HomeBreaking Newsतीन दशक पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सेवानिवृत्त कर्मी...

तीन दशक पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सेवानिवृत्त कर्मी से अतिरिक्त वेतन की वसूली अवैध

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों से दशकों पुराने कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं की जा सकती है, खासकर तब जब उनके खिलाफ किसी भी वैध और स्थापित प्रक्रिया के तहत कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज न किया गया हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि मात्र फर्जीवाड़े का अस्पष्ट आरोप लगाकर किसी भी कर्मचारी के वेतन या अन्य वैध संपत्तिक अधिकारों से उसे वंचित नहीं किया जा सकता है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

मामले के अनुसार, तारकेश्वर प्रसाद सिंह की नियुक्ति 13 जनवरी 1975 को ट्रेसर के पद पर हुई थी। इसके बाद फरवरी 1980 में उन्हें अस्थायी रूप से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर प्रोन्नति दी गई थी। इस प्रोन्नति को लेकर बाद में विवाद उठा और वर्ष 1986 में उन्हें वापस ट्रेसर पद पर पदावनत कर दिया गया। हालांकि, वर्ष 1987 में पूर्व के आदेश को वापस लेते हुए उन्हें दोबारा जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर बहाल कर स्थायी कर दिया गया तथा उन्हें बाद में एसीपी का लाभ भी प्रदान किया गया।

सेवानिवृत्ति से ठीक पहले वर्ष 2011 में उन्हें निलंबित कर 14 आरोप पत्र थमाए गए थे, जिसमें अवैध तरीके से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद धारण करने और उसका वेतन उठाने का आरोप भी शामिल था। इसके बाद हुई विभागीय जांच में कुछ आरोप सही पाए गए, जिसके तहत उन्हें निंदा और दो वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा दी गई थी। इसके बाद तारकेश्वर प्रसाद सिंह 31 जुलाई 2013 को सेवानिवृत्ति हो गए। हालांकि, सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2013 और 2014 में उनके खिलाफ जामताड़ा और दुमका थानों में एफआईआर दर्ज कराई गई और वर्ष 2016 में विभाग ने 1986 के पुराने आदेश को पुनर्जीवित करते हुए उनकी सभी प्रोन्नतियां रद्द कर दीं तथा ट्रेसर पद के वेतन से अधिक ली गई राशि की वसूली का फरमान जारी कर दिया।

खंडपीठ ने अपने फैसले में पाया कि जिस अतिरिक्त वेतन की वसूली का आदेश 21 अप्रैल 2016 को दिया गया था, वह राशि असल में वर्ष 1980 से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के रूप में मिलने वाले वेतन से जुड़ी थी। यानी विभाग ने कथित अतिरिक्त भुगतान के पूरे 36 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद वसूली का आदेश निकाला था। कोर्ट ने झारखंड पेंशन नियम, 2000 के नियम 43(बी) का हवाला देते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी कर्मी से राशि वसूलने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया और तय समय-सीमा का पालन करना अनिवार्य है। इस मामले में कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद इस नियम के तहत कोई वैधानिक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी और न ही विभागीय जांच में यह साबित हुआ था कि वह अवैध रूप से उक्त पद पर काबिज थे।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि चूंकि जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद अवैध रूप से रखने के उसी आरोप पर पूर्व में विभागीय जांच हो चुकी थी और कर्मचारी को सजा भी दी जा चुकी थी, इसलिए एक ही आरोप के आधार पर दोबारा दंडात्मक कार्रवाई करना डबल जियोपर्डी के सिद्धांत के खिलाफ होगा। इन तमाम बिंदुओं के आधार पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें वसूली पर रोक लगाई गई थी और सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया गया था। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कृत्य के आरोप में एफआईआर दर्ज करने से कानून नहीं रोकता है, इसलिए निचली अदालतों में लंबित मामलों को कानून के अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments