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अर्जेंटीना में भारत का खनन अभियान

नई दिल्ली। भारत ने महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अर्जेंटीना में खनन सहयोग को विस्तार देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। शुरुआत लिथियम से हुई है, लेकिन अब दोनों देशों के बीच सहयोग को क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ एलिमेंट्स, प्रोसेसिंग और डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग तक ले जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

भारत-अर्जेंटीना के बीच बढ़ा खनन सहयोग

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, भारत-अर्जेंटीना संयुक्त व्यापार समिति (JTC) की चौथी बैठक 24 अगस्त को ब्यूनस आयर्स में हुई। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने किया, जबकि अर्जेंटीना की ओर से अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के सचिव राजदूत फर्नांडो ब्रुन शामिल हुए।

बैठक में दोनों देशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2025 की अर्जेंटीना यात्रा के दौरान तय रोडमैप की प्रगति की समीक्षा की। साथ ही रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने पर सहमति जताई गई। खनन, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में निवेश के अवसरों पर भी चर्चा हुई।

लिथियम प्रोजेक्ट बना सहयोग का आधार

अर्जेंटीना में भारत की सरकारी कंपनी खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) की गतिविधियां इस सहयोग का अहम हिस्सा हैं। कैटामार्का प्रांत में KABIL की लिथियम परियोजना किसी भारतीय कंपनी की अर्जेंटीना में पहली लिथियम खनन पहल है। कंपनी दूसरे चरण की ड्रिलिंग पूरी कर चुकी है और साल्टा तथा जुजुई प्रांतों में भी संभावनाओं की तलाश जारी है।

15 जनवरी 2024 को KABIL और अर्जेंटीना की सरकारी खनन कंपनी CAMYEN के बीच समझौता हुआ था। इसके तहत KABIL को करीब 15,703 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले पांच लिथियम ब्राइन ब्लॉकों में अन्वेषण और विशेष अधिकार मिले।

उत्पादन में देरी बनी बड़ी चुनौती

भारत के लिए अर्जेंटीना महत्वपूर्ण खनिजों के विदेशी स्रोतों को मजबूत करने के लिहाज से अहम है, लेकिन लिथियम परियोजना की रफ्तार को लेकर चिंता भी सामने आई है। संसदीय समिति ने भारत के विदेशी महत्वपूर्ण खनिज अधिग्रहण कार्यक्रम में सीमित प्रगति और बातचीत से लेकर उत्पादन तक लगने वाले लंबे समय पर सवाल उठाए हैं।

पहले योजना के अनुसार दिसंबर 2027 तक व्यवहार्यता अध्ययन और 2029 के अंत तक उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य था। अब उत्पादन शुरू होने की संभावित समयसीमा दिसंबर 2030 तक खिसक गई है। यानी समझौते के बाद व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में करीब सात साल लग सकते हैं।

क्यों जरूरी है लिथियम?

लिथियम इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों और कई आधुनिक तकनीकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण खनिज है। भारत अपनी लिथियम जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में विदेशों में सीधे खनिज संसाधन हासिल करना भारत की खनिज सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

दूसरी ओर, चीन वैश्विक खनन, रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग सप्लाई चेन के बड़े हिस्से पर प्रभाव रखता है। ऐसे में भारत के लिए वैकल्पिक और भरोसेमंद स्रोत तैयार करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

लिथियम ट्रायंगल में भारत की मौजूदगी

अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली के साथ मिलकर दुनिया के प्रमुख ‘लिथियम ट्रायंगल’ का हिस्सा है। यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर लिथियम संसाधनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए अर्जेंटीना में भारत की मौजूदगी सिर्फ एक परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

खनन से आगे प्रोसेसिंग पर जोर

भारत के लिए असली फायदा सिर्फ लिथियम निकालने में नहीं, बल्कि पूरी वैल्यू चेन विकसित करने में है। इसमें खनिज की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग, बैटरी-ग्रेड रसायनों का उत्पादन, कैथोड और एनोड सामग्री, सेल निर्माण और बैटरी रीसाइक्लिंग शामिल हैं।

KABIL भी खनिज उत्पादन से आगे बढ़कर प्रोसेसिंग, बैटरी सामग्री, कंपोनेंट और सेल निर्माण से जुड़ी साझेदारियों की संभावनाएं तलाश रही है। यदि यह मॉडल सफल होता है तो अर्जेंटीना के खनिज संसाधनों को भारत की प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता से जोड़ा जा सकता है।

लिथियम के साथ कॉपर और रेयर अर्थ पर नजर

भारत की जरूरत सिर्फ लिथियम तक सीमित नहीं है। कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, तांबा और रेयर अर्थ एलिमेंट्स भी देश की रणनीतिक खनिज सूची में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

अर्जेंटीना में तांबे की भी बड़ी संभावनाएं हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, पावर ट्रांसमिशन और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों के विस्तार के साथ कॉपर की मांग तेजी से बढ़ रही है। अर्जेंटीना भी अपने तांबा क्षेत्र में बड़े निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।

चीन के दबदबे के बीच भारत की रणनीतिक पहल

लातिन अमेरिका मामलों के विशेषज्ञ ऐश नारायण रॉय ने ब्यूनस आयर्स में हुई बैठक को भारत-अर्जेंटीना खनन सहयोग के दूसरे चरण की शुरुआत बताया। उनके मुताबिक, दोनों देश सहयोग को केवल खनिज खरीद तक सीमित रखने के बजाय सीधे माइनिंग गतिविधियों में भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

रॉय ने कहा कि रणनीतिक खनिजों के क्षेत्र में चीन के मजबूत प्रभाव के बीच भारत का अर्जेंटीना में अपनी मौजूदगी बढ़ाना महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारत को भविष्य में खनिजों की आपूर्ति के नए स्रोत विकसित करने में मदद मिल सकती है।

भारत के लिए क्या होगा असर?

भारत-अर्जेंटीना खनन सहयोग सफल रहा तो इसका फायदा देश के इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीक उद्योगों को मिल सकता है। इससे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत की आयात निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को अधिक विविध बनाने में मदद मिलेगी।

फिलहाल KABIL का कैटामार्का प्रोजेक्ट इस रणनीति का शुरुआती आधार है। यदि यहां व्यावसायिक रूप से उपयोगी लिथियम भंडार की पुष्टि होती है, तो यह भारत के लिए विदेशी लिथियम का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। आगे चलकर इसी सहयोग के जरिए तांबा, अन्य क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स तक पहुंच बढ़ाने की संभावना भी बन सकती है।

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