रांची। झारखंड की राजनीति में कुछ ऐसे नाम रहे हैं, जिनकी पहचान किसी पद या चुनावी जीत से नहीं, बल्कि संगठन और विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा से बनी। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पीएन सिंह भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के छह दशक से अधिक समय कांग्रेस को समर्पित कर दिए। राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, सत्ता के समीकरण बदले, कांग्रेस का स्वरूप बदला और झारखंड अलग राज्य बना, लेकिन कांग्रेस के प्रति पीएन सिंह की प्रतिबद्धता कभी नहीं बदली।
आज पीएन सिंह भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका सहज व्यवहार, मृदुभाषी व्यक्तित्व, स्पष्ट विचार और संगठन के प्रति समर्पण उन्हें कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी की यादों में जीवित रखता है। उनकी राजनीतिक विरासत को आज उनके परिवार के सदस्य आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, हाल की एक घटना ने इस परिवार और कांग्रेस के रिश्ते को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।
स्वतंत्रता सेनानी परिवार में हुआ जन्म
पीएन सिंह का जन्म 2 जून 1942 को ऐसे परिवार में हुआ था, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी थीं। उनके पिता स्वर्गीय रामाश्रय सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से उनके करीबी संबंध बताए जाते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रामाश्रय सिंह ने लंबे समय तक जेल में रहकर संघर्ष किया।
परिवार की राजनीतिक चेतना इससे भी पुरानी थी। उनके दादा जमधारी सिंह और परिवार के अन्य सदस्य भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। परिवार का घर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकों का केंद्र हुआ करता था। अंग्रेजी सरकार को जब इसकी जानकारी मिली, तो बैठकों पर रोक लगाने और परिवार को चेतावनी देने की कोशिश की गयी। इसके बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों का उत्साह कम नहीं हुआ और गुप्त बैठकें जारी रहीं।
चंपारण आंदोलन की विरासत
पीएन सिंह के परिवार का संबंध महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह से जुड़े आंदोलन से भी रहा। उनकी दादी भी स्वतंत्रता सेनानी थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।
ऐसे माहौल में पले-बढ़े पीएन सिंह के लिए कांग्रेस महज एक राजनीतिक दल नहीं थी। कांग्रेस उनके लिए परिवार की विरासत, संस्कार और जीवन का हिस्सा थी।
छात्र जीवन के बाद सक्रिय राजनीति में कदम
जगदंबा कॉलेज, छपरा से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पीएन सिंह सक्रिय राजनीति की ओर बढ़े। वर्ष 1960-61 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से जुड़े और करीब 1964 से उन्होंने सक्रिय राजनीतिक जीवन को पूरी तरह अपना लिया।
उस समय रांची जिला आज के मुकाबले काफी बड़ा था। सिमडेगा, गुमला, खूंटी और लोहरदगा जैसे इलाके भी बड़े रांची जिले का हिस्सा थे। पीएन सिंह ने संगठन को मजबूत करने के लिए शहर की राजनीति तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने गांवों और पंचायतों का रुख किया।
गांव-गांव पहुंचाकर मजबूत किया कांग्रेस संगठन
पीएन सिंह की राजनीति का सबसे मजबूत पक्ष उनका जमीनी जुड़ाव था। वह गांव-गांव जाते, पंचायतों में पहुंचते, कार्यकर्ताओं से मिलते और आम लोगों की समस्याएं सुनते थे। कांग्रेस की विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने के साथ-साथ वह कार्यकर्ताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध भी बनाते थे।
जिला संगठन में जिम्मेदारियां मिलने के बाद उन्होंने रांची जिले के 42 प्रखंडों का दौरा कर संगठन को मजबूत करने का प्रयास किया। उस दौर में जब सोशल मीडिया या डिजिटल माध्यम नहीं थे, संगठन को मजबूत करने का सबसे बड़ा आधार कार्यकर्ताओं और जनता के बीच सीधा संपर्क था। पीएन सिंह इसी राजनीति के मजबूत संगठनकर्ता थे।
1964 के सांप्रदायिक तनाव में निभाई भूमिका
वर्ष 1964 में रांची सांप्रदायिक तनाव के दौर से गुजरा। उस समय भी पीएन सिंह ने सामाजिक सौहार्द और लोगों के बीच विश्वास कायम रखने की कोशिश की। उनके लिए राजनीति सिर्फ पार्टी तक सीमित नहीं थी। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और आपसी विश्वास बनाए रखना भी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
यही वजह थी कि कांग्रेस से बाहर के राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग भी अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुंचते थे।
