HomeNationalभारत की मध्य एशिया रणनीति में उज्बेकिस्तान क्यों अहम? रक्षा सहयोग से...

भारत की मध्य एशिया रणनीति में उज्बेकिस्तान क्यों अहम? रक्षा सहयोग से मजबूत होगी रणनीतिक पकड़

नई दिल्ली। मध्य एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और उज्बेकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश महत्वपूर्ण मानी जा रही है। चीन की बढ़ती मौजूदगी, अफगानिस्तान की सुरक्षा चुनौतियां और क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने उज्बेकिस्तान को भारत की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए अहम बना दिया है।

ताशकंद के साथ सैन्य और सुरक्षा संबंध मजबूत होने से भारत को ऐसे क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जहां सीधे पहुंच के विकल्प सीमित हैं।

रक्षा सहयोग की मजबूत नींव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 29-30 अगस्त की उज्बेकिस्तान यात्रा से पहले विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने भारत-उज्बेकिस्तान रक्षा संबंधों को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पहले से जारी है।

भारत और उज्बेकिस्तान ने 2019 में रक्षा क्षेत्र में संयुक्त कार्य समूह की व्यवस्था स्थापित की थी। इसके जरिए दोनों देश रक्षा उद्योग और सैन्य सहयोग के नए क्षेत्रों पर काम कर रहे हैं।

‘डस्टलिक’ से बढ़ रहा सैन्य तालमेल

भारत और उज्बेकिस्तान के बीच हर साल ‘डस्टलिक’ (DUSTLIK) संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित होता है। इस अभ्यास का मकसद दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने और आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए संयुक्त क्षमताओं को मजबूत करना है।

इस अभ्यास का सातवां संस्करण अप्रैल 2026 में उज्बेकिस्तान में आयोजित किया गया। नियमित सैन्य अभ्यासों के जरिए दोनों देशों को संयुक्त रणनीति, निगरानी और सुरक्षा अभियानों से जुड़े अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है।

अफगानिस्तान बना साझा सुरक्षा चिंता

उज्बेकिस्तान की सीमा सीधे अफगानिस्तान से लगती है। ऐसे में वहां की सुरक्षा स्थिति का सीधा प्रभाव उज्बेकिस्तान पर पड़ता है। भारत भी अफगानिस्तान से जुड़े आतंकवाद और चरमपंथी नेटवर्क को लेकर लगातार सतर्क रहा है।

आतंकवाद, उग्रवाद, ड्रग्स तस्करी, सीमा सुरक्षा और अफगानिस्तान से पैदा होने वाली अस्थिरता जैसे मुद्दों पर दोनों देशों की चिंताएं काफी हद तक समान हैं। यही वजह है कि रक्षा सहयोग को सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के महत्वपूर्ण माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है।

चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच भारत की रणनीति

मध्य एशिया में चीन ने पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। वहीं रूस का इस क्षेत्र में पारंपरिक सैन्य और राजनीतिक प्रभाव अब भी कायम है।

उज्बेकिस्तान ने इन शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बहुआयामी विदेश नीति अपनाई है। भारत भी किसी औपचारिक गठबंधन के बजाय द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की नीति पर आगे बढ़ सकता है।

भारत के लिए उज्बेकिस्तान क्यों महत्वपूर्ण?

मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। उसकी सीमाएं क्षेत्र के अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ अफगानिस्तान से भी लगती हैं। यही वजह है कि ताशकंद के साथ मजबूत संबंध भारत को पूरे क्षेत्र के सुरक्षा हालात को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकते हैं।

भारत के लिए यह साझेदारी खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद विरोधी रणनीति और सुरक्षा सहयोग के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

चाबहार से कनेक्टिविटी को मिलेगा फायदा

मध्य एशिया तक भारत की सीधी जमीनी पहुंच पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति के कारण सीमित है। इसलिए भारत वैकल्पिक संपर्क मार्गों पर जोर दे रहा है।

ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की रणनीति में उज्बेकिस्तान अहम साझेदार हो सकता है। मजबूत भारत-उज्बेकिस्तान संबंध आर्थिक और रणनीतिक कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

रक्षा कारोबार के भी खुलेंगे रास्ते

भारत अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाने और घरेलू रक्षा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। दूसरी ओर, उज्बेकिस्तान अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण पर ध्यान दे रहा है।

ऐसे में दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरण, तकनीक और औद्योगिक सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। 2025 में बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया में उज्बेकिस्तान की रक्षा क्षेत्र से जुड़ी भागीदारी को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना गया।

SCO में भी बढ़ेगा सहयोग

भारत और उज्बेकिस्तान दोनों शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य हैं। यह संगठन मध्य एशिया की सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच है।

द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को मजबूत करने से भारत को SCO के भीतर भी मध्य एशियाई देशों के साथ अपने सुरक्षा हितों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

भारत के लिए रणनीतिक साझेदार क्यों है ताशकंद?

उषानास फाउंडेशन की रिसर्च एसोसिएट रुचिका शर्मा के अनुसार, उज्बेकिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। उनका मानना है कि दोनों देशों का रक्षा सहयोग आतंकवाद विरोधी क्षमताओं, रणनीतिक भरोसे और क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को मजबूत कर सकता है।

उनके मुताबिक, ‘डस्टलिक’ सैन्य अभ्यास के सात संस्करण दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य तालमेल को दर्शाते हैं।

अब अगला कदम क्या होगा?

भारत और उज्बेकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग अब नियमित सैन्य अभ्यासों से आगे बढ़कर तकनीकी और औद्योगिक साझेदारी का रूप ले सकता है। इसके लिए तीन क्षेत्र सबसे अहम होंगे—आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और खुफिया जानकारी साझा करना, रक्षा उद्योग में साझेदारी और दोनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल।

मध्य एशिया में बदलते शक्ति संतुलन के बीच उज्बेकिस्तान के साथ भारत के मजबूत रिश्ते नई दिल्ली की क्षेत्रीय रणनीति को मजबूती दे सकते हैं। अब चुनौती इस भरोसे को ठोस रक्षा, तकनीकी और आर्थिक सहयोग में बदलने की होगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments