयोग संगठन में सक्रियता का अर्थ पश्चिम से टकराव भी नहीं है। भारत की कोशिश है कि वह हर मंच पर अपने राष्ट्रीय हितों को आगे रखे और संभव हो तो सभी पक्षों के साथ काम करने की जगह बनाए।

यह रणनीति आसान नहीं है। इसके लिए लगातार संतुलन बनाना पड़ता है। भारत को एक ओर क्वाड, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ तकनीक, रक्षा और व्यापार में सहयोग बढ़ाना है, तो दूसरी ओर रूस के साथ पुरानी रक्षा साझेदारी और ऊर्जा संबंध बनाए रखने हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग को संभालना है। ब्रिक्स इसी जटिल कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यूक्रेन संकट में भारत की स्वतंत्र पंक्ति

रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति में जो दरार पैदा की, वह आज भी पूरी तरह भर नहीं पाई है। पश्चिमी देशों ने रूस पर कई चरणों में प्रतिबंध लगाए। रूस ने अपनी ऊर्जा और सुरक्षा नीति को नए सिरे से परिभाषित किया। चीन ने रूस के साथ रणनीतिक संबंध जारी रखे। कई विकासशील देशों ने खुद को किसी एक खेमे में बांधने से इनकार किया। भारत ने भी यही रास्ता चुना। भारत ने न तो युद्ध का समर्थन किया और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों में शामिल हुआ। भारत ने शांति, संवाद और कूटनीति पर जोर दिया।

भारत का यह रुख उसकी विदेश नीति की परिपक्वता दिखाता है। भारत यह समझता है कि आज के दौर में किसी भी संकट का समाधान केवल एक पक्ष की जीत से नहीं निकलेगा। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, रक्षा उपकरण और तकनीक जैसे मुद्दों पर भारत की अपनी जरूरतें हैं। इसलिए भारत हर पक्ष से संवाद बनाए रखता है। ब्रिक्स में भारत की सक्रियता इसी स्वतंत्र रुख को और विश्वसनीय बनाती है।

विकासशील देशों की साझा आवाज कैसे बनेगी?

ब्रिक्स के माध्यम से भारत विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों की समस्याएं एक जैसी हैं। गरीबी, बेरोजगारी, खाद्य असुरक्षा, ऊर्जा संकट, महंगा कर्ज, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा में असमानता और जलवायु परिवर्तन का दबाव इन देशों के सामने बड़ी चुनौती है। इन मुद्दों पर बड़े विकसित देशों के निर्णय हमेशा विकासशील देशों के हित में नहीं होते। भारत चाहता है कि वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में इन देशों की भागीदारी बढ़े।

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने और व्यापार नियमों को संतुलित बनाने की मांग करता रहा है। ब्रिक्स इन मांगों को आगे बढ़ाने का एक प्रभावी मंच बन सकता है। भारत की कोशिश है कि ब्रिक्स केवल कुछ देशों का समूह न रहे, बल्कि वैश्विक दक्षिण की साझा आवाज बने।

व्यापार, निवेश और स्थानीय मुद्रा: आर्थिक कूटनीति का नया खाका

ब्रिक्स का एक बड़ा आयाम आर्थिक सहयोग है। सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने, निवेश के रास्ते आसान करने, स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन को प्रोत्साहित करने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने पर लगातार चर्चा हो रही है। अगर इन पहलों को जमीन पर उतारा जाता है, तो डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है और विकासशील देशों को संकट के समय अधिक विकल्प मिल सकते हैं।

भारत के लिए यह अवसर बड़ा है। भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। भारत की आबादी, बाजार और डिजिटल क्षमता उसे एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनाती है। यदि भारत ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ाता है, तो भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिल सकते हैं। छोटे और मझोले उद्यमों को निर्यात के नए अवसर मिल सकते हैं। कृषि, वस्त्र, औषधि, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाओं में सहयोग बढ़ सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा और दुर्लभ खनिजों में साझेदारी की संभावना

आने वाले दशकों में ऊर्जा और दुर्लभ खनिज वैश्विक राजनीति के केंद्र में रहेंगे। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों के लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट और दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग तेजी से बढ़ रही है। भारत इन संसाधनों के लिए आयात पर निर्भर है। ब्रिक्स देशों में रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और कई नए सदस्य देशों के पास महत्वपूर्ण खनिज भंडार हैं। ऐसे में ऊर्जा और खनिज साझेदारी भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है।

भारत चाहता है कि ऊर्जा आपूर्ति बहुविध हो और किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता न बढ़े। ब्रिक्स मंच पर ऊर्जा सहयोग, निवेश और तकनीक हस्तांतरण पर बात आगे बढ़ सकती है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और औद्योगिक विकास को बल मिलेगा।

डिजिटल सार्वजनिक ढांचा: भारत की सॉफ्ट पावर

भारत की एक नई ताकत डिजिटल सार्वजनिक ढांचा है। यूपीआई, आधार, डिजिलॉकर, कोविन, ओएनडीसी और अन्य डिजिटल सेवाओं ने भारत में शासन, वित्तीय समावेशन और सेवा वितरण को बदल दिया है। अब भारत इस अनुभव को विकासशील देशों के साथ साझा करने की स्थिति में है। ब्रिक्स के सदस्य देश और अन्य विकासशील राष्ट्र डिजिटल पहचान, भुगतान, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि तकनीक में भारत के साथ सहयोग कर सकते हैं।

इससे भारत की टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी मजबूत होगी। भारतीय तकनीकी कंपनियों को नए बाजार मिलेंगे। साथ ही भारत वैश्विक डिजिटल शासन के नियमों में अपनी भागीदारी बढ़ा सकेगा। डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, एआई और डिजिटल भुगतान के मानकों पर भारत की भूमिका अहम हो सकती है।

चीन से रिश्ते: असहमति के बीच सहयोग की राह

ब्रिक्स में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर दोनों चीन है। भारत और चीन के बीच व्यापार बड़ा है, लेकिन सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और एशिया में प्रभाव की होड़ भी जारी है। दोनों देशों के संबंधों में विश्वास की कमी एक पुरानी समस्या है। ऐसे में ब्रिक्स में सहयोग करना आसान नहीं है, लेकिन पूरी तरह दूरी बनाना भी संभव नहीं।

भारत की कोशिश है कि चीन के साथ मतभेदों को बहुपक्षीय सहयोग से अलग रखा जाए। सीमा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भारत अपना रुख स्पष्ट रखता है, लेकिन व्यापार, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर सहयोग की गुंजाइश बनाए रखता है। ब्रिक्स इसी संतुलन का मंच है। भारत ब्रिक्स को पश्चिमविरोधी मंच नहीं बनाना चाहता, क्योंकि इससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित होगी।

नए सदस्य, नई प्राथमिकताएं, नई चुनौतियां

ब्रिक्स के विस्तार से संभावनाएं बढ़ी हैं, लेकिन जटिलताएं भी। नए सदस्य देशों की अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं, आर्थिक जरूरतें और राजनीतिक नजरिए हैं। कई देशों के बीच आपसी मतभेद भी हैं। ऐसे में सभी मुद्दों पर एक साथ सहमति बनाना मुश्किल होगा। भारत को यह समझना होगा कि ब्रिक्स की उपयोगिता केवल संयुक्त बयान जारी करने में नहीं है। असली पहचान ठोस परियोजनाओं, व्यापार समझौतों, निवेश सुविधाओं, तकनीक साझेदारी और लोगों के बीच संपर्क से बनेगी।

भारत को ब्रिक्स के भीतर एक संतुलनकारी और सेतु-निर्माता की भूमिका निभानी होगी। उसे विकासशील देशों की आकांक्षाओं को आगे रखना होगा, लेकिन साथ ही अमेरिका, यूरोप और अन्य साझेदारों से संबंध भी बिगड़ने नहीं देने होंगे। यही भारत की कूटनीतिक कला है।

झारखंड: खनिज भंडार से वैश्विक मूल्य श्रृंखला तक

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का असर अंततः राज्यों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। झारखंड इसका बड़ा उदाहरण है। राज्य कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, अभ्रक और अन्य खनिजों से समृद्ध है। राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खनन, धातु, ऊर्जा और उद्योग से जुड़ा है। अगर भारत ब्रिक्स देशों के साथ ऊर्जा, खनिज, तकनीक और औद्योगिक सहयोग बढ़ाता है, तो झारखंड को निवेश, तकनीक और बाजार के नए अवसर मिल सकते हैं।

लेकिन केवल कच्चा खनिज निकालकर बेचना झारखंड के लिए दीर्घकालिक समाधान नहीं है। राज्य को मूल्यवर्धन पर ध्यान देना होगा। इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट, बैटरी सामग्री, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण और इंजीनियरिंग उत्पादों में स्थानीय विनिर्माण बढ़ाना होगा। कौशल विकास, तकनीकी संस्थान, शोध और नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देनी होगी। तभी वैश्विक साझेदारी का लाभ आम लोगों तक पहुंचेगा।

अमेरिका-यूरोप से रूस-चीन तक: संतुलन की कला

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने अलग-अलग ध्रुवों के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं। भारत क्वाड में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है। यूरोप के साथ व्यापार, तकनीक और जलवायु सहयोग बढ़ा रहा है। रूस के साथ रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष संबंध बनाए हुए है। चीन के साथ व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद जारी रखे हुए है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में सक्रिय है। यह संतुलन आसान नहीं है, लेकिन भारत ने इसे काफी हद तक साधा है।