कांग्रेस के विभाजन के दौर में भी नहीं बदली निष्ठा
कांग्रेस के इतिहास में वह दौर भी आया जब पार्टी विभाजित हुई। चुनाव चिह्न बदले और देश की राजनीति में बड़े बदलाव हुए। लेकिन पीएन सिंह की कांग्रेस के प्रति निष्ठा बरकरार रही।
वह संगठन से जुड़े रहे और कांग्रेस की विचारधारा को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में जुटे रहे। धीरे-धीरे उनकी पहचान केवल रांची तक सीमित नहीं रही, बल्कि बिहार के व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में एक मजबूत संगठनकर्ता के रूप में बनी।
राष्ट्रीय नेताओं तक थी सीधी पहुंच
राजनीतिक जीवन में पीएन सिंह का कद बढ़ता गया। बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे और केदार पांडेय जैसे नेताओं के साथ उनके सीधे संपर्क रहे। राष्ट्रीय स्तर पर भी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, वसंत दादा पाटिल और बलराम जाखड़ जैसे नेताओं से उनके संपर्क रहे।
छोटानागपुर क्षेत्र में कांग्रेस के संगठन और चुनावी रणनीति से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय को महत्व दिया जाता था। उनकी खासियत यह थी कि वह दिल्ली और गांव के बीच एक सेतु की तरह काम करते थे।
1990 में लड़ा विधानसभा चुनाव
वर्ष 1990 में कांग्रेस ने पीएन सिंह को हटिया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा। संगठन में मजबूत पकड़ और लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उन्हें चुनाव में मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि चुनावी हार ने उनकी कांग्रेस के प्रति निष्ठा को प्रभावित नहीं किया। वह संगठन के साथ उसी तरह जुड़े रहे जैसे चुनाव से पहले थे।
कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं
पीएन सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कांग्रेस और सरकार से जुड़े कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभायी। वह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव रहे। वर्ष 1986 से 1990 तक बिहार राज्य लघु उद्योग निगम के चेयरमैन रहे। वर्ष 1981 से 1983 तक रेलवे बोर्ड/कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति से जुड़े रहे।
इसके अलावा बिहार पहाड़ी क्षेत्र लिफ्ट सिंचाई निगम में निदेशक, बिहार राज्य किसान कांग्रेस के अध्यक्ष, खनिज विकास निगम कर्मचारी संघ के अध्यक्ष और झारखंड प्रदेश कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष जैसी जिम्मेदारियां भी निभायीं।
लेकिन तमाम पदों के बावजूद उनकी सबसे बड़ी पहचान कार्यकर्ता और संगठनकर्ता की ही रही।
कार्यकर्ताओं के नाम याद रखना थी खासियत
पीएन सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनका सहज व्यवहार था। वह छोटे से छोटे कार्यकर्ता से भी आत्मीयता से मिलते थे। एक बार मिलने के बाद कार्यकर्ता का नाम याद रखना उनकी खासियत थी।
रांची ही नहीं, झारखंड के दूरदराज इलाकों से आने वाले कार्यकर्ताओं को भी वह नाम से पुकारते थे। यह सिर्फ उनकी याददाश्त नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ दशकों में बने रिश्तों की गहराई को दर्शाता था।
राजनीतिक विरोधी भी कई बार अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुंचते थे। जाति, धर्म, समुदाय या राजनीतिक दल के आधार पर मदद का फैसला करना उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं था।
राजनीति से आगे समाज से भी गहरा रिश्ता
पीएन सिंह की राजनीति चुनाव और संगठन से आगे थी। नया साल, होली और दशहरा जैसे अवसरों पर लोगों को पोस्टकार्ड के जरिये शुभकामनाएं भेजना उनकी पुरानी आदत थी।
आज के डिजिटल दौर में यह भले ही सामान्य न लगे, लेकिन उस समय व्यक्तिगत तौर पर पोस्टकार्ड भेजकर शुभकामना देना रिश्तों को बनाए रखने का आत्मीय माध्यम था। वह परिचितों के सुख-दुख में शामिल होने का प्रयास करते थे।
झारखंड बना, लेकिन कांग्रेस नहीं छोड़ी
झारखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति में व्यापक बदलाव आये। क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा, नये राजनीतिक समीकरण बने और कांग्रेस की भूमिका भी बदली। लेकिन पीएन सिंह ने कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा।
उम्र बढ़ती गयी और स्वास्थ्य कमजोर होता गया। सक्रिय राजनीति में उनकी भागीदारी कम हुई, लेकिन पार्टी की गतिविधियों को लेकर उनकी रुचि बनी रही।
कभी-कभी उन्हें इस बात की पीड़ा होती थी कि पार्टी में पुराने नेताओं से पहले की तरह सलाह नहीं ली जाती। लेकिन वह इस शिकायत को भी सहजता से टाल देते थे। उनका कहना था कि ‘अब यूथ पॉलिटिक्स का जमाना है। उन्हें भी मौका मिलना चाहिए।’
