खनिज संपन्न राज्य में कैंसर का बढ़ता खतरा चिंताजनक, 15 वर्ष से अधिक उम्र के 38% लोग करते हैं तंबाकू का सेवन; राज्य में जल्द बनेगी कैंसर रजिस्ट्री
रांची। खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड में कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। राज्य में हर साल करीब 35 से 40 हजार नए कैंसर के मामले सामने आने का अनुमान है। इनमें 40 से 45 प्रतिशत मामले ओरल यानी मुंह के कैंसर से जुड़े हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ओरल कैंसर के करीब 80 प्रतिशत मामलों की वजह तंबाकू का सेवन बताया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बीमारी की देर से पहचान, जागरूकता की कमी और तंबाकू के बढ़ते इस्तेमाल ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।
राज्य में अपना कैंसर रजिस्टर नहीं होने के कारण मरीजों की वास्तविक संख्या का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। टाटा कैंसर फाउंडेशन, रिम्स, हजारीबाग डेंटल कॉलेज हॉस्पिटल और आईसीएमआर-एनसीआरपी के राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर कैंसर की स्थिति का आकलन किया जाता है। एनसीडी कंट्रोल प्रोग्राम के स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. रवि राज के अनुसार, झारखंड में प्रति एक लाख आबादी पर करीब 70 लोग किसी न किसी प्रकार के कैंसर से पीड़ित हैं।
15 वर्ष से अधिक उम्र के 38 प्रतिशत लोग तंबाकू के आदी
झारखंड में कैंसर का एक बड़ा कारण तंबाकू सेवन है। स्टेट नॉन कम्युनिकेबल डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के नोडल अधिकारी के अनुसार, राज्य में 15 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 38 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। ओरल कैंसर के मरीजों में लगभग 80 प्रतिशत मामलों का संबंध तंबाकू सेवन से है।
खैनी, गुटखा, पान मसाला और बीड़ी का इस्तेमाल ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आम है। विशेषज्ञों के अनुसार, तंबाकू के साथ शराब का सेवन करने से मुंह और गले के कैंसर का खतरा और बढ़ जाता है।
ओरल कैंसर के बाद ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर के मामले
डॉ. रवि राज के मुताबिक, झारखंड में सबसे ज्यादा ओरल कैंसर के मामले सामने आते हैं। इसके बाद स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और फेफड़ों के कैंसर का स्थान है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में पुरुषों में लिप्स और ओरल कैंसर के करीब छह हजार मामले सामने आने का अनुमान है।
रांची कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर जैसे संस्थानों में हेड एंड नेक कैंसर के मामलों में भी पिछले कुछ वर्षों में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
ब्लड कैंसर के बढ़ते मामले भी चिंता का विषय
झारखंड में ब्लड कैंसर के मामले भी चिंता बढ़ा रहे हैं। प्रख्यात हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक रंजन के अनुसार, रांची सदर अस्पताल में ही हर महीने ब्लड कैंसर के 10 से 15 नए मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।
बच्चों में एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL), युवाओं में एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया (AML) और बुजुर्गों में क्रॉनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया (CLL) तथा मल्टीपल मायलोमा के मामले देखने को मिल रहे हैं।
डॉ. रंजन के मुताबिक, झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्य में भारी धातुओं और कीटनाशकों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। माइका, कोयला और यूरेनियम खनन क्षेत्रों में आर्सेनिक और लेड जैसी धातुओं के संपर्क तथा खेती में कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत है।
तीसरे और चौथे स्टेज में अस्पताल पहुंच रहे मरीज
कैंसर के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की देर से पहचान होना है। रांची के ओंको सर्जन डॉ. अजय विद्यार्थी के अनुसार, झारखंड में पुरुषों में सबसे ज्यादा मुंह और उसके बाद फेफड़ों के कैंसर के मरीज मिलते हैं। वहीं महिलाओं में स्तन और सर्वाइकल कैंसर के मामले अधिक हैं।
उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में मरीज तीसरे और चौथे स्टेज में अस्पताल पहुंचते हैं। शुरुआती अवस्था में मरीजों का अस्पताल पहुंचना बेहद कम है। देर से इलाज शुरू होने के कारण उपचार जटिल हो जाता है और खर्च भी बढ़ता है। जागरूकता की कमी, शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच इसके प्रमुख कारण हैं।
राज्य में जल्द बनेगा कैंसर रजिस्ट्री पोर्टल
झारखंड में कैंसर मरीजों का सटीक आंकड़ा उपलब्ध कराने के लिए राज्य स्तर पर कैंसर रजिस्ट्री पोर्टल तैयार करने की पहल की जा रही है। एनसीडी के स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. रवि राज के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है।
प्रस्तावित पोर्टल पर सरकारी और निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम तथा पैथोलॉजी सेंटरों को कैंसर मरीजों की जानकारी अपलोड करनी होगी। इससे राज्य में कैंसर के वास्तविक मामलों, बीमारी के प्रकार और उसके प्रसार का बेहतर आकलन किया जा सकेगा। साथ ही स्वास्थ्य योजनाओं और रोकथाम कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
तंबाकू, शराब और प्रदूषण कैंसर के प्रमुख जोखिम कारक
विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। तंबाकू और शराब के अलावा भारी धातुओं का संपर्क, वायु एवं जल प्रदूषण, कीटनाशकों का अनियंत्रित इस्तेमाल, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी भी जोखिम बढ़ा सकती है।
महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का संबंध ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) से है। वहीं हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण से लिवर कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
वैक्सीन और नियमित जांच से कम हो सकता है खतरा
कैंसर से बचाव के लिए विशेषज्ञ तंबाकू के सभी रूपों से दूरी बनाने, शराब का सेवन छोड़ने, संतुलित भोजन करने और नियमित व्यायाम की सलाह देते हैं। खनन क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना और कीटनाशकों का सुरक्षित इस्तेमाल भी जरूरी है।
एचपीवी वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचाव में मदद करती है, जबकि हेपेटाइटिस बी वैक्सीन लिवर कैंसर के जोखिम को कम करने में प्रभावी है। इसके अलावा मुंह, स्तन और सर्वाइकल कैंसर की समय पर स्क्रीनिंग जरूरी है।
राष्ट्रीय एनसीडी कार्यक्रम के तहत 30 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की मुंह, स्तन और सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग पर जोर दिया जाता है। तंबाकू सेवन करने वालों और परिवार में कैंसर का इतिहास रखने वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह से समय रहते जांच करानी चाहिए।
मुंह में घाव और असामान्य गांठ को न करें नजरअंदाज
विशेषज्ञों के मुताबिक, मुंह में लंबे समय तक घाव रहना, असामान्य गांठ, बिना कारण वजन घटना, लगातार खांसी और असामान्य रक्तस्राव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कोई लक्षण दो से तीन सप्ताह तक बना रहता है तो चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। हालांकि, ऐसे लक्षण हमेशा कैंसर के संकेत नहीं होते।
झारखंड में कैंसर के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण के लिए जागरूकता, नियमित स्क्रीनिंग, समय पर इलाज और पर्यावरण संरक्षण पर एक साथ काम करने की जरूरत है। राज्य में कैंसर रजिस्ट्री पोर्टल शुरू होने से इस दिशा में बेहतर योजना बनाने का रास्ता भी खुल सकता है।

