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जंगल की पगडंडी से अंतरराष्ट्रीय गोल्ड तक, महिमा उरांव की कहानी; मेडल से भरा घर, फिर भी सरकारी मदद का इंतजार

रांची: गले में गोल्ड मेडल, हाथों में ट्रॉफियां और तन पर भारतीय जर्सी… यह किसी अंतरराष्ट्रीय चैंपियन की तस्वीर लगती है। लेकिन झारखंड की अंतरराष्ट्रीय पैरा थ्रोबॉल खिलाड़ी महिमा उरांव की जिंदगी का दूसरा पहलू बेहद संघर्षपूर्ण है। जिस खिलाड़ी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और झारखंड का नाम रोशन किया, आज भी वह जर्जर घर, सीमित संसाधनों और सरकारी सहायता के इंतजार के बीच अपनी जिंदगी और खेल दोनों को आगे बढ़ा रही हैं।

रांची से करीब 20 किलोमीटर दूर सौदाग बगीचा टोली गांव में महिमा का घर उनकी उपलब्धियों और मौजूदा हालात के बीच का बड़ा विरोधाभास दिखाता है। एक तरफ देश के लिए जीते गए मेडल और ट्रॉफियां हैं, तो दूसरी तरफ बारिश में टपकती छत और कमजोर दीवारों वाला मकान।

जंगल की पगडंडी से स्टेडियम तक रोज का सफर

महिमा का खेल तक पहुंचने का रास्ता भी आसान नहीं है। अभ्यास के लिए उन्हें हर दिन करीब पांच किलोमीटर जंगल की पगडंडी पर पैदल चलना पड़ता है।

गांव से निकलकर वह कच्चे और उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए रिंग रोड तक पहुंचती हैं। इसके बाद ऑटो का इंतजार करती हैं और फिर मोराबादी स्थित स्टेडियम पहुंचकर घंटों अभ्यास करती हैं।

यानी उनका रोज का सफर गांव से जंगल, जंगल से रिंग रोड और फिर ऑटो के जरिए स्टेडियम तक का है।

जिस घर में मेडल, उसी की छत से टपकता है पानी

महिमा का घर उनकी खेल उपलब्धियों के बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करता है। मिट्टी और ईंटों से बने जर्जर मकान की दीवारें कमजोर हैं और बारिश के दौरान छत से पानी टपकता है।

जिस कमरे में महिमा सोती हैं, वहीं उनके मेडल, ट्रॉफियां और दूसरे सामान रखे हैं। घर में जगह की इतनी कमी है कि इसी परिसर में लकड़ी के चूल्हे पर खाना भी बनाया जाता है।

महिमा के मुताबिक, उन्होंने कई बार आवास योजना के लिए आवेदन किया, लेकिन अब तक उन्हें पक्का घर नहीं मिल सका। परिवार को उज्ज्वला योजना का लाभ भी नहीं मिला है। ऐसे में आज भी खाना लकड़ी के चूल्हे पर ही बनता है।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से मदद के आश्वासन मिलने की बात भी सामने आई है, लेकिन महिमा का कहना है कि अभी तक इसका ठोस लाभ उन्हें नहीं मिल पाया है।

राष्ट्रीय स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन

महिमा सिटिंग पैरा वॉलीबॉल और सिटिंग पैरा थ्रोबॉल से जुड़ी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।

उन्होंने 7-8 अप्रैल 2023 को तमिलनाडु में आयोजित नेशनल फेडरेशन कप सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में रनर-अप का खिताब हासिल किया।

इसके बाद 21-23 मार्च 2025 को इरोड, तमिलनाडु में आयोजित 13वीं नेशनल पैरा वॉलीबॉल चैंपियनशिप और 25-28 फरवरी 2026 को मेरठ में आयोजित 14वीं नेशनल पैरा वॉलीबॉल चैंपियनशिप में भी वह रनर-अप रहीं।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए जीते गोल्ड

महिमा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विभिन्न पैरा थ्रोबॉल प्रतियोगिताओं में वह विजेता भारतीय टीम का हिस्सा रही हैं।

उनकी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों में शामिल हैं:

