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1991 का संकट और आज का भारत: सोने से डॉलर तक बदल रही है देश की आर्थिक रणनीति?

नई दिल्ली: 1991 का विदेशी मुद्रा संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दौर रहा है। उस समय देश के सामने विदेशी मुद्रा की गंभीर कमी खड़ी हो गई थी और भारत को अपना सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा जुटानी पड़ी थी। अब इसी घटना को मौजूदा आर्थिक नीतियों से जोड़ते हुए सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि भारत ने 1991 का ‘बदला’ पूरा कर लिया है।

वायरल दावे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से लोगों से सोने की खरीदारी कम करने की अपील का भी जिक्र है। दावा किया जा रहा है कि भारत विदेशों में रखे अपने रिजर्व गोल्ड को वापस देश में ला रहा है और इसी के साथ डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

1991 में क्या हुआ था?

1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद दबाव में था। भुगतान संतुलन के संकट के कारण देश के सामने तत्काल विदेशी मुद्रा जुटाने की चुनौती थी। इसी दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा जुटाई थी।

वायरल दावे में कहा गया है कि उस समय भारत ने करीब 67 टन सोना गिरवी रखा और इसके बदले लगभग 600 मिलियन डॉलर हासिल किए। हालांकि, इस आंकड़े और पूरे घटनाक्रम के अलग-अलग विवरण सामने आते रहे हैं, इसलिए इन्हें आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना जरूरी है।

विदेशों में रखा भारतीय सोना

भारत अपने स्वर्ण भंडार का एक हिस्सा विदेशों में सुरक्षित रखता रहा है। बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों में केंद्रीय बैंकों के सोने का भंडारण लंबे समय से होता रहा है।

हाल के वर्षों में भारत द्वारा विदेशों में रखे कुछ स्वर्ण भंडार को वापस देश में लाए जाने की खबरों के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया है। इसे समर्थक भारत की वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखते हैं।

रुपये में व्यापार और UPI का विस्तार

भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय रुपये की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए पहल की गई है।

वहीं, UPI का भी विदेशों में विस्तार किया जा रहा है। इससे भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिल रहा है।

हालांकि, इन पहलों को सीधे तौर पर भारत के डॉलर व्यवस्था से पूरी तरह बाहर निकलने के प्रमाण के रूप में देखना अभी उचित नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका अब भी बेहद महत्वपूर्ण है।

क्या सोने की कीमतों पर असर पड़ेगा?

वायरल दावे में कहा गया है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना खरीदारों में शामिल है और घरेलू उत्पादन उसकी मांग की तुलना में बहुत कम है। ऐसे में भारतीय मांग में कमी आने पर वैश्विक बाजार पर असर पड़ने का दावा किया जा रहा है।

लेकिन सोने की कीमत सिर्फ भारत की खरीदारी से तय नहीं होती। अमेरिकी ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, केंद्रीय बैंकों की खरीद, वैश्विक महंगाई, निवेशकों की मांग और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कई कारक सोने की कीमत को प्रभावित करते हैं।

‘1991 का बदला’ कितना सही?

सोशल मीडिया पर मौजूदा आर्थिक नीतियों को 1991 की घटनाओं से जोड़ते हुए इसे ‘भारत का बदला’ बताया जा रहा है। समर्थकों का तर्क है कि जिस भारत को कभी विदेशी मुद्रा संकट के कारण सोना गिरवी रखना पड़ा था, वही भारत आज अपने स्वर्ण भंडार और रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

हालांकि, 1991 के संकट और वर्तमान आर्थिक नीतियों को ‘बदला’ कहना राजनीतिक व्याख्या है, आधिकारिक आर्थिक निष्कर्ष नहीं।

वायरल दावे में पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर शर्तें लगाए जाने और पाकिस्तान को कथित तौर पर बिना शर्त डॉलर दिए जाने का भी उल्लेख है। इन दावों की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड का अध्ययन जरूरी है।

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