इसी कारण भारत आज वैश्विक राजनीति में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में देखा जाता है। भारत न तो पश्चिम का पिछलग्गू बना और न ही चीन-रूस के खेमे में पूरी तरह शामिल हुआ। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखकर हर देश से संबंध तय किए। यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत है।

संयुक्त राष्ट्र और वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग

ब्रिक्स का एक प्रमुख एजेंडा वैश्विक संस्थाओं में सुधार है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आज भी पुरानी शक्ति-संरचना बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक में विकासशील देशों की हिस्सेदारी उनकी वास्तविक आर्थिक ताकत के अनुरूप नहीं है। विश्व व्यापार संगठन के नियम भी कई मामलों में विकसित देशों के हितों को अधिक संरक्षण देते हैं। भारत इन संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।

ब्रिक्स इस मांग को अधिक शक्ति दे सकता है। यदि विकासशील देश एकजुट होकर संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ, विश्व बैंक और व्यापार संस्थाओं में सुधार की बात करें, तो दबाव बढ़ेगा। भारत की कोशिश है कि ब्रिक्स केवल एक आर्थिक समूह न रहे, बल्कि वैश्विक शासन सुधार का प्रभावी मंच बने।

आगे की राह: घोषणाओं से जमीनी नतीजों तक

ब्रिक्स सम्मेलन से भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ी है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। सम्मेलन में बनी सहमतियों को जमीन पर उतारना होगा। भारत को ग्लोबल साउथ की आवाज उठाने के साथ अपने आर्थिक हितों को भी आगे बढ़ाना होगा। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन बनाना होगा। अमेरिका और यूरोप के साथ मजबूत होते संबंधों को बनाए रखना होगा। रूस के साथ पुरानी साझेदारी को नई परिस्थितियों में संभालना होगा।

भारत को ब्रिक्स के भीतर ठोस परियोजनाओं पर जोर देना होगा। व्यापार बढ़ाना, निवेश की बाधाएं घटाना, ऊर्जा और खनिज साझेदारी, डिजिटल तकनीक सहयोग, शिक्षा और स्वास्थ्य में भागीदारी, जलवायु वित्त और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण ऐसे क्षेत्र हैं जहां तेजी से काम हो सकता है। अगर भारत केवल बैठकों और बयानों तक सीमित रहा, तो ब्रिक्स का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।

भारत अब नियम बनाने की दिशा में

आज की दुनिया में कूटनीतिक ताकत केवल सैन्य शक्ति या अर्थव्यवस्था के आकार से तय नहीं होती। यह इस बात से भी तय होती है कि कोई देश कितने देशों से संवाद कर सकता है, संकट के समय कितने देशों को साथ ला सकता है और अपनी बात को कितनी मजबूती से वैश्विक एजेंडे में शामिल करा सकता है। इस कसौटी पर भारत की स्थिति पहले से मजबूत हुई है। ब्रिक्स सम्मेलन ने इस बदलाव को और स्पष्ट किया है।

भारत अब केवल वैश्विक मंचों पर उपस्थिति दर्ज कराने वाला देश नहीं रह गया है। वह वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय करने में अपनी भूमिका तलाश रहा है। ब्रिक्स भारत के लिए इसी बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि भारत आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को एक साथ आगे बढ़ाता है, तो आने वाले वर्षों में उसकी कूटनीतिक ताकत और बढ़ सकती है।

ब्रिक्स की मेज पर भारत अब केवल संख्या बढ़ाने वाला सदस्य नहीं है। वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, विशाल बाजार, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और विकासशील देशों के साथ संबंधों के आधार पर अपनी भूमिका तय करने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स भारत को एक साथ तीन ताकतें दे सकता है—बड़ा बाजार, मजबूत साझेदारियां और बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव। लेकिन इन अवसरों को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग का संतुलन साधना होगा, अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध मजबूत रखने होंगे और विकासशील देशों के बीच अपनी विश्वसनीयता बढ़ानी होगी।

अगर भारत ऐसा करने में सफल रहता है, तो ब्रिक्स केवल उसकी विदेश नीति का एक मंच नहीं रहेगा, बल्कि भारत को वैश्विक व्यवस्था में नियम बनाने वाली शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो सकता है। और इसका असर दिल्ली से बहुत दूर झारखंड जैसे राज्यों तक भी पहुंच सकता है—बशर्ते वैश्विक साझेदारियों को निवेश, उद्योग, रोजगार और स्थानीय विकास में बदलने की रणनीति राज्य स्तर पर तैयार हो। यही ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश है: भारत की कूटनीतिक ताकत अब केवल बयानों तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को आकार देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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