मुंबई। महाराष्ट्र में मराठी और हिंदी भाषा को लेकर चल रही बहस एक बार फिर राजनीतिक विवाद में बदल गई है। नवी मुंबई के वाशी में आयोजित छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन और हिंदी दिवस समारोह के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा महाराष्ट्र को देश का सबसे बड़ा बहुभाषी राज्य बताए जाने के बाद विपक्षी दलों और मराठी भाषा संगठनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि महाराष्ट्र में मराठी के अलावा कोंकणी, गुजराती, हिंदी, सिंधी, कन्नड़ और वारली जैसी कई भाषाएं बोली जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया है। शाह के अनुसार, देश में महाराष्ट्र जैसा दूसरा बहुभाषी क्षेत्र नहीं है। उनके इस बयान के बाद राज्य में भाषाई पहचान को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने अमित शाह के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि महाराष्ट्र की पहचान एक मराठी भाषी राज्य के रूप में है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की धरती पर आकर राज्य को बहुभाषी बताना उचित नहीं है। राउत ने दावा किया कि मराठी को राज्य में सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिस तरह दूसरे राज्यों में स्थानीय भाषाओं को महत्व दिया जाता है।
राउत ने अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर दूसरे राज्यों की भाषाई पहचान को लेकर इसी तरह की बात कही जाए तो वहां भी प्रतिक्रिया सामने आएगी। उन्होंने शाह को चुनौती देते हुए कहा कि चेन्नई, कोलकाता, गुजरात या कर्नाटक में जाकर वहां के राज्यों को इसी तरह बहुभाषी बताकर देखें।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने भी अमित शाह की टिप्पणी का विरोध किया। मनसे प्रवक्ता गजानन काले ने कहा कि महाराष्ट्र का गठन एक मराठी भाषी राज्य के रूप में हुआ था। उन्होंने मराठी भाषा की पहचान और सम्मान से जुड़े मुद्दे पर पार्टी के रुख को स्पष्ट करते हुए अमित शाह को संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का इतिहास भेजने की बात कही।
इसी बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बयान ने भी भाषा विवाद को नई दिशा दे दी। फडणवीस ने कहा कि मराठी उनकी मां है, जबकि अन्य भाषाएं मौसी के समान हैं। उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं का सम्मान करने के साथ अपनी भाषा का सम्मान करना भी जरूरी है। उनके इस बयान पर ठाकरे गुट के एमएलसी अंबादास दानवे ने कहावत का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री पर कटाक्ष किया।
वहीं, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विवाद को मराठी बनाम हिंदी के रूप में देखने के बजाय सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान की अपील की। उन्होंने हिंदी को दूसरी भाषाओं का प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि एक-दूसरे को जोड़ने वाली भाषा बताया। शिंदे ने कहा कि मराठी और हिंदी दोनों देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं और विज्ञान, प्रशासन तथा न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
मराठी एकीकरण समिति ने भी वाशी में आयोजित हिंदी केंद्रित सम्मेलन को लेकर विरोध जताया था। समिति के अध्यक्ष गोवर्धन देशमुख ने आरोप लगाया कि हिंदी को मराठी के साथ सह-आधिकारिक भाषा के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि मराठी की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है और इसके साथ किसी तरह का भाषाई अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि महाराष्ट्र के गठन के दशकों बाद भी राज्य में भाषा भवन नहीं है।
महाराष्ट्र में भाषा को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि पहले से तैयार होती रही है। इसी वर्ष राज्य की त्रि-भाषा नीति को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा हुई थी। फरवरी में त्रि-भाषा नीति समिति की रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया था कि मराठी भाषा अनिवार्य रहेगी।
मई में महाराष्ट्र सरकार द्वारा राजपत्रित और अराजपत्रित कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा की परीक्षा आयोजित करने के फैसले पर भी विवाद हुआ था। मनसे और मराठी भाषा से जुड़े संगठनों ने इसका विरोध किया था। विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने हिंदी परीक्षा को स्थगित कर दिया था और तत्कालीन मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने कहा था कि परीक्षा की आवश्यकता का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा।
ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने के फैसले के बाद भी यह मुद्दा सुर्खियों में रहा। सरकार ने चालकों को मराठी सीखने के लिए एक वर्ष की छूट अवधि देने की बात कही थी। इसके बाद मुंबई महानगर क्षेत्र में मराठी प्रशिक्षण केंद्रों, ड्राइवरों के विरोध और सरकार की भाषा नीति को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई।
इसी माहौल के बीच 14 सितंबर को गणेशोत्सव के दौरान नवी मुंबई के वाशी में छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में केंद्र सरकार के अधिकारी, राजभाषा कर्मचारी, साहित्यकार, शिक्षाविद और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हुए।
कुछ मराठी संगठनों ने गणेशोत्सव के दौरान महाराष्ट्र में हिंदी केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किए जाने पर भी आपत्ति जताई थी। मराठी एकीकरण समिति ने सम्मेलन का विरोध करते हुए इसकी अनुमति नहीं देने की मांग की थी। अब अमित शाह के महाराष्ट्र को बहुभाषी राज्य बताए जाने के बयान ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

