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26 साल से जहां मां कर रही सफाई का काम, अब उसी संस्थान से बेटी ने हासिल की PhD की उपाधि

रांची: मां ने जिस संस्थान में 26 वर्षों तक सफाईकर्मी के रूप में काम कर परिवार का भविष्य संवारने के लिए संघर्ष किया, उसी संस्थान से बेटी ने इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल कर परिवार का नाम रोशन किया है। रांची के तुरुप गांव की आरती कुमारी की यह उपलब्धि मेहनत, हौसले और मां के त्याग की प्रेरक कहानी है। उनकी मां रानू देवी पिछले 26 वर्षों से बीआईटी मेसरा में सफाईकर्मी के रूप में कार्यरत हैं। अब आरती ने इसी संस्थान से पीएचडी की उपाधि हासिल की है।

आरती की इस सफलता से परिवार के साथ उनके गांव में भी खुशी का माहौल है। बताया जाता है कि वह तुरुप गांव की पहली महिला हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग में पीएचडी हासिल की है। बीआईटी मेसरा में आयोजित दीक्षांत समारोह में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई।

मां के संघर्ष और बेटी की मेहनत ने लिखी सफलता की कहानी

आरती की उपलब्धि केवल एक शैक्षणिक डिग्री तक सीमित नहीं है। इसके पीछे परिवार की आर्थिक चुनौतियां, मां का संघर्ष, पढ़ाई के प्रति उनकी लगन और शिक्षकों का सहयोग शामिल है। सीमित संसाधनों के बीच भी आरती ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह मुकाम हासिल किया।

ईटीवी भारत से बातचीत में आरती ने बताया कि इस सफर में उनकी मां और परिवार ने लगातार उनका हौसला बढ़ाया। बीआईटी मेसरा के शिक्षकों और संस्थान के प्रबंधन से मिले सहयोग ने भी उन्हें आगे बढ़ने में मदद की।

आरती के पति रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि अब उनकी इच्छा परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने और घर-परिवार की जिम्मेदारियों में अपना योगदान देने की है।

मां बोलीं- मैंने रास्ता दिखाया, मंजिल बेटी ने मेहनत से पाई

बेटी की सफलता रानू देवी के वर्षों के संघर्ष के बाद मिली बड़ी खुशी है। उन्होंने ईटीवी भारत से बातचीत में कहा कि उन्होंने अपनी बेटी को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया और हर मुश्किल परिस्थिति में उसका हौसला बनाए रखा। लेकिन इस मुकाम तक आरती अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर पहुंची है।

रानू देवी ने उन सभी लोगों के प्रति आभार जताया, जिन्होंने आरती की पढ़ाई और शोध के दौरान उसका साथ दिया। उनकी बेटी की सफलता उस संघर्ष का परिणाम है, जिसमें मां ने अपनी परिस्थितियों से लड़ते हुए बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी।

सप्ताह में 400 रुपये से शुरू हुआ था संघर्ष

रानू देवी ने जब बीआईटी मेसरा में काम शुरू किया था, तब उन्हें एक सप्ताह के केवल 400 रुपये मिलते थे। पति के निधन के बाद तीन बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए मेहनत की।

समय के साथ उनकी आय बढ़ी और वर्तमान में उन्हें 15 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। इस दौरान परिवार की आर्थिक चुनौतियां बनी रहीं, लेकिन रानू देवी ने बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयास जारी रखा।

बीटेक से पीएचडी तक का सफर

आरती तीन भाई-बहनों में मझली हैं। आर्थिक परेशानियों के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने आरटीसी से बीटेक और बीआईटी मेसरा से एमटेक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद शोध कार्य करते हुए इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल की।

उच्च शिक्षा के दौरान बीआईटी मेसरा और सरकार से मिली छात्रवृत्ति ने भी उनकी मदद की। शिक्षकों के मार्गदर्शन और परिवार के सहयोग से आरती ने अपने शैक्षणिक सफर को आगे बढ़ाया।

गांव की बेटियों के लिए बनीं प्रेरणा

आरती कुमारी की उपलब्धि बताती है कि आर्थिक कठिनाइयां शिक्षा की राह में चुनौती जरूर बन सकती हैं, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर मेहनत और सही सहयोग से आगे बढ़ने के रास्ते खुल सकते हैं।

एक ओर उनकी मां ने वर्षों तक मेहनत कर परिवार को संभाला, तो दूसरी ओर आरती ने पढ़ाई और शोध के जरिए अपनी पहचान बनाई। अब उनकी पीएचडी की उपलब्धि परिवार के साथ तुरुप गांव के लिए भी गर्व का विषय है। मां के संघर्ष और बेटी की मेहनत से बनी यह कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।

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