नई दिल्ली। पान मसाला विज्ञापन से जुड़े विवाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने कंपनी को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की ओर से कंपनी के सेलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि विवाद से जुड़े प्रमुख तथ्य महाराष्ट्र से संबंधित हैं। ऐसे में इस मामले से जुड़ी शिकायतों के लिए महाराष्ट्र की अदालत अधिक उचित और सुविधाजनक मंच है। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उसने मामले के मूल विवाद के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।
अदालत के मुताबिक, कंपनी यह साबित करने में नाकाम रही कि इस मामले की कार्रवाई का कोई महत्वपूर्ण या मुख्य हिस्सा दिल्ली हाई कोर्ट के क्षेत्राधिकार में हुआ है। महाराष्ट्र FDA, मुंबई ने कंपनी की ओर से नियुक्त ब्रांड एंबेसडरों को महाराष्ट्र में गतिविधियों और कथित कानूनी उल्लंघनों के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
दरअसल, यह पूरा विवाद ‘विमल इलायची’ के विज्ञापन को लेकर है। कंपनी ने अपनी याचिका में कहा था कि वह अपने इलायची उत्पाद के प्रचार के लिए लोकप्रिय अभिनेताओं की सेवाएं लेती है और उनके साथ बाकायदा एंडोर्समेंट समझौते करती है। कंपनी का दावा है कि उसके विज्ञापन अभियान में लागू कानूनों और नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है।
कंपनी के मुताबिक, महाराष्ट्र FDA ने आरोप लगाया कि इलायची के नाम पर प्रसारित किए जा रहे विज्ञापन वास्तव में प्रतिबंधित पान मसाला उत्पाद का सरोगेट यानी अप्रत्यक्ष प्रचार हैं। कंपनी ने इस आरोप का विरोध करते हुए कहा था कि विज्ञापित उत्पाद प्रतिबंधित पान मसाला से अलग है।
याचिका में कहा गया था कि FDA ने विज्ञापनों में नजर आने वाले अभिनेताओं से ऐसे दस्तावेज पेश करने को कहा था, जिनसे यह साबित हो सके कि ‘विमल इलायची’ प्रतिबंधित पान मसाला उत्पाद से अलग है। इसके अलावा, नियामक की ओर से प्रचार अभियान रोकने और डिजिटल प्लेटफॉर्म से संबंधित प्रचार सामग्री हटाने के निर्देश दिए जाने की बात भी याचिका में कही गई थी।
कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि 11 अगस्त को जारी FDA का नोटिस सीधे कंपनी को नहीं, बल्कि विज्ञापन में शामिल अभिनेताओं को भेजा गया था। वकील ने कहा कि राज्य नियामक की कार्रवाई का सबसे अधिक और अपूरणीय नुकसान कंपनी को हो सकता है, लेकिन उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
कंपनी ने यह भी तर्क दिया था कि महाराष्ट्र FDA के पास विज्ञापनों को रोकने का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। याचिका में दावा किया गया कि वर्ष 2001 से महाराष्ट्र में पान मसाले का निर्माण या बिक्री नहीं हुई है। साथ ही कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2013 के प्रतिबंध का हवाला देते हुए कहा कि देशभर में तंबाकू वाले पान मसाले पर रोक है।
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इन दलीलों के गुण-दोष पर विचार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर दिल्ली का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बन सकता कि कंपनी अपना कारोबार दिल्ली से संचालित करती है या उसने दिल्ली से ब्रांड एंबेसडरों की नियुक्ति की है। खास तौर पर तब, जब विवादित नोटिस खुद कंपनी को जारी नहीं किया गया था।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी याचिकाकर्ता के रजिस्टर्ड ऑफिस, भुगतान की जगह अथवा विज्ञापन अभियान की योजना और प्रबंधन से जुड़े तथ्यों का चुनिंदा तरीके से इस्तेमाल करके अदालत का क्षेत्राधिकार तय नहीं किया जा सकता, जब इन तथ्यों का विवादित नोटिस की वैधता से सीधा संबंध न हो।
अदालत ने यह भी कहा कि मामूली या केवल पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों को ‘कॉज ऑफ एक्शन’ के तौर पर पेश करके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र स्थापित करने की कोशिश से बचना चाहिए। ऐसे तथ्य जिनका वास्तविक विवाद से सीधा संबंध नहीं है, केवल याचिका में उनका उल्लेख किए जाने से अदालत को क्षेत्रीय अधिकार नहीं मिल जाता।
याचिका में दिल्ली स्थित मंत्रालय और FSSAI को भी पक्षकार बनाया गया था। इस पर अदालत ने कहा कि इन अधिकारियों के खिलाफ कोई विशेष राहत नहीं मांगी गई थी और न ही उनके द्वारा जारी किसी निर्देश या आदेश को चुनौती दी गई थी।
वहीं, केंद्र सरकार और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) की ओर से पेश वकील ने भी दलील दी थी कि कंपनी को अपनी याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल करनी चाहिए थी, क्योंकि संबंधित कारण बताओ नोटिस महाराष्ट्र सरकार के FDA की ओर से जारी किया गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के सवाल पर कंपनी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मामले के आरोपों और सरोगेट विज्ञापन से जुड़े विवाद के अंतिम गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की।

