रांची। झारखंड में भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा चिंता का कारण बनी हुई है। भारत सरकार के National Programme for Prevention and Control of Fluorosis (NPPCF) की जनवरी से मार्च 2026 की तिमाही रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के सात जिलों के 283 गांवों में पानी में फ्लोराइड का स्तर अधिक पाया गया है। इसका असर बच्चों और वयस्कों की सेहत पर भी देखने को मिल रहा है।
हजारीबाग में सबसे अधिक प्रभावित गांव
रिपोर्ट के अनुसार हजारीबाग सबसे अधिक प्रभावित जिला है, जहां 89 गांवों में पानी में फ्लोराइड का स्तर अधिक मिला। इसके बाद गोड्डा के 81, गढ़वा के 35, साहिबगंज के 34, रामगढ़ के 28, गिरिडीह के 9 और पलामू के 7 गांव फ्लोराइड प्रभावित पाए गए हैं।
राज्य के NCD स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. रविराज के अनुसार झारखंड के कुल 13 जिलों में फ्लोराइड की समस्या मौजूद है, जबकि सात जिलों में स्थिति ज्यादा गंभीर है।
बच्चों में डेंटल फ्लोरोसिस के मामले
फ्लोराइड का असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी सामने आ रहा है। स्कूलों में हुई स्क्रीनिंग के दौरान कई बच्चों में डेंटल फ्लोरोसिस के संदिग्ध और पुष्ट मामले मिले हैं।
रामगढ़ में 2,826 बच्चों की जांच में 412 संदिग्ध मामले सामने आए, जिनमें 221 की पुष्टि हुई। गोड्डा में 410 बच्चों की स्क्रीनिंग में 108 संदिग्ध और 14 पुष्ट मामले मिले।
साहिबगंज में बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग करते हुए 54,214 बच्चों की जांच की गई, जिसमें 1,369 बच्चे डेंटल फ्लोरोसिस के संदिग्ध पाए गए। हजारीबाग में 485 बच्चों की जांच में 20, गढ़वा में 262 बच्चों में 3 और गिरिडीह में 129 बच्चों में 3 संदिग्ध मामले सामने आए।
वयस्कों में भी फ्लोरोसिस का खतरा
सामुदायिक सर्वे में भी फ्लोरोसिस के मामले सामने आए हैं। रामगढ़ में 934 लोगों की जांच में 76 संदिग्ध डेंटल फ्लोरोसिस के मामले मिले, जबकि चार की पुष्टि हुई। गोड्डा में 77 लोगों की जांच में 18 संदिग्ध और दो पुष्ट मामले सामने आए। यहां चार लोगों में स्केलेटल फ्लोरोसिस का भी संदेह जताया गया है।
इन 13 जिलों में फ्लोराइड की समस्या
झारखंड के चतरा, धनबाद, गढ़वा, गिरिडीह, गोड्डा, हजारीबाग, जामताड़ा, पाकुड़, पलामू, रामगढ़, रांची, साहिबगंज और सिमडेगा में फ्लोराइड की समस्या दर्ज की गई है।
इनमें हजारीबाग, रामगढ़, साहिबगंज, पलामू, गोड्डा, गिरिडीह और गढ़वा को ज्यादा गंभीर रूप से प्रभावित जिलों में शामिल किया गया है।
पानी के नमूनों में भी मिला ज्यादा फ्लोराइड
पानी की जांच के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। रामगढ़ में जांचे गए 174 नमूनों में कोई भी नमूना 1 पीपीएम से अधिक नहीं पाया गया। वहीं गोड्डा में 23 में से 2 नमूने 1 पीपीएम से अधिक मिले।
पलामू में स्थिति सबसे गंभीर बताई गई है। यहां 137 पानी के नमूनों में 89 नमूने 1 पीपीएम से अधिक पाए गए। गढ़वा में 132 में से 44, हजारीबाग में 195 में से 20, गिरिडीह में 22 में से 2 और साहिबगंज में 750 में से 153 नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक फ्लोराइड दर्ज किया गया।
20 जलस्रोत अनफिट घोषित
फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना भी बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार रामगढ़ में 20 जलस्रोतों को अनफिट घोषित किया गया है, जबकि 15 सुरक्षित जलस्रोत उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है।
कई जिलों में लैब की व्यवस्था ठप
फ्लोरोसिस की निगरानी और जांच के लिए District Fluorosis Cell की व्यवस्था है, लेकिन सभी जिलों में प्रयोगशालाएं सुचारू रूप से संचालित नहीं हो रही हैं। हजारीबाग, रांची और गिरिडीह की लैब को नॉन-फंक्शनल बताया गया है, जबकि रामगढ़, गोड्डा, साहिबगंज, पलामू और गढ़वा में लैब कार्यरत हैं।
रामगढ़ में स्वास्थ्य प्रबंधन के तहत 1,733 लोगों को विटामिन-D और कैल्शियम की गोलियां दिए जाने का भी उल्लेख रिपोर्ट में है।
डॉक्टरों ने दी सावधानी बरतने की सलाह
रांची सदर अस्पताल की चिकित्सक डॉ. कुमारी रजनी के अनुसार, अत्यधिक फ्लोराइड का लंबे समय तक सेवन बच्चों के दांतों और हड्डियों पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। इसका असर त्वचा पर भी पड़ सकता है। उन्होंने फ्लोराइड की अधिक मात्रा वाले पानी के सेवन को रोकने पर जोर दिया।
स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. रविराज ने बताया कि बच्चों में डेंटल फ्लोरोसिस और किसी भी उम्र के लोगों में स्केलेटल फ्लोरोसिस हो सकता है। उन्होंने कहा कि बच्चों के दांतों में पीलापन, टूटने, धारियां या असामान्यता दिखाई देने पर चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि किसी गांव से फ्लोरोसिस का मामला सामने आने पर वहां के जलस्रोतों की जांच कराई जाती है। पानी में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानक से अधिक मिलने पर उस जलस्रोत के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है। बंद पड़ी लैब को भी जल्द शुरू कराने की बात कही गई है।
सुरक्षित पानी और नियमित जांच जरूरी
झारखंड में फ्लोराइड प्रभावित गांवों और पानी के नमूनों के आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल जल गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। प्रभावित इलाकों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, बच्चों की नियमित स्क्रीनिंग, जलस्रोतों की निगरानी और मरीजों के उपचार पर एक साथ काम करना जरूरी है।

