नई दिल्ली। देश में अल नीनो (El Nino) के प्रभाव के बीच जल संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है। मानसून की विदाई के बाद भी देश के प्रमुख बांध पूरी तरह नहीं भर पाए हैं। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का करीब 66 से 69 फीसदी पानी ही बचा है। यानी बांधों की क्षमता का लगभग 31 से 33 फीसदी हिस्सा खाली है।
इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में देखने को मिल रहा है। यहां जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में काफी नीचे है। इससे आने वाले महीनों में पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है।
दक्षिण भारत के बांधों में पिछले साल के मुकाबले आधा पानी
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण भारत के 50 प्रमुख जलाशयों में 29 अक्टूबर 2026 तक उनकी कुल क्षमता का करीब 44 फीसदी पानी ही उपलब्ध था। पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों में लगभग 90 फीसदी पानी था।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो आंध्र प्रदेश के बांधों में 28 फीसदी, तेलंगाना में 35 फीसदी, कर्नाटक में 50 फीसदी और तमिलनाडु में 52 फीसदी पानी बचा था। इससे इन राज्यों में जल प्रबंधन की चुनौती बढ़ गई है।
कावेरी और पेन्नार नदी बेसिन की स्थिति चिंताजनक
जल आयोग की रिपोर्ट में कावेरी और पेन्नार नदी बेसिन में पानी की भारी कमी दर्ज की गई है। 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, कावेरी बेसिन में सामान्य से 60.50 फीसदी और पेन्नार बेसिन में 72.32 फीसदी कम जल भंडारण था।
इसके अलावा कृष्णा नदी बेसिन में भी पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे दर्ज किया गया है। इन क्षेत्रों में पानी की कमी का असर कृषि और घरेलू जल आपूर्ति पर पड़ सकता है।
अल नीनो से बारिश पर पड़ सकता है असर
अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाला प्राकृतिक बदलाव है, जिसका असर वैश्विक मौसम और मानसूनी बारिश के पैटर्न पर पड़ सकता है। मौसम में बदलाव, अनियमित बारिश और लंबे शुष्क दौर के कारण जलाशयों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आने वाले महीनों में बारिश और जल पुनर्भरण की स्थिति अनुकूल नहीं रही, तो दक्षिण भारत के कई इलाकों में पेयजल और सिंचाई का संकट बढ़ सकता है।
खेती, बिजली उत्पादन और पेयजल पर असर की आशंका
बांधों में पानी की कमी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों से मिलने वाले पानी का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों, औद्योगिक गतिविधियों, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन में होता है।
ऐसे में जलस्तर कम रहने से किसानों को सिंचाई के लिए परेशानी हो सकती है। वहीं, बिजली उत्पादन और शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
देश के जलाशयों में पानी की मौजूदा स्थिति आने वाले महीनों के लिए जल संरक्षण और बेहतर प्रबंधन की जरूरत को रेखांकित करती है।

