नई दिल्ली। गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को जेल में बंद हुए आठ साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर उनके बच्चों आकाशी भट्ट और शांतनु भट्ट ने भावुक बयान जारी करते हुए अपने पिता के संघर्ष को याद किया। उन्होंने कहा कि संजीव भट्ट ने अपनी अंतरात्मा और सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय अपने रास्ते पर कायम रहना चुना, जिसकी कीमत उन्हें आजादी, करियर और परिवार से दूर रहकर चुकानी पड़ी।
बच्चों के मुताबिक, 5 सितंबर उनके परिवार के लिए सिर्फ वर्षों की जुदाई का दिन नहीं है, बल्कि न्याय के लिए जारी संघर्ष का प्रतीक भी है। उन्होंने अपने बयान में आरोप लगाया कि उनके पिता को चुप कराने के लिए उन पर ऐसे मामले लगाए गए, जिन्हें परिवार ‘गढ़े हुए आरोप’ मानता है।
संजीव भट्ट के बच्चों ने क्या कहा?
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आठ साल की कैद का जिक्र: बच्चों ने कहा कि इतने लंबे समय के बाद भी उनके पिता का हौसला और संकल्प कमजोर नहीं हुआ है।
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सिद्धांतों से समझौता नहीं: उनका कहना है कि संजीव भट्ट ने सुरक्षित रास्ता चुनने के बजाय अपनी अंतरात्मा की आवाज के साथ खड़े रहने का फैसला किया।
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लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जोर: बच्चों ने कहा कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून का शासन और सत्ता से जवाबदेही मांगना भी जरूरी है।
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नागरिक अधिकारों की बात: उन्होंने दावा किया कि उनके पिता ने उन लोगों के लिए आवाज उठाई, जिन्होंने कथित तौर पर नफरत और हिंसा का सामना किया।
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संघर्ष जारी रखने का संकल्प: परिवार ने कहा कि न्याय के लिए उनकी लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।
‘आठ साल बाद भी हौसला कायम’
आकाशी और शांतनु भट्ट ने कहा कि उनके पिता ने उन्हें सिखाया कि जीवन में ऐसे मौके आते हैं, जब व्यक्ति को तय करना होता है कि चुप रहना बेहतर है या अपनी अंतरात्मा के लिए आवाज उठाना।
उनके मुताबिक, संजीव भट्ट जानते थे कि सत्ता के खिलाफ खड़ा होना कठिन और अकेला संघर्ष हो सकता है, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से पीछे हटने से इनकार किया।
बच्चों ने कहा कि आठ साल की कैद के बावजूद उनके पिता से उनका आत्मविश्वास और अपने सिद्धांतों पर विश्वास नहीं छीना जा सका। उन्होंने लोगों से नागरिक अधिकारों, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज उठाने की अपील भी की।
2002 गुजरात दंगों के बाद चर्चा में आए थे
संजीव भट्ट वर्ष 2011 में उस समय चर्चा में आए थे, जब उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक हलफनामा दाखिल किया था। इसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान मोदी की कथित भूमिका को लेकर आरोप लगाए थे। इन आरोपों को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विवाद चलता रहा।
वर्ष 2011 में उन्हें सेवा से निलंबित किया गया और 2015 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
अलग-अलग मामलों में मिली सजा
संजीव भट्ट सितंबर 2018 से जेल में हैं। 1990 के हिरासत में मौत के मामले में 2019 में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इसके अलावा 1996 के कथित ड्रग-प्लांटिंग मामले में 2024 में उन्हें 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई गई।
भट्ट के परिवार और उनके समर्थक इन मामलों तथा सजाओं को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते रहे हैं। हालांकि, इन मामलों में अदालतों द्वारा दिए गए फैसले और परिवार की राजनीतिक प्रेरणा संबंधी दलीलें अलग-अलग पक्षों के दावे हैं।
आठ साल की कैद पूरी होने के मौके पर बच्चों के बयान ने एक बार फिर संजीव भट्ट के मामलों, उनके संघर्ष और न्याय को लेकर चल रही बहस को चर्चा में ला दिया है।

