रांची: मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने इस घटना को लेकर मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। झामुमो विधायक और पूर्व मंत्री डॉ. लुईस मरांडी ने कहा कि सरकार को बच्चों की मौत के वास्तविक कारण और मृतकों की सही संख्या जनता के सामने रखनी चाहिए।
डॉ. लुईस मरांडी ने कहा कि मीडिया में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार बालाघाट में बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हुई है। उनका आरोप है कि यदि बीमारी या संक्रमण की शुरुआती स्थिति में ही सरकार ने गंभीरता दिखाई होती और प्रभावित बच्चों का समय पर इलाज शुरू कराया जाता, तो कई जानें बचाई जा सकती थीं।
मौतों के आंकड़ों को लेकर सरकार पर सवाल
झामुमो विधायक ने आरोप लगाया कि बालाघाट में बच्चों की मौत के आंकड़े शुरुआत से ही स्पष्ट नहीं रहे। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर मृत बच्चों की संख्या अलग-अलग बताई गई। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह वास्तविक आंकड़ा सार्वजनिक करे।
उन्होंने मांग की कि सरकार यह बताए कि अब तक कितने बच्चों की मौत हुई है, मौत की वजह क्या थी, कितने बच्चों में संक्रमण की पुष्टि हुई और प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की ओर से क्या कदम उठाए गए।
‘आदिवासी बच्चों की जान इतनी सस्ती नहीं’
डॉ. लुईस मरांडी ने कहा कि आदिवासी बच्चों की जान को महज आंकड़ों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आदिवासी बच्चों को भी बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है।
उन्होंने भाजपा के आदिवासी हितैषी होने के दावे पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बालाघाट की घटना सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को सामने लाती है।
जल-जंगल-जमीन और खनन का मुद्दा भी उठा
झामुमो ने बालाघाट की घटना को आदिवासी समाज के व्यापक अधिकारों से भी जोड़ा। डॉ. मरांडी ने कहा कि आदिवासी समुदाय लंबे समय से जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है।
उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में खनन और उससे होने वाले विस्थापन का मुद्दा भी उठाया। उनका आरोप है कि खनिज संपदा वाले आदिवासी इलाकों में स्थानीय समुदायों के हितों की तुलना में कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।
संविधान की 5वीं अनुसूची का दिया हवाला
डॉ. लुईस मरांडी ने संविधान की 5वीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान हैं। इसके बावजूद आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बच्चों की मौत जैसी घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब संविधान आदिवासी समुदायों को विशेष संरक्षण देता है, तो उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कब मिलेंगी और इलाज के अभाव में बच्चों की मौत का सिलसिला कब रुकेगा।
सुदीप गुड़िया ने मांगा इस्तीफा और मुआवजा
तोरपा से झामुमो विधायक सुदीप गुड़िया ने भी बालाघाट मामले को लेकर भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की नीतियों में आदिवासी और कमजोर वर्गों के हितों की अनदेखी की जाती रही है।
सुदीप गुड़िया ने घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफे की मांग की। उन्होंने मृतक बच्चों के परिवारों को 25-25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग भी की।
लोकभवन के सामने आदिवासी कांग्रेस का प्रदर्शन
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के विरोध में झारखंड आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने रांची के लोकभवन के समक्ष धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
आदिवासी कांग्रेस ने मृतक बच्चों के परिजनों को कम से कम एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की। नेताओं ने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मध्य प्रदेश में भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार होने के बावजूद आदिवासी बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी ऐसी घटना सामने आना गंभीर चिंता का विषय है। कांग्रेस ने सरकार से पूरे मामले की पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा देने की मांग की।