यह बात उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है। अपनी उपेक्षा की पीड़ा के बावजूद उन्होंने नयी पीढ़ी के प्रति शिकायत नहीं रखी।
आखिरी दिनों तक कांग्रेस की चिंता
स्वास्थ्य खराब होने के बाद भी कांग्रेस उनके जीवन से दूर नहीं हुई। पार्टी में क्या हो रहा है, संगठन की स्थिति कैसी है और राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जा रही हैं, इन सवालों को लेकर उनकी दिलचस्पी आखिरी दिनों तक बनी रही।
सक्रिय राजनीति से दूर होने के बावजूद उनकी राजनीतिक चेतना कभी खत्म नहीं हुई।
28 अगस्त 2013 को हुआ निधन
28 अगस्त 2013 को पीएन सिंह का निधन हो गया। उनके जाने के साथ कांग्रेस की उस पीढ़ी का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ, जिसने संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा करने के लिए वर्षों तक मेहनत की थी।
उनकी कहानी सिर्फ एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति की कहानी भी है जब नेता कार्यकर्ताओं को नाम से जानते थे, गांवों की पगडंडियों पर संगठन खड़ा करते थे और राजनीतिक रिश्ते केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीं होते थे।
परिवार बढ़ा रहा कांग्रेस की विरासत
पीएन सिंह के चार पुत्र—शैलेंद्र सिंह, धर्मेंद्र सिंह, अमरेंद्र सिंह और राघवेंद्र सिंह लोहा—कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। परिवार की राजनीतिक विरासत और कांग्रेस के प्रति समर्पण को आगे बढ़ाने में सभी की भूमिका रही है।
इनमें अमरेंद्र सिंह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे हैं और पार्टी में को-ऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं।
पुण्यतिथि के अगले दिन अमरेंद्र सिंह का निलंबन
पीएन सिंह की कांग्रेस से छह दशक लंबी निष्ठा के बीच हाल की एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 28 अगस्त 2026 को कांग्रेस भवन में स्वर्गीय पीएन सिंह की 13वीं पुण्यतिथि मनायी गयी। कार्यक्रम में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए।
इसके ठीक अगले दिन, 29 अगस्त 2026 को उनके पुत्र अमरेंद्र सिंह को प्रदेश अनुशासन समिति ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया।
बताया गया कि इरबा सड़क जाम के दौरान सामने आये एक कथित वायरल वीडियो के मामले में अनुशासन समिति ने सुनवाई की थी। इसके बाद अगले आदेश तक अमरेंद्र सिंह को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करने का फैसला लिया गया।
कार्रवाई के बाद उठे सवाल
अमरेंद्र सिंह के निलंबन के बाद कांग्रेस के भीतर और बाहर इस कार्रवाई को लेकर चर्चा शुरू हो गयी। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाये और इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आयीं। कुछ लोगों ने कार्रवाई को कठोर बताया, तो कुछ ने अमरेंद्र सिंह के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक साजिश से जोड़कर भी देखा।
कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं के बीच भी इस मामले को लेकर असहमति की चर्चा सामने आयी। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जिस परिवार ने दशकों तक कांग्रेस के साथ अपना राजनीतिक जीवन जोड़ा, उसके सदस्य के खिलाफ पार्टी की कार्रवाई क्या इतनी कठोर होनी चाहिए थी।
हालांकि, अमरेंद्र सिंह का निलंबन कांग्रेस का आंतरिक संगठनात्मक मामला है और पार्टी की अनुशासन समिति ने अपने स्तर पर फैसला लिया है।
क्या कांग्रेस को अपने पुराने समर्पित परिवारों पर मंथन की जरूरत है?
पीएन सिंह की राजनीतिक यात्रा ऐसे दौर की याद दिलाती है जब पार्टी के लिए समर्पण को राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता था। उन्होंने पद के लिए कांग्रेस नहीं छोड़ी, चुनावी हार के बाद भी संगठन से दूरी नहीं बनाई और बदलते राजनीतिक दौर में भी पार्टी के साथ खड़े रहे।
ऐसे में उनके निधन के वर्षों बाद उनके परिवार के एक सक्रिय सदस्य के खिलाफ हुई कार्रवाई ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि क्या कांग्रेस को अपने पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं और परिवारों के योगदान को ध्यान में रखते हुए संगठनात्मक फैसलों पर मंथन नहीं करना चाहिए।
पीएन सिंह की विरासत यही बताती है कि राजनीति में पद आते-जाते हैं, चुनाव जीते और हारे जाते हैं, सरकारें बनती और बदलती हैं, लेकिन विचारधारा और संगठन के प्रति निष्ठा किसी नेता की सबसे बड़ी पहचान बन सकती है।
पीएन सिंह की सबसे बड़ी पहचान भी यही रही—वह कांग्रेस के रहे और आखिरी सांस तक कांग्रेस से उनका रिश्ता बना रहा।

