रांची: झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू का नाम ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाएगा, जिन्होंने राजनीति की शुरुआत एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में की और संघर्ष, संगठन के प्रति समर्पण तथा जनता से जुड़ाव के बल पर कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया। 26 जुलाई 1970 को जन्मे सुदिव्य सोनू का 6 सितंबर 2026 को 56 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके अचानक निधन से झारखंड की राजनीति में गहरा खालीपन पैदा हुआ।
1989 में हुई शिबू सोरेन से मुलाकात ने बदली दिशा
सुदिव्य सोनू के राजनीतिक जीवन की शुरुआत झारखंड आंदोलन से जुड़ाव के साथ हुई। उत्तर बिहार में पढ़ाई के दौरान अलग झारखंड राज्य को लेकर होने वाली चर्चाओं और तानों ने उनके मन में इस आंदोलन के प्रति गहरी रुचि पैदा की।
वर्ष 1989 में डीएसपी बरनाड कीचिया के आवास पर उनकी मुलाकात दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुई। शिबू सोरेन ने उन्हें समझाया कि पढ़े-लिखे युवाओं के आंदोलन से जुड़ने पर ही झारखंड आंदोलन का विस्तार होगा। यह मुलाकात सुदिव्य सोनू के लिए निर्णायक साबित हुई और उन्होंने अलग राज्य की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी।
परिवार के विरोध के बावजूद नहीं छोड़ा संघर्ष
राजनीति में आने के बाद सुदिव्य सोनू को अपने परिवार की नाराजगी का सामना करना पड़ा। उनके पिता चाहते थे कि बेटा अपना भविष्य सुरक्षित करे, लेकिन सोनू ने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा।
2004-05 के आसपास शिबू सोरेन उनके गिरिडीह स्थित घर पहुंचे। उस दौरान उन्होंने सुदिव्य के पिता का पैर छूकर कहा था कि वह उनके बेटे को मांगकर ले जा रहे हैं और उसे कुछ बनाकर देंगे। इस घटना ने परिवार और सुदिव्य सोनू के बीच राजनीतिक जीवन को लेकर बनी दूरी को काफी हद तक खत्म कर दिया।
कार्यकर्ता से बने ‘सोनू भैया’
सुदिव्य सोनू ने किसी बड़े राजनीतिक पद से शुरुआत नहीं की थी। उन्होंने गिरिडीह में संगठन के लिए लंबे समय तक काम किया और झामुमो के जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण वे धीरे-धीरे ‘सोनू भैया’ के नाम से लोकप्रिय हो गये।
ग्रामीण अपनी जमीन की समस्या लेकर पहुंचते, छात्र अपनी परेशानियां बताते और जरूरतमंद लोग मदद की उम्मीद लेकर उनके पास आते। वे समस्याएं सुनने के साथ उनके समाधान की कोशिश भी करते थे।
संघर्ष और जेल यात्रा भी रही राजनीतिक सफर का हिस्सा
सुदिव्य सोनू के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन का उल्लेख उनकी पुस्तक ‘मेरी जेलयात्रा’ में भी मिलता है। जल, जंगल और जमीन तथा आदिवासी-मूलवासी अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर उनके संघर्ष ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार दिया।
2019 में पहली बार बने विधायक
वर्ष 2019 में सुदिव्य सोनू पहली बार गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गये। वर्ष 2024 में उन्होंने दोबारा जीत दर्ज की। विधायक बनने के बाद भी गिरिडीह से उनका जुड़ाव कमजोर नहीं हुआ।
वे अपने विधानसभा क्षेत्र में सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय रहे। उसरी फॉल, खंडोली और पारसनाथ जैसे पर्यटन स्थलों को विकसित कर गिरिडीह में पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाने की उनकी सोच थी।
विधानसभा में तथ्यों के साथ रखते थे अपनी बात
सदन में सुदिव्य सोनू की पहचान तैयारी के साथ अपनी बात रखने वाले विधायक के रूप में बनी। कानून, बजट और नीतिगत मामलों पर उनकी पकड़ का उल्लेख किया जाता रहा। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, खनिज रॉयल्टी और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध जैसे विषयों पर उन्होंने सदन में अपनी बात रखी।
मंत्री बने तो शिक्षा और पर्यटन को दी प्राथमिकता
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कैबिनेट में शामिल होने के बाद सुदिव्य सोनू को पर्यटन, नगर विकास, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और खेल जैसे विभागों की जिम्मेदारी मिली।
शिक्षा के क्षेत्र में गिरिडीह और आसपास के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर न रहना पड़े, इसके लिए सर जेसी बोस विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। पर्यटन और खेल के क्षेत्र में भी स्थानीय युवाओं को अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया।
मंत्री बनने के बाद भी जनता से दूरी नहीं बनी
सत्ता में आने के बाद भी सुदिव्य सोनू का आम लोगों से जुड़ाव बना रहा। उनके आवास और कार्यालय में ग्रामीणों, मजदूरों, छात्रों और आम लोगों का आना-जाना जारी रहा।
वे लोगों की समस्याएं सुनते और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों से स्वयं बात करते थे। ग्रामीणों से ठेठ खोरठा में संवाद करने के कारण उनके और आम लोगों के बीच अपनापन बना रहता था। इसी वजह से ‘सोनू भैया’ की पहचान राजनीतिक पद से आगे बढ़कर लोगों के बीच बनी रही।
राजनीतिक संकट में हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगी
झारखंड की राजनीति के मुश्किल दौर में सुदिव्य सोनू की भूमिका और महत्वपूर्ण हुई। जब हेमंत सोरेन जेल में थे और झामुमो के सामने संगठन और सरकार से जुड़ी कई चुनौतियां थीं, तब सुदिव्य सोनू पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में शामिल रहे।
2024 में कल्पना सोरेन की सक्रिय राजनीति की शुरुआत और गांडेय विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी उन्होंने संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभायीं। चुनाव अभियान की रणनीति, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका रही।
आखिरी दिनों तक जनता से जुड़े रहे
सुदिव्य सोनू निधन से कुछ दिन पहले तक सक्रिय रहे। सोशल मीडिया के जरिए जनता से संवाद और सरकार से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते रहे। 6 सितंबर 2026 को अचानक उनके निधन की खबर सामने आयी, जिसके बाद राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गयी।
सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक सफर एक सामान्य कार्यकर्ता से शुरू होकर विधायक और फिर कैबिनेट मंत्री तक पहुंचा। गुरु शिबू सोरेन के मार्गदर्शन, झारखंड आंदोलन की चेतना, संगठन के प्रति समर्पण और जनता से सीधे जुड़ाव ने उनकी अलग पहचान बनायी।
गिरिडीह में ‘सोनू भैया’ के नाम से लोकप्रिय सुदिव्य सोनू अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संघर्ष, सादगी और राजनीतिक यात्रा की कहानी झारखंड की सियासत में लंबे समय तक याद की जाती रहेगी।