  • नेपाल-भारत पैरा थ्रोबॉल मैच सीरीज — फरवरी 2023
  • मलेशिया-भारत पैरा थ्रोबॉल मैच सीरीज — जुलाई 2023
  • भूटान-भारत पैरा थ्रोबॉल मैच सीरीज — नवंबर 2023
  • भारत-नेपाल पैरा थ्रोबॉल मैच सीरीज — मार्च 2024
  • भारत-थाईलैंड पैरा थ्रोबॉल मैच सीरीज — जून 2024
  • प्रथम एशियन पैरा थ्रोबॉल चैंपियनशिप, भारत-कंबोडिया — मार्च 2025

इन प्रतियोगिताओं में महिमा विजेता भारतीय टीम का हिस्सा रहीं और गोल्ड मेडल हासिल किया।

विदेश में खेलने के लिए कई बार लेना पड़ा कर्ज

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद महिमा के सामने आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। विदेशों में होने वाली प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए कई बार उन्हें टिकट और यात्रा खर्च जुटाने के लिए उधार लेना पड़ा।

महिमा के मुताबिक, शुरुआती दौर में उन्हें एक बार कैश अवार्ड मिला था। इसके बाद आर्थिक सहायता के लिए कई आवेदन किए गए, लेकिन उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिल सकी।

आज भी वह सरकारी कैश अवार्ड और आर्थिक सहयोग की उम्मीद कर रही हैं।

पिता बीमार, मां करती हैं मजदूरी

महिमा के परिवार की आर्थिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है। उनके पिता लंबे समय से बीमार हैं, जबकि मां खेतों में मजदूरी करती हैं। परिवार की जिम्मेदारियों में महिमा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अपना खर्च चलाने और परिवार की मदद के लिए वह एक निजी स्कूल में बच्चों को खेल का प्रशिक्षण देती हैं। इसके अलावा सिलाई मशीन के जरिए भी आमदनी करने की कोशिश करती हैं।

मेडल बहुत, लेकिन सुरक्षित रखने की जगह नहीं

महिमा की उपलब्धियों का अंदाजा उनके घर में रखी ट्रॉफियों और मेडल से लगाया जा सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें सुरक्षित रखने के लिए घर में एक अच्छी अलमारी तक नहीं है।

कई मेडल और ट्रॉफियां पुराने कपड़ों में लपेटकर रखी गई हैं। जर्जर मकान में जगह और सुरक्षा दोनों की कमी है।

भाई ने खेल से दूरी बना ली

महिमा के छोटे भाई का बयान परिवार के संघर्ष की एक और तस्वीर सामने रखता है। वह खुद फुटबॉल खेलता था और अच्छा खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन बहन के संघर्ष को देखकर उसने खेल छोड़ दिया।

उसका कहना है कि अगर देश के लिए गोल्ड जीतने वाले खिलाड़ियों को भी सम्मान और जरूरी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े, तो इससे युवाओं का खेल के प्रति उत्साह प्रभावित हो सकता है।

उप खेल निदेशक ने लिया मामले का संज्ञान

महिमा की स्थिति की जानकारी मिलने के बाद उप खेल निदेशक निर्भय कुमार ने मामले को देखने का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें महिमा की परिस्थितियों के बारे में जानकारी दी गई है और वह व्यक्तिगत स्तर पर मामले को देखेंगे।

उन्होंने महिमा के लिए संभव सहयोग की दिशा में पहल करने की बात कही है।

गोल्ड की चमक और घर की बदहाली के बीच बड़ा सवाल

महिमा उरांव की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस सवाल को भी सामने लाती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने वाली खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाओं और सरकारी सहायता के लिए कितना इंतजार करना पड़ता है।

एक ओर अंतरराष्ट्रीय मैदान पर भारत का तिरंगा और गोल्ड मेडल है, तो दूसरी ओर गांव से स्टेडियम तक की जंगल की पगडंडी और बारिश में टपकता घर।

महिमा आज भी अभ्यास कर रही हैं, प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं और देश के लिए और पदक जीतने का सपना देख रही हैं। अब उनकी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि सरकारी स्तर पर मिले आश्वासन जल्द वास्तविक मदद में बदलें।

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