नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत की ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को केवल वैकल्पिक तेल आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहने के बजाय मल्टी-रूट एनर्जी स्ट्रैटेजी तैयार करनी चाहिए। इसके तहत अलग-अलग देशों से कच्चे तेल और गैस की खरीद, रणनीतिक भंडार बढ़ाने, वैकल्पिक बंदरगाहों और समुद्री मार्गों को विकसित करने तथा रिफाइनरियों की क्षमता में लचीलापन बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
पश्चिम एशिया में हालिया तनाव ने खास तौर पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर-बाब अल-मंदेब क्षेत्र से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति की संवेदनशीलता को उजागर किया है। भारत की बड़ी मात्रा में कच्चे तेल, LNG और LPG की जरूरत आयात से पूरी होती है, इसलिए क्षेत्र में लंबे समय तक किसी भी तरह की आपूर्ति बाधा का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता कितनी है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत की कुल प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों में आयात की हिस्सेदारी करीब 42 प्रतिशत थी। वहीं कच्चे तेल की खपत के लिए आयात पर निर्भरता लगभग 89 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस के लिए करीब 49 प्रतिशत और कोयले के लिए लगभग 18 प्रतिशत थी।
विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे हालात में चुनौती केवल नए आपूर्तिकर्ता तलाशने की नहीं है। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संकट की स्थिति में ऊर्जा को देश तक पहुंचाने के लिए एक से अधिक रास्ते और लॉजिस्टिक विकल्प मौजूद रहें।
2025 में 1.8 अरब बैरल कच्चा तेल आयात
रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने वर्ष 2025 में करीब 1.8 अरब बैरल कच्चा तेल आयात किया। इसमें लगभग 48 प्रतिशत आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र से हुई। रूस, अमेरिका, नाइजीरिया और वेनेजुएला जैसे देशों से भी भारत ने अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि निकट अवधि में खाड़ी देशों से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक नहीं होगा। दूसरे स्रोतों से तेल लाने में अधिक दूरी, ज्यादा परिवहन लागत और मौजूदा रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
वैकल्पिक समुद्री रास्तों पर जोर
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को संकट के दौरान उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इनमें खाड़ी क्षेत्र से आने वाले कच्चे तेल को वैकल्पिक समुद्री मार्गों से लाना, समुद्र में मौजूद कार्गो की स्पॉट खरीद, स्वैप और अन्य अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक व्यवस्थाएं शामिल हैं।
हालांकि ऐसे विकल्प सीमित मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं और संकट के समय कई देशों की ओर से एक ही वैकल्पिक आपूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर कीमत भी बढ़ सकती है। लंबे समुद्री रास्ते और अधिक जोखिम प्रीमियम का असर ऊर्जा की लागत पर पड़ सकता है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने की जरूरत
विशेषज्ञों ने भारत के Strategic Petroleum Reserves (SPR) और वाणिज्यिक तेल भंडार को बढ़ाने पर भी जोर दिया है। रणनीतिक भंडार आपात स्थिति में नियमित आपूर्ति बाधित होने पर देश को कुछ समय तक अतिरिक्त सुरक्षा दे सकते हैं।
मई 2026 में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हुए एक समझौते के तहत UAE की कंपनी ADNOC भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के लिए अपनी क्रूड स्टोरेज क्षमता को 3 करोड़ बैरल तक बढ़ा सकती है। इसके अलावा फुजैराह में क्रूड स्टोरेज तथा भारत में LNG और LPG भंडारण से जुड़े विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
रिफाइनरियों को भी बनाना होगा ज्यादा लचीला
सिर्फ तेल के स्रोत बदलना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की कई रिफाइनरियां खास प्रकार के कच्चे तेल, विशेष रूप से मध्यम या भारी और अधिक सल्फर वाले Gulf crude को प्रोसेस करने के लिहाज से विकसित हुई हैं।
ऐसे में यदि भारत को अलग-अलग क्षेत्रों से ज्यादा मात्रा में कच्चा तेल खरीदना है तो रिफाइनिंग सिस्टम को अलग-अलग ग्रेड के क्रूड को प्रोसेस करने के लिए अधिक लचीला बनाना होगा। इसके लिए तकनीकी बदलाव और निवेश की आवश्यकता हो सकती है।
UAE और Oman के बंदरगाह बन सकते हैं अतिरिक्त विकल्प
विशेषज्ञों ने UAE के Fujairah और Oman के Duqm तथा Salalah जैसे बंदरगाहों को भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था में अतिरिक्त विकल्प के रूप में विकसित करने की संभावना बताई है।
फुजैराह की खासियत यह है कि यह हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है और पहले से तेल भंडारण तथा बंकरिंग का महत्वपूर्ण केंद्र है। ओमान के बंदरगाह भी वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट, स्टोरेज और समुद्री सेवाओं के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कच्चा तेल फारस की खाड़ी के भीतर से आ रहा है, तो केवल बाहर स्थित किसी बंदरगाह तक पहुंच बनाने से हॉर्मुज का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।
LPG के लिए चुनौती और बड़ी
ऊर्जा आपूर्ति में LPG को लेकर स्थिति और जटिल है। कच्चे तेल की तरह LPG को हर स्थिति में पाइपलाइन के जरिए स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इसके लिए विशेष जहाजों और समयबद्ध लॉजिस्टिक्स की जरूरत होती है।
यही कारण है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में LPG के लिए भी अलग आपूर्ति स्रोत और वैकल्पिक समुद्री व्यवस्थाएं विकसित करना जरूरी होगा।
भारत के लिए क्या होनी चाहिए आगे की रणनीति?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ कई स्तरों पर मजबूत करने की जरूरत है—
- कच्चे तेल और गैस के आपूर्तिकर्ता देशों में विविधता
- रणनीतिक पेट्रोलियम और वाणिज्यिक भंडार का विस्तार
- अलग-अलग ग्रेड के क्रूड को प्रोसेस करने वाली लचीली रिफाइनिंग क्षमता
- वैकल्पिक बंदरगाहों और ट्रांसशिपमेंट हब का विकास
- सुरक्षित समुद्री गलियारों की व्यवस्था
- LNG और LPG के लिए अलग-अलग वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क
- पश्चिम एशिया के देशों के साथ लगातार कूटनीतिक संपर्क
हालिया घटनाक्रम ने यह दिखाया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल उत्पादन या खरीद तक सीमित नहीं है। सप्लाई रूट, बंदरगाह, भंडारण, रिफाइनिंग और समुद्री सुरक्षा—इन सभी को एक साथ मजबूत करना होगा।

